”उत्तर प्रदेश में सहजन की खेती”


उत्तर प्रदेश  कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा ”उत्तर प्रदेश में सहजन की खेती की आर्थिक एवं पौष्टिक-औषधीय संभावनायें“ विषयक वेबिनार का आयोजन किया गया। इस वेबिनार के मुख्य अतिथि श्री सूर्य प्रताप शाही मा. मंत्री कृषि, कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान, उ0प्र0 थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कै. विकास गुप्ता (से.नि.), अध्यक्ष उपकार द्वारा की गयी। वेबिनार में अतिविशिष्ट अतिथि के रूप में डा. ब्रह्मा सिंह, पूर्व निदेशक, डी.आर.डी.ओ., नई दिल्ली द्वारा प्रतिभाग किया गया तथा वह इस वेबिनार के तकनीकी सत्र के अध्यक्ष भी रहे। तकनीकी सत्र के सह अध्यक्ष के रूप डा0 जगदीश सिंह, निदेशक, भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी थे। तकनीकी सत्र में तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के डा0 एल0 पुगालेन्डी, अधिष्ठाता (उद्यान), डा0 आर0 स्वर्ण प्रिया, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, डा0 टी0 सरस्वथी, प्राध्यापक, डा0 के0 राजामनी, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष एवं डा0 यू0 बी0 चैधरी, प्रधान वैज्ञानिक, केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मकदूम, मथुरा, डा0 ए0 बी0 राय, डा0 सुधीर सिंह, भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक तथा डा0 बिजय बहादुर द्विवेदी, संयुक्त निदेशक, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा अपने व्याख्यान दिये गये।  
महानिदेशक, उपकार डा0 बिजेन्द्र सिंह द्वारा अपने स्वागत तथा उद्घाटन सत्र उद्बोधन में बताया गया कि कोविद-19 में इम्यूनिटी बढ़ाने तथा खाद्य सुरक्षा की दृष्टिकोण से सहजन बहुत ही उपयोगी पौधा है। इस पौधे का प्रत्येक भाग उपयोगी है। इसकी महत्ता को देखते हुए उ0प्र0 सरकार द्वारा यह आदेश जारी किया गया है कि सभी लोग अपने किचन गार्डेन में सहजन के एक या दो पौधे लगाये जायें। उन्होने बताया कि इस पौधे की महत्ता को देखते हुए उ0प्र0 कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी तथा आर0जी0एफ0आर0आई0, झाॅसी को वार्षिक सहजन (मोरिंगा) के खाद्य, चारा तथा पोषक सामाग्री के विकास तथा मूल्यांकन हेतु परियोजना वित्त पोषित की गयी है। महानिदेशक द्वारा सरकार से अनुरोध किया गया कि मोरिंगा से बने हुए खाद्य पदार्थ (कैपसूल, पत्तियों का चूर्ण, जूस) को प्रदेश में मिड-डे-मील में दिया जाय ताकि प्रदेश के विद्यार्थियों का स्वस्थ्य अच्छा हो सके। 
मा0 अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद कैप्टन (से.नि.) विकास गुप्ता द्वारा अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में बताया गया कि कोविद-19 महामारी में रहन-सहन तथा खान-पान बदल गया है। सहजन एक बहुत की उपयोग पौधा है कृषक इसकी खेती अपनी आय बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। अपने पोषक तत्वों तथा औषधीय गुणों के कारण इसका प्रयोग इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। सहजन को कृषक एक उपयोगी पौधे के रूप में मेड़ों बंजर भूमि आदि में उगाकर इससे अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते है। बायो गैस, खाद, शहद बनाने में सहजन का उपयोग किया जा सकता है। 
वेबिनार के मुख्य अतिथि मा0 मंत्री, कृषि, कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान, श्री सूर्य प्रताप शाही ने अपने उद्बोधन में बताया कि वैज्ञानिकों द्वारा सहजन के पौष्टिक तथा औषधीय गुणों के प्रमाण दिये गये हैं। यह खनिज तत्वों तथा विटामिन से परिपूर्ण है। पोषाहार योजनाओं के माध्यम से इसे गाॅव-गाॅव घर-घर पहुॅचाना होगा। अब सहजन दक्षिण भारत की फसल न होकर अब यह पूरे भारत की फसल है। दक्षिण भारत के साथ-साथ साभर में इसका उपयोग देश के सभी भागों में किया जाता है। उन्होने बताया कि उन्नाव, गाजीपुर, चित्रकूट तथा लखनऊ में सहजन की खेती पर बल दिया जा रहा है। कृषि विभाग द्वारा अपने कृषि प्रक्षेत्रों पर  सहजन के एक-एक हजार पौधे लगाये जा रहे हैं। उन्होने कहा उपकार द्वारा सभी विश्वविद्यालयों को सर्कुलर कर प्रवासी मजदूरों को मोरिंगा के खेती करने हेतु प्रोत्साहित किया जाय। उन्होने कहा कि पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय मथुरा, कृषि विश्वविद्यालय बाॅदा तथा अयोध्या द्वारा विश्वविद्यालयों में खाली पड़ी जमीन तथा बार्डर पर सहजन के वृक्ष लगाये जाये तथा कृषकों को इसके संबंध में प्रशिक्षण भी दिया जाय। पोषाहार तथा औषधीय गुणों के कारण यह फसल प्रदेश के कृषकों की आय बढ़ाने के लिए वरदान साबित हो सकती है।    
वेबिनार के विशिष्ट अतिथि तथा तकनीकी सत्र के अध्यक्ष डा0 ब्रह्मा सिंह, पूर्व निदेशक, डी0आर0डी0ओ0, नई दिल्ली ने सहजन को सूखा सहनशील पेड़ बताया तथा पौधे के प्रत्येक भाग को पोषक तत्वों तथा औषधीय गुणों से भरपूर बताया। उन्होने बताया कि कोविद-19 महामारी में सहजन को इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। इसके निर्यात की संभावनाओं को भी तलाशना होगा ताकि इससे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सके। 
वेबिनार के तकनीकी सत्र के सह-अध्यक्ष, डा0 जगदीश सिंह, निदेशक, भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी ने  सहजन के पोषक तथा औषधीय गुणों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसकी पत्तियाॅ, फल तथा बीज सभी उपयोगी हैं इसमें 29-30 प्रतिशत प्रोटीन, 3 प्रतिशत तेल के अतिरिक्त फोलिक एसिड, बिटामिन-बी,ए, एन्टीआक्सीडेन्टस आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते है। यह ह्दय संबंधी, एसीडिटी, अल्सर आदि रोगों में दवा के रूप में प्रयोग किया जा सकता है इसे उत्तर भारत में खेती के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। 
डा0 एल0 पुगालेन्डी ने भारत एवं उत्तर प्रदेश में सहजन (मोरिंगा) का परिदृृश्य एवं सम्भावनाओं पर प्रस्तुतीकरण करते हुये बताया कि भारत में लगभग 43,600 हेक्टेयर भूमि पर मोरिंगा की खेती की जा रही है, जिसमें तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश प्रमुख उत्पादक राज्य है। भारत द्वारा विश्व की 80 प्रतिशत मोरिंगा की मांग को पूरा किया जाता है। डा. आर. स्वर्ण प्रिया ने सहजन की प्रजाति विविधीकरण एवं पौध सामग्री की उपलब्धता पर प्रस्तुतीकरण देते हुये बताया कि सहजन भारतीय मूल का पौधा है तथा इसकी 13 विभिन्न प्रजातियों की खेती भारत एवं विश्व के अन्य देशों में की जा रही है। इसके साथ-साथ उन्होंने सहजन के प्रवर्धन के विषय में भी जानकारी दी। डा. टी. सरस्वथी ने अपने उद्बोधन में पत्ती, फली एवं तेल की पैदावार के लिये सहजन की उत्पादन तकनीकी पर विचार व्यक्त करते हुये बताया कि इसकी खेती 25-30 डिग्री तापक्रम तथा अच्छे जल निकास वाली भूमि पर सफलतापूर्वक की जा सकती है। उन्होंने मोरिंगा उत्पादन तकनीकी से जुड़े विभिन्न पहलुओं यथा बीज की मात्रा, प्रवर्धन, बुवाई की विधि, खाद एवं उर्वरक आदि बिन्दुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। डा. यू.बी. चैधरी ने पशुधन में चारे के रूप में सहजन की भूमिका विषय पर प्रस्तुतीकरण देते हुये बताया कि यदि कृषक भाई अपने पशुओं को चारे के रूप में सहजन को खिलाते है तो उनके दुग्ध उत्पादन में वृद्धि तथा स्वास्थ्य में भी सुधार होगा। डा. ए.बी. राय ने सहजन की खेती में लगने वाले रोग एवं कीटों के प्रबंधन पर प्रकाश डाला। डा. सुधीर सिंह ने मोरिंगा की पत्तियों, फली तथा बीज से बनने वाले विभिन्न उत्पादों (चाय, तेल, सहजन की पत्ती का पाउडर, चिप्स, सूप) के बारे में विस्तार से चर्चा की। डा. के. राजामणि ने सहजन की कृषि, औषधीय एवं औद्योगिक उपयोग में क्षमता पर प्रस्तुतीकरण करते हुये इसके विभिन्न गुणों एवं निर्यात की सम्भावनाओं पर प्रकाश डाला। डा. विजय बहादुर द्विवेदी ने प्रदेश में सहजन की खेती के प्रचार-प्रसार में विभागीय योगदान के बारे में विस्तार से चर्चा की।