हम जगत के अंदर हैं और जगत हमारे अंदर है!

                                             
                                          डा0 जगदीश गांधी, संस्थापक-प्रबन्धक
                                             सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) हम जगत के अंदर हैं और जगत हमारे अंदर है:-
 सम्पूर्ण सृष्टि का रचनाकार परमात्मा है। इसलिए वह जगतपिता तथा जगदीश्वर भी कहलाता है। प्रभु तेरी अनन्त माया है। जग के कण-कण में एक तू ही समाया है। ब्रह्माण्ड का सारा ज्ञान-विज्ञान हमारे अंदर ही समाया है। अन्तःकरण की गहराई में जाकर विचार रूपी रत्न प्राप्त किये जा सकते हैं। मस्तिष्क में कितनी उन्नत प्रज्ञा है। जगत हम ही हैं। हम जगत के अंदर हैं और जगत हमारे अंदर है। ईश्वर भी अपने सारे गुणों के साथ हमारे अंदर वास करता है। जैसा पिंड में वैसा ब्रह्मांड में है। ब्रह्मांड को जानने जाँय तो भूल हो सकती है, परन्तु पिंड तो हमारे हाथ में है। जग की सेवा प्रभु की सेवा ही है। इसलिए कहा जाता है कि परमपिता है एक विश्व परिवार हमारा है, सारे जग में गूँज उठे जय जगत का नारा है। हमें सारे जगत को कानून की डोर से बांधकर एक करना है।
(2) सारी सृष्टि अद्भुत आदान-प्रदान के सहारे टिकी है:-
 जड़ तथा चेतन जगत की उत्पत्ति पांच तत्वों - आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से मिलकर हुई है। हमारे हृदय में भावनाओं का सागर है और बाहर यथार्थ समुद्र में अगणित लहरें उठती हैं। भावनाओं की इन लहरों को सही दिशा की ओर मोड़ने की आवश्यकता है। बाहर विशाल वायुमण्डल है अंदर भी वायुमण्डल हिलोरे ले रहा है। हमारी प्रत्येक सांस के द्वारा अंदर आक्सीजन लेने का बाहर कार्बन डाई आक्साइड छोड़ने का अद्भुत आदान-प्रदान चल रहा है। हर पल नई सृष्टि निर्मित हो रही है तथा अगले पल नष्ट होने का सिलसिला व्यवस्थित ढंग से जारी है। 
(3) प्रकृति हमें मूढ़ता से पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बनने के लिए प्रेरित करती है:- 
 हम मुड़कर भीतर देंखे। हमारे भीतर है - विचारों, संकल्पों, भावनाओं तथा चिन्तन का विशाल जगत। जितना हम अपने आंतरिक जगत को सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ते हैं उतना बाहरी जगत में बदलाव आता है। प्रकृति हमें हर पल मूढ़ता से पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बनने के लिए प्रेरित करती है। मैं सब में हूँ। सब मुझ में हैं। इस विचार से जगत के प्रत्येक व्यक्ति तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित होता है। जगत तथा परमात्मा के प्रति संशय का भाव नष्ट होता है। परमात्मा के प्रति श्रद्धा से हमारा दिव्य तथा आध्यात्मिक जन्म होता है। ब्रह्मांड से बड़ा ब्रह्म तथा पिण्ड से बड़ी आत्मा है।   
(4) भावनाओं को जगत कल्याण की सही दिशा में ले जाना चाहिए:-
 भावना का स्थान हृदय में है। अगर हम हृदय पवित्र न रखेंगे, तो भावना हमें गलत रास्ते ले जायगी। दुर्भावना को मनुष्यत्व का कलंक माना गया है। महज भावना का कोई उपयोग नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे कि भाप का अपने-आप में कोई उपयोग नहीं। भाप को उचित नियंत्रण में रखा जाँय तभी उसमें ताकत पैदा होती है। यही बात भावना की है। भावना कई बार कष्टप्रद सिद्ध होती है, लेकिन भावनाहीन मनुष्य पशु-तुल्य है। भावना को जगत कल्याण की सही दिशा में ले जाना हमारा परम कर्तव्य है। भावना को गलत मार्ग से रोकने की शक्ति हम सबमें होती ही है। यह उत्कृष्ट प्रयत्न है। इस प्रयत्न में हार के लिए स्थान ही नहीं है। शब्दों के पीछे रही भावना का अध्ययन करना चाहिए। केवल शब्दों को नहीं पकड़ रखना चाहिए। किसी भी कार्य पीछे हमारी छिपी भावना पवित्र होनी चाहिए। 
(5) शंका के मूल में श्रद्धा का अभाव है:-
 जिसकी निष्ठा सच्ची है, उसकी रक्षा अंदर बैठा भगवान स्वयं ही कर लेता है। शंका के मूल में श्रद्धा का अभाव रहता है। इस कारण से जीवन में परम श्रद्धा की आवश्यकता है। हमने सभी धर्मों में यही आदेश पाया है कि सब सौंप दो प्यारे प्रभु को सब सरल हो जायेंगा। मानव प्राणी जितनी अधिक-से-अधिक आध्यात्मिक उच्चता प्राप्त कर सकते हैं, उसके लिए जरूरत सिर्फ परमात्मा के प्रति अटल विश्वास और सजीव श्रद्धा की है। वही सच्ची प्रार्थना कर सकता है, जिसे दृढ़ विश्वास हो कि ईश्वर उसके भीतर है।
(6) ईश्वर पर सजीव श्रद्धा एवं अटूट विश्वास पवित्रतम भावना है:-
 परमात्मा के प्रति सजीव श्रद्धा एवं अटूट विश्वास ही हमें तूफानी समुद्रों के पार ले जाती, पहाड़ों को हिलाती तथा समुद्र को लांघ जाती है। यह श्रद्धा एवं विश्वास अंतर्यामी ईश्वर के सजीव और जागृत भाव के सिवा और कुछ नहीं है। अपने अंतर में ईश्वर के वास का सजीव विश्वास न हो, तो प्रार्थना असंभव है। विश्वास की शक्ति ऐसी है कि अंत में मनुष्य वैसा ही बन जाता है, जैसा वह अपने-आपको समझता है। श्रद्धा कभी गुम नहीं होती। वह आगे-आगे ही बढ़ती चली जाती है। प्रभु पर सजीव श्रद्धा एवं अटूट विश्वास के सहारे से बुद्धि तेजस्वी, ओजस्वी तथा प्रकाशित होती जाती है। उत्साह टिकाने में एक ही वस्तु का काम है - ईश्वर पर सजीव श्रद्धा एवं अटूट विश्वास। इसके सहारे मनुष्य क्या नहीं कर सकता। तुम समय की रेत पर छोड़ते चलो निशां देखती तुम्हें जमीं देखता है आसमां। 
(7) ईश्वर की सत्ता पर श्रद्धा हिमालय पर्वत के समान अटल है:-
 उस श्रद्धा का कोई मूल्य नहीं है, जो केवल सुख के समय ही पनपती है। सच्चा मूल्य तो उस श्रद्धा का है, जो कड़ी-से-कड़ी कसौटी के समय भी टिकी रहे। यदि आपकी श्रद्धा सारे जगत के विरोध तथा निन्दा के सामने भी अडिग खड़ी न रह सके, तो वह निरा दंभ और ढोंग है। श्रद्धा ऐसा सुकुमार फूल नहीं है, जो हल्के-से-हल्के तूफानी मौसम में भी कुम्हला जाय। श्रद्धा तो हिमालय पर्वत के समान अटल है, जो कभी डिग ही नहीं सकती। जहां श्रद्धा होती है, वहीं दूसरे सामान अपने-आप आ जाते हैं। श्रद्धा के अनुसार ही बुद्धि सूझती है, मेहनत आती है। सच्ची श्रद्धा हो जाने पर बाहर से लगने वाले संकट भी ऐसी श्रद्धा वाले को संकट नहीं लगते। मनुष्य की श्रद्धा जितनी तीव्र होती है, उतनी ही अधिक वह मनुष्य की बुद्धि को पैनी और प्रखर बनाती है। जब श्रद्धा अंधी हो जाती है, तब वह मर जाती है।
(8) अच्छी बात के लिए साधन भी अच्छे ही बरतने चाहिए:- 
 साधन से चिपटे रहना लेकिन उसमें विश्वास न रखना, विश्वास रखने वाले का उस पर अमल न करना यह स्थिति कितनी दयनीय तथा भयंकर है। नापाक साधन से ईश्वर नहीं पाया जा सकता और बुरी चीज को पाने का साधन पाक नहीं हो सकता। अच्छी बात के लिए साधन भी अच्छे ही बरतने चाहिए। टेढ़े रास्ते से सीधी बात को नहीं पहंुचा जा सकता। पूरब को जाने के लिए पश्चिम की ओर नहीं चलना चाहिए।
(9) अपवित्र विचारों के विरूद्ध तुरन्त पवित्र विचारों की फौज खड़ी कर देनी चाहिए:
 अपवित्र विचार से जो मुक्त हो जाय समझो उसने मोक्ष प्राप्त कर लिया। अपवित्र विचारों का सर्वथा नाश बड़े त्याग से होता है। उसका एक ही उपाय है कि हम अपवित्र विचारों के आते ही उनके विरूद्ध तुरंत पवित्र विचार खड़े करके एक सुरक्षा कवच बना लें। मनुष्य अपने शुद्ध विचार से भी जगत की बड़ी सेवा कर सकता है। विशुद्ध चित्त के विचार ही कार्य हैं और महान परिणाम पैदा करते हैं। विचार ही कार्य का मूल है। विचार गया तो कार्य गया ही समझो। विचार पर नियंत्रण रखना एक लंबी, कष्टकर और कठिन परिश्रम की प्रक्रिया है। अपवित्र विचार आकर उसी तरह शरीर को हानि पहुंचाने की शक्ति रखता है, जिस तरह कि अपवित्र कार्य।
(10) परमात्मा के दर्शन इन भौतिक आंखों से नहीं वरन् शुभ कर्मो में होते हैं:- 
 जगत को हानि दुष्टों की दुष्टता से कम तथा सज्जनों की उदासीनता से अधिक होती है। शिक्षा के द्वारा जगत की दशा तथा दिशा बदलने के लिए एक कदम बढ़ाकर आगे आये। हमारा प्रत्येक क्षण प्रवृत्तिमय होना चाहिए। परंतु वह प्रवृत्ति सात्त्विक हो, सत्य की ओर ले जाने वाली हो। जिसने सेवा-धर्म को स्वीकार किया है, वह एक क्षण कर्म-हीन नहीं रह सकता। मेरा अनुभवजनित मानना है कि ईश्वर हमारे सामने शरीर धारण करके नहीं, बल्कि कार्य के रूप में आता है; यही कारण है कि हमारा बुरे-से-बुरे समय में उद्धार हो जाता है। जो करो वह ठीक से करो और सुंदरता से करो! छोटे या बड़े किसी काम को बेगार न टालो! छोटा-बड़ा जो भी काम हाथ में आया हो, उसका पालन करके शांत रहना चाहिए। मेरा विश्वास है कि ईश्वर शरीर से कभी दिखाई नहीं देता, परंतु शुभ कर्मो में दर्शन देता है। 
(11) विश्व एकता की शिक्षा इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है:- 
 नौकरी-व्यवसाय करने पर भी उसका बोझ न लगे, यह अनासक्ति का रूप है। अनासक्त भाव से नौकरी-व्यवसाय करना शक्तिप्रद है, क्योंकि अनासक्त भाव से ओतप्रोत नौकरी-व्यवसाय भगवान की भक्ति है। जगत मात्र की सेवा करने की भावना पैदा होने के कारण अनासक्ति सहज ही आ जाती है। अनासक्ति का मतलब जड़ता नहीं है, निर्दयता भी नहीं है; अनासक्ति के शुभ चिह्न कार्यदक्षता और एकाग्रता के बढ़ने के रूप में दिखाई देते हैं। मानव जाति तथा जगत की सेवा अनासक्तिपूर्वक ही हो सकती है। विश्व एकता की शिक्षा इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।