किसानों के लिए लाभकारी है गुलखैरा  की खेती


गुलखैरा एक औषधीय पौध है।इसकी खेती उत्तर प्रदेश के उन्नाव हरदोई और कन्नौज जिलों में छिटपुट रूप में होती है।
किसानों के लाभकारी होने के बावजूद उत्तर प्रदेश के कृषि एवं उद्यान विभाग के कलेन्डर में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। इसके पांचों अवयव औषधीय गुण से भरपूर होते है जिनसे आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं को बनाया जाता है। इससे बनी दवायें बीर्य और बल बर्धक होती हैं । इससे बनी औषधियां स्तम्भनकारी होती इसलिए संतान सुख से वंचित दम्पति इसका प्रयोग संतान सुख प्राप्त करने में सफल हो जाती हैं। गुलखैरा सभी अवयवों के विक्रय का केन्द्र लखनऊ का सआदतगंज क्षेत्र है जहां से यह पंसारियों की दुकानों तक पहुंच कर आम आदमी को उपलब्ध हो जाता है।
   गुलखैरा मूलतः अफगानिस्तान और पाकिस्तान का पौधा है वहीं से भारत भी पहुंचा है इसे यहां बहुत अधिक प्रचार प्रसार न मिलने के कारण अभी प्राय गुमनाम है।
    उन्नाव के कुछ प्रयोग धर्मी किसान  जो कि कृषि गोष्ठियों और कार्य शालाओं में भाग लेने इधर उधर जाते रहते हैं इस के खूब सूरत फूलों से आकर्षित होकर शौकिया तौर पर इसके बीज उन्नाव ले आये। और पहले इसे गृह वाटिका में स्थान दिया। इसके फूल सुगंधित तो नहीं मगर आकर्षक बहुत होते हैं। इसका पौधा जूट या भिन्डी के पौधों जैसा होता है और पौधे की लम्बाई चार से पांच फुट तक होती है जिसमें लगभग एक दर्जन फूल एक साथ लगते हैं । फूल का आकार भी भिण्डी या जूट (पेटुआ) जैसा होता है मगर रंग बिरंगा होता है । इसके फूल लालए गुलाबी एनीले एपीले और श्वेत रंग के होते हैं। जबकि भिन्डी और पेटुआ का फूल केवल पीले रंग का होता है। गुलखैरा गृह वाटिका से होते हुए उन्नाव में खेतों तक पहुंचा और रिश्तेदारों के जरिए पडो़सी जनपद हरदोई और कन्नौज भी पहुंच गया। तलाश करने पर इसकी खेती करने वाले किसानों को बाजार भी मिल गया।
    औषधीय उपयोग के लिए इसकी मांग तो है ही और उत्पादन सीमितए इसलिए इसकी विक्री में कोई समस्या नहीं है। गुलखैरा उत्पादक किसान एक एकड़ की उपज से डेढ़ से दो लाख रूपए तक कमा लेते हैं। इसकी खेती का तरीका और लागत प्रायरू सामान्य है। फसल की अवधि लगभग आठ माह है। नवम्बर में लगाई गई इसकी फसल मई तक तैयार हो जाती है। यानी इसकी फसल रबी और जायद दो फसलों का समय ले लेती है इसके बावजूद किसान गुलखैरा के बाद खरीफ की फसल ले सकते हैं। 
गुलखैरा की फसल की खास बात ये होती है कि इसके पौधों का सारा भाग जैसे पत्ती, तना, बीज सब सुखा कर बाजार में बिक जाती है।
गुलखैरा की फसल एक बार बो लेने पर अगली बार उसी के बीज से फसल बो सकते हैं। नवंबर के महीने में बोयी गयी फसल अप्रैल.मई महीने में तैयार हो जाती है। इसकी तैयारी के लिए खेत में सभी खरपतवार निकालकर खेत की जमीन एकदम साफ कर ली जाती है। अप्रैल.मई के महीने में पौधों की पत्तियां और तना सूखकर खेत में ही गिर जाता है। जिसे बाद में इकट्ठा कर लिया जाता है। गुलखेरा की सबसे खास बात ये होती हैए इसे कई साल तक सुखा कर रखा जा सकता है।भारत में अभी तक गुलखैरा के पौधे सजावट के लिए लगाए जाते हैंए लेकिन पाकिस्तान जैसे कई देशों में किसान इसकी खेती बड़े पैमाने पर करते हैं। इसका प्रयोग कई यूनानी दवा बनाने में किया जाता है।
डॉ आर के राय प्रमुख वैज्ञानिकए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान
राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के एक प्रमुख वैज्ञानिक गुलखैरा की खेती के बारे में बताते हैं, भारत में अभी तक गुलखैरा के पौधे सजावट के लिए लगाए जाते हैं, लेकिन पाकिस्तान जैसे कई देशों में किसान इसकी खेती बड़े पैमाने पर करते हैं। इसका प्रयोग कई यूनानी दवा बनाने में किया जाता है।
एक  कुंतल गुलखैरा दस हजार रुपए कुंतल बाजार में बिक जाती है  एक बीघे में लगभग पांच कुंतल तक गुलखैरा निकल जाती है, ऐसे में सात-आठ महीने में एक बीघे में पचास से साठ हजार रुपए आराम से मिल जाते हैं। कई बार तो व्यापारी खेत ही खरीद ले जाते हैं।श्गुलखैरा यूनानी दवाओं में प्रयोग की जाती है। पाकिस्तान में इसकी बड़े मात्रा में खेती की जाती है।