जिओ ऐसे कि हमारा हर पल हंसते-गाते बीते!

         


                डॉ जगदीश गाँधी


संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ



(1) प्यार जो बरसाता है, वो प्यार सबका पाता है:-
आज की विषम सामाजिक परिस्थितियों में सारे संसार में चारों ओर जमकर मारामारी हो रही है। आज सबसे अधिक मनुष्य ही मनुष्य से भयभीत है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से भयभीत है। कानूनविहीनता, बिगड़ता विश्व पर्यावरण, शस्त्रों की होड़, तृतीय विश्व युद्ध की आशंका से सारा विश्व परेशान है। ऐसे निराशापूर्ण वातावरण में आइये, हम इस सन्देश को फैलाये कि शस्त्र जो उठाता है वह शस्त्र से मिट जाता है। कहने को तो धर्म, राष्ट्र, भाषा अनेक हैं किन्तु वास्तविकता में संसार का प्रत्येक वासी विश्व नागरिक है। इसलिए परमात्मा से हम सब मिलकर प्रार्थना करें कि संसार के प्रत्येक वासी का जीवन हंसते-गाते बीते क्योंकि प्यार जो बरसाता है वह प्यार सबका पाता है। प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का संकल्प लेना चाहिए कि हम संसार में व्याप्त हिंसा को अहिंसा से मिटायेंगे। अज्ञान के अन्धेरे को ज्ञान के प्रकाश से दूर करेंगे। विश्व में सामाजिक परिवर्तन लायेंगे। धरती पर हम सब संसारवासी मिलकर आध्यात्मिक साम्राज्य स्थापित करेंगे। इस सारी वसुन्धरा को एक कानून की डोर से बांधेगे। तभी सारे संसार में आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना हो सकेंगी।
(2) उद्देश्यपूर्ण शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावशाली माध्यम:-
इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के एक प्रभावशाली उपकरण के रूप में प्रयोग किया जाता है। आज की बिगड़ी हुई सामाजिक परिस्थिति का कारण उद्देश्यविहीन शिक्षा है। अतः इन विपरीत परिस्थितियों में परिवर्तन लाने का एकमात्र उपाय उद्देश्यपूर्ण शिक्षा है। उद्देश्यपूर्ण अर्थात भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक तीनों प्रकार की संतुलित शिक्षा देने के अतिरिक्त कोई दूसरा निदान नहीं है। उद्देश्यविहीन अर्थात बुरी शिक्षा से बुरे समाज का तथा उद्देश्यपूर्ण अर्थात अच्छी शिक्षा से अच्छे समाज का निर्माण होता है।
(3) उद्देश्यहीन शिक्षा के स्थान पर उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है:-
हमारा विश्वास है कि मानव इतिहास में वह समय अब आ गया है जब उद्देश्यविहीन शिक्षा के स्थान पर उद्देश्यपूर्ण शिक्षा को प्र्रभावशाली उपकरण के रूप में प्रयोग करना चाहिए। स्कूल यदि प्रकाश का केन्द्र है तो वह प्रत्येक बालक को विश्व का प्रकाश बनाने हेतु - (1) बच्चों को ‘सार्वभौमिक जीवन-मूल्य’ की शिक्षा देगा, (2) बच्चों को ‘विश्वव्यापी चिंतन’ देगा, (3) बच्चों को ‘विश्व की सेवा के लिए’ तैयार करेगा तथा (4) बच्चों को ‘सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट’ बनायेगा।
(4) उद्देश्यविहीन शिक्षा से दिशाविहीन होता बालकों का जीवन:-
आज उद्देश्यविहीन शिक्षा ही सामाजिक मूल्यों में निरन्तर गिरावट का कारण है। बालक के जीवन में उद्देश्यविहीन शिक्षा ने चार कमियाँ पैदा कर दी हैं। शिक्षा ने (1) सबसे पहले ईश्वर से बालक का संबंध काट दिया है (2) ईश्वर से कटकर मनुष्य अज्ञानता के अन्धेरे में चला जाता है (3) मनुष्य की आत्मा और चिन्तन को संशयी आत्मा बना दिया हैै अर्थात उसमें संशयवृत्ति उत्पन्न कर दी है, जिसके कारण उसे सही-गलत का भान नहीं रह गया है तथा (4) मनुष्य के जीवन में अज्ञानतावश उसकी सबसे बड़ी सम्पत्ति ‘उसका क्लेश’ व ‘अन्तःकरण में चलने वाला निरन्तर संघर्ष’ बन गया है। आज हमें इन चारों से मुक्ति दिलाने वाली उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की जरूरत है।
(5) हम स्कूल वाले अपने सामाजिक उत्तरदायित्व से मुँह नहीं मोड़ सकते:-
हम स्कूल वाले जाति-धर्म के नाम पर दूरियाँ बढ़ाने में काफी हद तक जिम्मेदार हैं। हम स्कूल वाले केवल गणित, भूगोल, विज्ञान आदि भाषाओं का ज्ञान कराकर तथा किसी एक धर्म-जाति की शिक्षा देकर अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते। शिक्षित होकर धन तथा रोटी कमाने में कोई हर्ज नहीं है। स्कूल वालों को बालक के चिन्तन, समझदारी तथा विचार को अपने रचनाकार परमपिता परमात्मा की सोच की तरह ऊँचा उठाने का प्रशिक्षण भी देना चाहिए। हमें संसार के प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र के साथ ही साथ सारे विश्व का अच्छा नागरिक बनाना है। धरती हमारी माँ है। परमात्मा हमारी आत्मा का पिता है। हमारा दृष्टिकोण निरन्तर अपने परमपिता परमात्मा की तरह ही व्यापक होना चाहिए। मेरी आत्मा के पिता परमपिता परमात्मा द्वारा निर्मित यह सारी सृष्टि मेरा अपना घर है।


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