मांसाहारी हो रही गौरैया?

लेखक - डा शिव राम पाण्डेय

गौरैया,जो कि शाकाहारी थी अब भोजन के अभाव में मांसाहारी होती जा रही है। पहले उसका बसेरा खपरैल घरों और घरों की मुंडेरों तथा गृहवाटिकाओं में हुआ करता था। घरों के सामने और कोठे पर फैले "भुजिया "और "सुखवन "में वह अपने हिस्से का आहार तलाशती थी । अब स्थितियां बदल गयी हैं। भुजिया अब होती नहीं।अब मशीन वाले घर-घर जाकर आटा पीसने, धान कूटने और तेल पेरने कार्य करने लगे हैं।आटा पैकेटबंद आ गया है। बेसन और दालें बाजार से आने लगीं। इसलिए अब "सुखवन" भी नहीं पड़ता ,वरना भुजिया  सुखवन पड़ते ही असंख्य गौरैयों का झुंड आकर उस पर बैठ जाता था। उस समय हम बच्चों की ड्यूटी चिड़िया भगाने की लग जाती थी। और हम प्रायः खेलने में व्यस्त हो जाते थे और गौरैया अपना भोजन तलाशने में। यह बात और है कि गैरजिम्मेदाराना ड्यूटी के अपराध में हमारी पिटाई भी  हो जाती थी। वैसे किसान स्वभावत: उदार होता है इसलिए चिड़ियों की रखवाली बहुत सख्ती से नहीं की जाती थी। उसे पक्षियों की चहचहाहट में सांगीतिक आनन्द की अनुभूति होती थी। इसीलिए जब खग समूह उसके खेतों में पहुंच जाता था तो किसान कहता था कि "राम की चिरई,रामै कै खेत।खाइले चिरई भरि-भरि पेट"। यानी किसान यह मानता है कि फसल और खेत तथा पशु-पक्षी भगवान की ही देन हैं उन्हें भी भोजन उपलब्ध कराना हमारा ड्यूटी है। वैसे भी किसानों का मानना है कि पशु-पक्षियों के पास तो खेती बारी है नहीं ,तो उन्हें भोजन कौन देगा? चूंकि पक्षियों के भोजन की व्यवस्था अब किसानों के घर पर नहीं बल्कि खेतों में ही रह गई है अतः घातक विकिरणों से बचा-खुचा ,खग समूह ने अपना पेट पालने के लिए खेतों, बागों और चारों ओर फैले विद्युत के तारों पर बसेरा बना लिया है। खेतों में फसल हमेशा तो तैयार रहती नहीं है इसलिए कीट भक्षण गौरैया की मजबूरी बनती जा रही है। आखिर पेट तो रोज ही भरना है शायद इसीलिए गौरैया शाकाहारी से मांसाहारी बनती जा रही है।

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