भौगोलिक संकेतक


डा0 शशांक शेखर सिंह
वरिष्ठ वैज्ञानिक (उद्यान)
के0जी0के0 अमेठी (न0दे0कृ0वि0 अयोध्या) 



किसी वस्तु अथवा माल का वर्णन करने के लिए किसी स्थान के अथवा किसी विशेषण के उपयोग को ”भौगोलिक लक्षण“ अथवा ”भौगोलिक संकेतक“ कहते हैं। ऐसी वस्तुएं यथा- माल/कृषि उत्पाद/प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित उत्पाद जो उस स्थान या नाम विशेष से इस प्रकार जुड़ जाते हैं कि नाम से उस माल का उद्गम, स्त्रोत  तथ अन्य विशेषतायें स्वतः स्पष्ट हो जाती हैं वे बौद्विक संपदा अधिकारों के अंतर्गत आती है। 
 विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के उपरान्त भूमण्डलीकरण प्रक्रिया में तीव्रता के साथ अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में आर्थिक सहयोग के एक नये युग की शुरूआत हुई, जिससे विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों को व्यापार पूँजी निवेश, रोजगार तथा आर्थिक प्रगति के बेहतर अवसरों की अपार संभावनायें प्राप्त हुई हैं। मुक्त बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के विकास एवं संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। ऐसे में तकनीकी तथा व्यावसायिक प्रगति एवं लाभ के लिए अनुसंधान कार्यों, उद्योगों, परम्परागत ज्ञान तथा विशिष्ट भौगोलिक संकेतकों में बौद्धिक संपदा के विकास एवं संरक्षण को सकारात्मक एवं उत्साही मानसिकता के साथ अपनाना अपरिहार्य हो गया है। इन परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार द्वारा ”भौगोलिक उपदर्श अधिनियम 1999“ पारित किया गया तथा वर्ष 2002 में भौगोलिक उपदर्शों नियम प्रतिपादित किये गये। भारत में विभिन्न वस्तुओं से सम्बन्धित भौगोलिक उपदर्शनों का पंजीकरण एवं संरक्षण इस अधिनियम से सम्भव हुआ। पंजीयक (रजिस्ट्रार) ही विशेष एकस्व, अभिकल्प तथा व्यापार चिन्ह के महानियंत्रक के रूप में पर्यवेक्षण करते हैं। इस अधिनियम को अमल करने वाले भौगोलिक उपदर्श पंजीयन कार्यालय चेन्नई में स्थापित किया गया है।
 संरक्षित कराये जाने के लिए उत्पादों की विशिष्ट तथा भौगोलिक क्षेत्र में इनका सम्बन्ध वैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक तथ्यों से स्थापित किया जाना वांछित होता है। भारत के कुछ सम्भावित भौगोलिक संकेतक- बासमती चावल, दार्जिलिंग चाय, अलफांसों आम, नागपुरी संतरा, बीकानेरी भुजिया, इलाहाबाद सुर्खा अमरूद आदि हैं। बौद्धिक सम्पदा संरक्षण के अनेक लाभ हैं यथा पेटेण्ट कराये जाने से उपयोगी एवं नवीन शोध को बढ़ावा मिलता है, अनुसंधान कार्यों में पुनरावृत्ति कम होती है, तकनीकी समस्याओं का त्वरित समाधान हो सकता है, नये उत्पादों की सूचना, शोध के लिए अच्छी संभावना वाले क्षेत्रों की जानकारी प्राप्त होती है पेटेण्ट प्राप्त करने वाला अपने अन्वेषण/खोज को स्वेच्छा से उपयोग कर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकता है।



पेटेण्ट, देश की तकनीकी प्रगति का सूचक होता है तथा पेटेण्ट से आंतरिक एवं बाह्य प्रतिस्पर्धा बनी रहती है जिसके परिणामस्वरूप उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि तथा मूल्यों में कमी आ सकती है। भौगोलिक संकेतकों के अन्तर्गत पंजीकरण करा लेने पर उत्पाद/माल को कानूनी  संरक्षण प्राप्त होता है, जिससे उपभोक्ताओं को मौलिक अथवा वास्तविक उत्पाद की प्राप्ति होती है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में संरक्षित माल के निर्यात में वृद्धि होती है तथा इनका अधिक मूल्य प्राप्त होता है। साथ ही साथ गुणवत्ता का स्तर भी सुनिश्चित रहता है। यह संरक्षण अनाधिकृत व्यक्ति/पार्टी अथवा देश द्वारा उत्पाद की प्रसिद्धि के अनुचित प्रयोग/दुरूपयोग को प्रतिबंधित करता है। संरक्षित उत्पाद विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकते हैं, तथा उन देशों में भी संरक्षण प्राप्त कर सकते हैं। कम्यूनिटी का एकाधिकार होने के कारण संरक्षित उत्पाद के उत्पादन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को इसका लाभ प्राप्त होता है।
भौगोलिक संकेतकों के संरक्षण में समस्यायें-
1. उत्पादकों/आर्टिसन्स का स्थितिप्रज्ञ व संतोषी होना,
2. भौगोलिक संकेतकों के संरक्षण की आवश्यकता, प्रक्रिया व लाभ के विषय मेें मूल  जानकारी होना।    
3. व्यवसायों का संगठित न होना,
4. उत्पादकों/आर्टिसन्स में सामाजिक भावना व बौद्धिक सम्पदा संरक्षण के प्रति  उत्साह न होना,
5. संरक्षण हेतु समुचित मार्गदर्शन व स्थानीय स्तर पर सुविधाओं का ना होना,
6. प्रादेशिक उत्पादों के संरक्षण हेतु कोआर्टिनेटेड प्रयासों की आवश्यकता,
 डास्प-।। फेज में इस योजना के महत्व को पहचानते हुये प्रदेश के महत्वपूर्ण भौगोलिक संकेतकों की पहचान एवं पंजीकरण कराने के उद्देश्य से समूह गठन, किसानों एवं उत्पादकों को उत्प्रेरित करना, तथा पंजीकरण शुल्क वहन करने का कार्य प्रारम्भ किया गया। इस कार्य में प्रथम सफलता इलाहाबाद सुर्खा अमरूद के पंजीकरण के रूप में हुआ। 
 इलाहाबाद सुर्खा अमरूद उत्पादक कल्याण संघ-इलाहाबाद बंगराबाद, बमरौली, जनपद इलाहाबा के आवेदन पर वर्ग-31 में भौगोलिक उपदर्श संख्या- 50 के अधीन ”इलाहाबाद सुर्खा अमरूद“ का पंजीकरण हो चुका है। पुनः शोहरतगढ़ इन्वायरमेण्टल सोसाइटी शोहरतगंढ़ सिद्वार्थनगर के माध्यम से धान के ”काला नमक‘‘ प्रजाति का भी पंजीकरण हो चुका है। अभी अपने प्रदेश में वाराणसी का लंगड़ा आम, उन्नाव का देहरा धान, महोबा का पान, आगरा का पेठा, झांसी का बरूआ सागर अदरख, बस्ती का गौरजीत आम को विशिष्ट गुण रखने वाले उत्पादों के रूप में चयनित कर पंजीकरण का कार्य किया जाना है। इस क्रम में क्षेत्रीय उत्पादों की समितियाँ विकसित की जायेगीं तथा समितियों के माध्यम से भौगोलिक संकेतक के अन्तर्गत पंजीकरण कराया जायेगा। फलस्वरूप राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इन उत्पादों एवं क्षेत्र की पहचान हो सकेगी और क्षेत्रीय कृषकों को अपने उत्पादों का अच्छा मूल्य प्राप्त हो सकेगा।