चारों फसलों में जैविक खाद का प्रयोग कर शुद्ध दुग्ध उत्पादन एंव दुग्ध उत्पादन लागत घटायें


                   ’डा. ए. के. सिंह, ’’डा. एन. प्रताप, ’’’ डा. एन. रघुवंशी 

हमारा देश दुग्ध उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है यहा प्रति वर्ष पूरे विश्व का 17 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन होता है। पशुओं का चारा, दाना, दुग्ध उत्पादन लागत के निर्धारण मंे अहम भूमिका निभाता है। क्योंकि दुग्ध उत्पादन लागत का लागभग 60-70 प्रतिशत खर्च सुखे, हरे चारे दाने पर किया जाता है। इस समय देश में 50 प्रतिशत चारे दाने की कमी है। दुग्ध उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान होने के बावजूद प्रति पशु दुग्ध उत्पादन अन्य देशों की तुलना में अपने देश में काफी कम है। पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता कम होने का मुख्य कारण पौष्टिक चारे दाने की कमी है। दुग्ध उत्पादन की लागत को कैसे कम किया जाय इसका सबसे अच्छा उपाय है कि हरे चारे का उत्पादन बढ़ाया जाय एवं पशुओ के आहार मे दाने की जगह अधिक से अधिक हरे चारे का प्रयोग किया जाय जीससे दुग्ध उत्पादन लागत को कम किया जा सके क्योंकि सुखा चारा (फसल अवशेष) बहुत मंहगा हो गया है। जबसे किसान गेहूँ एवं धान का फसल अवशेष भूसा, पुआल, आदि जलाना शुरू कर दिये है तबसे भूसा, पुआल, मंहगा हो गया है, साथ ही दाना, खली, चोकर मंगहा होने से दुध उत्पादन मे लागत बढ़ गयी है। 

कृषि एवं पशुपालन एक दूसरे के पूरक है जहाँ खेती से देश वासियों को आनाज मिलता है वही पशुओं से दूध, मांस, ऊन आदि तो मिलता ही है इसके साथ ही जैविक खेती के लिए गोबर एवं मूत्र प्राप्त होता है। चारा उत्पादन में रसायनिक उर्वरकों का काफी मात्रा में प्रयोग होता है जो काफी मंहगे होते हैं। इस उर्वरकों की मात्रा को कम करके एवं रसायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में जैविक उर्वरको का प्रयोग करके चारा उत्पादन की लागत को काफी कम किया जा सकता है, जिससे शुद्ध दुग्ध उत्पादन एवं उत्पादन लागत घटाई जा सके। 

जैव उर्वरक के प्रयोग से फसलो एंव मृदा पर प्रभाव:-जैव उर्वरक में सुक्ष्म जीव (जीवाणु) होते हैं जीसे बीजों में मिलाकर बोते हैं। जैव उर्वरक चारा फसलों के राईजोस्फीयर में फैलकर मृदा में पोषक तत्व की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों की वृद्धि एवं विकास के साथ ही साथ चारे के उत्पादन को बढ़ाते हैं ये मृदा में पोषक तत्व मुख्य रूप में नाईट्रोजन, फास्फोरस, जिंक तथा सल्फर की उपलब्धता को बढ़ाते हैं। राइजोवियम दाल वाली चारा फसलों जैसे- बरसीम, लुर्सन, लोबिया, मूगं आदि में प्रयोग करने से लगभग 50-200 किग्रा नाईट्रोजन/हे0 खेत मे स्थिर करता है तथा चारा फसलों का 25-30 प्रतिशत उत्पादन बढ़ जाता है। इससे खेत में उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है, जिससे अगली फसल में नाईट्रोजन की आवश्यकता कम पड़ती है। फास्फेट को  घुलनशील बनाने वाले जीवाणु मृदा में फास्फेट की उपलब्धता को बढ़ा देते हैं तथा चारा फसल का 20-30 प्रतिशत उत्पादन बढ़ जाता है। इसको राक फास्फेट के साथ प्रयोग करने पर मृदा से फसलो के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती हैै। नील हारित शैवाल एवं एजोला बरसीम के खेत में उपयोगी होते है। नील हारित शैवाल 20-30 किग्रा नाइट्रोजन/हे0 तथा एजोला द्वारा 30-100 किग्रा नाइट्रोजन/हे0 के साथ लगभग 50 टन जैविक उत्पाद प्राप्त होता है। इससे मृदा की क्षारीयता भी कम हो जाती है। माइकोराईजा का प्रयोग चारे के लिए कई घासो, चारागाह एवं वन चारागाहो के साथ सहसम्बन्ध के लिए  प्रयोग किया जाता है, इससे लगभग चारे में 30-50 प्रतिशत ऊपज बढ़ जाती है एवं फास्फोरस, जिंक तथा सल्फर के अलावा चारा फसलों में पानी का अवशोषण बढ़ जाता है। एजोटोवेक्टर द्वारा घास कूल की चारा फसलों जई, ज्वार, बाजरा, मक्का आदि के बीजों का उपचार कर बुआई करते हैं, इससे चारा फसलों का 15-20 प्रतिशत उत्पादन बढ़ जाता है तथा खेत में 20-25 किग्रा नाईट्रोजन को स्थिर करता है। एजोस्पाईरिलम भी घासकुल की फसलों ज्वार, बाजरा मक्का, जई आदि की फसलों के लिए एजोटोवेक्टर की तरह ही उपयोगी है। 

जैविक उर्वरको की कार्यप्रणाली:- जैविक उर्वरक में उपस्थित सुक्ष्म जीवाणु खेत/मृदा में स्वतंत्र रूप से जिवित रहकर वायुमण्डल के नाईट्रोजन को अवशोषित करके नाइट्रेट के रूप में बदलकर मृदा से नाईट्रोजन का स्थिरीकरण करते है और यही नाइट्रोजन चारा फसल को उपलब्ध हो जाती है जीससे चारे का उत्पादन बढ़ जाता है। इसी तरह से बैसिलस, स्यूडोमोनास, एसपरजिलस आदि सुक्ष्म जीवाणु मृदा खेत में उपलब्ध फास्फोरस को घुलनशील रूप में परिवर्तित कर देते है। जिससे यही फास्फोरस फसल को उपलब्ध हो जाती है। जिससे चारे का उत्पादन बढ़ जाता है। माइकोराइजा भी फास्फोरस को घुलनशील अवस्था में कर देता है एंव स्यूडोमोनास हार्मोन तथा वृद्धि नियंत्रक अवयव उत्पन्न कर पौधों के वृद्धि में सहायता करता है। ये सुक्ष्मजीव मृदा में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर पोषक तत्व के रूप में फसलों को उपलब्ध करता है, जिससे चारा उत्पादन बढ़ जाता है। ट्राइकोडरमा, एसपरजिलस पेनिसिलिन आदि मृदा मे मौजूद जटिल कार्बनिक पदार्थ को सड़ाकर फसल को पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। 

जैव उर्वरक के प्रयोग से लाभ:-इन जैविक उर्वरको के प्रयोग से फसल उत्पादन लागत में कमी के साथ ही साथ रसायनिक उर्वरको से होने वाले मृदा स्वास्थ्य तथा वातावरण पर होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सकता है। जैविक उर्वरक के प्रयोग से मृदा में उपस्थित हानिकारक सूक्ष्म जीव जो फसलो में रोग उत्पन्न करते है कि संख्या को कम किया जा सकता है। जैविक खाद़ के प्रयोग से मृदा की जल धारण क्षमता में भी वृद्धि होती है तथा पानी की कमी की दशा में भी चारा उत्पादन किया जा सकता है। जैविक खाद जैसे-गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट आदि का गरीब किसान प्रयोग कर अपना पैसा बचा सकते है क्योंकि रसायनिक उर्वरक काफी महंगे होते हैं। इनके प्रयोग से रसायनिक उर्वरको पर कृषि की निर्भरता को कम किया जा सकता है। तथा मृदा स्वास्थ्य को ठीक किया जा सकता है। जैविक उर्वरक के प्रयोग से मृदा में पोषक तत्वों की उपलब्धता काफी दिनों तक बनी रहती है। क्योंकि जैविक उर्वरक रसायनिक उर्वरको की अपेक्षा पोषक तत्वों को धीरे-धीरे फसलों को उपलब्ध कराते हैं। 

निश्कर्श:- उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि चारा फसलों के लिए जैविक उर्वरक का प्रयोग करके चारा उत्पादन को तो बढ़ाया ही जा सकता है बल्कि चारा उत्पादन लागत में भी कमी की जा सकती है, इससे दुग्ध उत्पादन लागत में भी कमी की जा सकती है। जैविक विधि से चारा उत्पादन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे शुद्ध एवं गुणवत्तायुक्त दुग्ध उत्पादन किया जा सकता है, जिसे जैविक दूध का नाम दिया जा सकता है। इस दूध में रसायनिक तत्वों का अंश नहीं होता है जिससे मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। जैविक खाद के प्रयोग से ऊपर बताया गया है कि चारा फसलों में 20-40 प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ जाता है। जिससे दुग्ध उत्पादन में दाने का प्रयोग कम कर हरे चारे का ज्यादा प्रयोग करेगें तो दुग्ध उत्पादन लागत में 30-40 प्रतिशत की कमी की जा सकती है। क्योंकि औसतन 12 लीटर दुग्ध उत्पादन के लिए अगर हरा चारा उपलब्ध नहीं है तो 6-8 किग्रा दाना मिश्रण का प्रयोग करना पड़ता है। जिसका कि मूल्य लगभग रू 150-200 आता है। अगर पशुओं के आहार में हरे चारे का प्रयोग किया जाय तो दाने की मात्रा आधी की जा सकती है, जिससे किसान को प्रति पशु रू0 75-100 तक बच जाता है। जैविक रूप से दुग्ध उत्पादन किया जाय एवं ग्राहकों में इसके प्रति विश्वास पैदा किया जाय तो अन्य दूध की अपेक्षा जैविक दूध का ज्यादा मूल्य भी मील जायेगा जिससे पशु पलको की काफी अच्छी आय होगी। इस प्रकार चारा फसलो मे जैविक खाद प्रयोग कर शुद्ध एवं गुणवत्तायुक्त दुग्ध उत्पादन के साथ ही दुग्ध उत्पादन लागत मे कमी की जा सकती है।


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