मघा महोत्सव


वर्षा ऋतु में मघा नक्षत्र का विशेष महत्व है। कारण यह है कि श्रावण - भाद्रपद माह के संक्रमण काल में आने वाले इस नक्षत्र में प्रायः अच्छी वर्षा होती है जो कि धान की फसल के अति उपयोगी होता है। कहा भी गया है कि "धान  पान अरु केरा,ये तीनों पानी के चेरा"। वर्षा ऋतु के इसी काल खण्ड में धान की फसल प्रायः रेंड़ती है। (पुष्पित होना) और उसे इस समय वर्षा की विशेष जरूरत होती है। कहा भी गया है "मेड़-मेड़ मग्घा गोहरावैं,छोट बड़ा सब गर्भे आवैं "। इसलिए ग्राम्य जीवन में खासतौर से वर्षा ऋतु में मघा का आगमन किसानों के लिए एक तरह से उत्सव का अवसर होता है। इस वर्ष (२०२१) मघा नक्षत्र का आगमन १७ अगस्त को हो रहा है । पहले ग्रामीण लोग मघा नक्षत्र के आगमन पर मघा महोत्सव मनाया करते थे। इस अवसर पर लोग पूड़ी पकवान तो बनाते ही थे,तीसी (अलसी) के तेल में उड़द की दाल का बरा बना कर वर्षा के देवता इन्द्र और मघा को चढ़ा कर उनकी पूजा करते थे। यह पूजा किसी जलस्रोत के निकट की जाती है। मौसम सही रहने जलस्रोत के निकट ही भोजन बनाया भी जाता था जबकि वर्षा होने की दशा में घर पर ही भोजन बना कर जलस्रोत के निकट पूजा की जाती थी। कहा भी गया है- तीसी का तेल,उरद का बरा। मघा आवैं घोड़े पर चढ़ा। पहले हम प्रकृति के साथ जीते थे और अब तो हम प्रकृति का तिरस्कार करने लगे हैं । इसीलिए हमें यदा-कदा प्रकृति के प्रकोप को भी झेलना पड़ता है। बोलो मघा महराज की जय।