संक्रमित टिश्यू कल्चर पौधे फैला सकते हैं केले में महामारी

                       


                      शैलेंद्र राजन 
निदेशक
केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा

केले के टिश्यू कल्चर पौधों से खेती करना अधिकांश जगह वरदान सिद्ध हुआ परंतु कई स्थानों इन पौधों को  पनामा विल्ट रोग को फैलाने के लिए उत्तरदाई भी पाया गया है । परंपरागत ढंग से केले के पुत्तिओं  द्वारा नए बाग़ लगा कर शायद  हज़ारों हेक्टेयर क्षेत्र में केले की खेती करना असंभव  था । टिश्यू कल्चर पौधों का उपयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है परंतु जरा सी असावधानी केले की पनामा विल्ट नामक महामारी को उन स्थानों पर फैलाने के लिए काफी हैं जहाँ रोग का नामोनिशान नहीं था| उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों की करोड़ों रुपए की फसल इस बीमारी से नष्ट हो रही है । अधिकतर स्थानों पर सिंचाई के पानी के साथ इस बीमारी के जीवाणु एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैल गए और किसानों को कई वर्षों बाद ज्ञात हुआ कि उनके खेत में यह भयानक बीमारी घर कर चुकी है । नहर एवं बाढ़ के पानी ने इस बीमारी को फैलाने मैं मुख्य भूमिका निभाई । जहां पर यह बीमारी न थी वहां पर भी टिशु कल्चर पौधे से फैलने की संभावना बढ़ गई है ।


उत्तर प्रदेश और बिहार के केला उत्पादकों के लिए टिशू कल्चर पौधे एक वरदान के समान है|इतने बड़े क्षेत्र में केला उत्पादन के लिए परंपरागत तरीके से कम समय  मे नए बाग लगाने की संभावनाएं बहुत कम थी । उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रतिवर्ष करोड़ों टिश्यू कल्चर पौधों की आवश्यकता होती है इसलिए यह कई कम्पनियों के लिए एक लाभकारी व्यवसाय है | गत कुछ वर्षों में केले में हो रही पनामा विल्ट महामारी पर अध्ययन करने के बाद पता चला कि इस बीमारी के बहुत से नए स्थानों प्रकट होने का मुख्य कारण संक्रमित टिशु कल्चर पौधे हैं। भले ही प्रयोगशाला के टिश्यू कल्चर पौधे रोगमुक्त हो परंतु हार्डेनिंग नर्सरी में इस बीमारी से पौधों के संक्रमित होने की संभावना रहती है । भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा उत्तर प्रदेश एवं बिहार में यह पाया गया कि यह बीमारी रोग ग्रस्त क्षेत्रों में स्थापित टिश्यू कल्चर हार्डेनिंग नर्सरी से पौधों के कारण फैली । लेकिन कई दूरस्थ स्थान जिनके आसपास इस बीमारी का नामोनिशान न था भी इस बीमारी से ग्रसित पाए गए । किसानों से जानकारी प्राप्त करने के बाद पता चला की उनको रोग ग्रस्त क्षेत्रों से पौधे सप्लाई किए गए । सीतामढ़ी (बिहार) में बाराबंकी की प्रतिष्ठित नर्सरी द्वारा सप्लाई किए गए पौधों द्वारा बीमारी फैलने की सम्भवना व्यक्त की गयी है |


इस समस्या से बचने के लिए किसानों में विशेष सावधानी एवं जागरूकता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उनके द्वारा लगाए जा रहे टिशु कल्चर पौधे संक्रमित क्षेत्रों की हार्डनिंग नर्सरी से तो नहीं आ रहे हैं | पौधों को प्रारंभिक अवस्था में ही आईसीआर टेक्नोलॉजी द्वारा उपचारित करके बचाया जा सकता है । भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा टिश्यू कल्चर पौधों के लिए प्रतिरक्षा बूस्टर तकनीकी का विकास किया जा रहा है | इस तकनीक के उपयोग से टिश्यू कल्चर पौधों में इस बीमारी से लड़ने के लिए प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न हो जाती है |


आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान और आईसीएआर- केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिक इस महामारी के बचाव से टिश्यू कल्चर पौधे की प्राइमरी और सेकेंडरी हार्टनिंग के स्तर पर ही प्रतिरक्षा बूस्टर तकनीकी के विकास पर कार्यरत हैं| इसका प्रयोग रोग ग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के खेतों में किया जा रहा है| प्रारंभिक परिणामों के आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है की तकनीकी टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला तक 1 या 2 वर्ष में पहुंच जाएगी|


इस बीमारी से बचने के लिए किसानों को भी सावधानी अपनाने की जरूरत है उन्हें उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर, अयोध्या जिले के सोहावल ब्लॉक, महाराजगंज में सिसवा ब्लॉक और मेधावल ब्लॉक जैसे रेड हॉट स्पॉट ज़ोन पर में स्थित नर्सरी से रोपण सामग्री की खरीद से बचना चाहिए| बिहार में कटिहार और पूर्णिया जिले स्थापित हार्डनिंग नर्सरी से बीमारी फैलने की संभावनाएं हैं| ऐसी अवस्था में राज सरकार को बीमारी के इन रेड जोन की नर्सरीओं में टिश्यू कल्चर पौधे की हार्डनिंग से बचने की आवश्यकता है|


अन्य स्थान जहां पर यह रोग व्यापत नहीं है वहां पर आईसीएआर-फ्यूजीकांट तकनीक का प्रयोग करके स्वस्थ पौधों का उत्पादन किया जा सकता है| उत्तर भारत में रोग ग्रस्त क्षेत्रों की हार्डनिंग नर्सरी से टिश्यू कल्चर पौधे का उपयोग ना करके नए क्षेत्रों में बीमारी को फैलने से रोकना अति आवश्यक है| रोग ग्रस्त स्थानों से केले की पुत्तियों का उपयोग नए भागों को लगाने के लिए भी रोक देना चाहिए| अभी भी कई स्थानों पर पुत्तियों द्वारा नए बाग लगाने की परंपरा जारी है|