ब्रिटिश काल में भारत में किसानों की दशा


अंग्रेजी राज्य में कृषि की परम्परागत व्यवस्था नष्ट हो गई तथा भारत से अधिकाधिक धन के शोषण हेतु कृषि की अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर उसे अनवत किया गया जो भारत की अर्थ-व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हुआ। भू-राजस्व के निर्धारण एवं वसूली की प्रक्रिया में ग्राम पंचायतों की उपेक्षा कर अनेक प्रणालियों का प्रयोग किया गया जो असफल रहा। विष्लेशण करने पर अंग्रेजी राज्य में कृषि की निम्नांकित समस्याएँ उत्पन्न हुई जो कृषकों में अशान्ति का कारण थीं।
1. भू-राजस्व की दूषित नीति- अंग्रेजों की दूषित भूमि नीति कृषकों की अषांति के मूल में मौजूद थी। कुछ समय बाद अलबत्ता अंग्रेजों की नीति में परिवर्तन आया, और उन्होंने भू-राजस्व निर्धारित कर उसे कृषि उपज की वृद्धि के साथ निरन्तर अधिकाधिक वसूल करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने भूमि के उत्पादन का आधा भू-राजस्व निष्चित किया जो काफी ऊँचा था। फलस्वरूप कृषि तथा कृषक की दशा  निरन्तर गिरती गई, और किसानों में असन्तोष बढ़ता गया।
2. भू-राजस्व के निर्धारण एवं ग्राम पंचायत की उपेक्षा- भू-राजस्व के ब्रिटिश राज में भारतीय कृषि एवं इसकी समस्याएँ निर्धारण तथा उसकी वसूली में भारत की परम्परागत ग्राम पंचायत व्यवस्था की उपेक्षा कर उसके स्थान पर जमींदारों या सरकारी कर्मचारी जैसे स्वार्थी एवं अत्याचारी मध्यस्थें द्वारा उसकी व्यवस्था की गई। इन्होंने ज्यादतियाँ की। इन्होंने भू-राजस्व के अतिरिक्त और धनराशि  बलपूर्वक वसूल की। इससे कृषकों को कृषि उन्नत करने के लिए कोई प्रेरणा नहीं मिली, बल्कि इसके विपरीत वे कृषि कार्य से विरत हो गए।
3. भू-राजस्व की राषि निष्चित न होना-भू-राजस्व की राशि  स्थायी न होकर कुछ अवधि तक ही निर्धारित की जाती थी, तथा पुनः उसमें वृद्धि भी की जाती रही। भू-राजस्व की इस अनिष्चितता के कारण किसानों में काफी असन्तोष था।
4. जनसंख्या की वृद्धि एवं खेतों का विभाजन- जनसंख्या की वृद्धि एवं खेतों के निरन्तर विभाजन के कारण कृषि भूमि पर काफी दबाव बढ़ता गया। अतः अधिक परिश्रम करने पर भी कृषि द्वारा जीवन-यापन के साधन उपलब्ध न होना कृषिकों की अशान्ति का कारण बना।
5. भू-राजस्व की राशि  का कृषि सुधार में उपयोग न होना- भू-राजस्व की राशि विदेश में भेजी जाती रही, उसका उपयोग कृषि सुधार हेतु (सिंचाई, उन्नत खाद, बीज, उपकरण, परिवहन, विपणन आदि) बिल्कुल भी नहीं किया गया। अतः परम्परागत तरीके से किसान खेती करते रहे तथा वर्षा की अनिष्चितता से प्रभावित होते रहे। फलतः कृषकों में निर्धनता की वृद्धि हुई और उनका असन्तोष बढ़ा।
6. राहत कार्यो का न खोजा जाना- सिचांई साधनों के अभाव में अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि दैवी प्रकोपों के कारण अंग्रेजी राज्य में भयंकर अकाल पड़े। सरकार द्वारा समुचित अकाल राहत कार्य न खोलने व सहायता न देने के कारण भी कृषकों में अशान्ति थी।
7. ऋण लेने की मजबूरी- भू-राजस्व की कर-वसूली, मध्यस्थों के अत्याचार, निर्धनता, अशिक्षा एवं अज्ञानता के कारण किसानों को स्थानीय महाजनों, एवं साहूकारों से ऋण लेने को विवश होना पड़ता था। ऋण न चुकाने की स्थिति में उन्हें महाजनों के अत्याचारों का भी शिकार होना पड़ता था। इसके कारण किसानों में असन्तोष बढ़ता गया और कृषि अवनत हो गई।
8. भूमि पर स्वामित्व न रहना- स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था के अभाव में कृषकों का अपनी भूमि पर कोई स्थायी स्वामित्व न रहा। कृषकों का अपनी कृषि भूमि पर परम्परागत अधिकार समाप्त हो जाने से वे अपनी भूमि से जमींदारों या सरकारी कर्मचारियां द्वारा बेदखल किये जाते रहे। इससे भी कृषकों में अषान्ति उत्पन्न हुई।
9. विकास-कर वसूली- भू-राजस्व के अतिरक्त 6 . 25 या इससे अधिक की दर से विकास कर किसानों से वसूल किया जाता रहा जब कि विकास कार्यों से कृषि कार्यो को कोई  विशेष  लाभ नहीं हुआ और सो असन्तोष का कारण बना।
कृषक आन्दोलन- उपरोक्त कारणों से फैले असन्तोष की वजह से भारतीय कृषकों ने देश के विभिन्न भागों में आन्दोलन किये।
1857 से पूर्व के आन्दोलन- 1857 से पूर्व के आन्दोलन अत्यन्त निर्बल थे और ब्रिटिष सरकार द्वारा तुरन्त कुचल दिये जाते थे। परन्तु, इनसे अंग्रेज सरकार के अन्याय और अत्याचार का पूर्णतया ज्ञान होता है। उत्तरी बंगाल में रंगपुर और दीनापुर के जिले में मालगुजारी की भारी दर बांध दी गई, और उसे अत्यन्त कठोरता के साथ वसूल किया गया। परिणामस्वरूप 1783 में इन स्थानों में खुलकर कृषक विद्रोह फूट पड़ा। विद्रोह को दबाने के लिए पर्याप्त बल का प्रयोग किया गया। परन्तु 1789 में पष्चिमी बंगाल में वीरभूमि विष्णुपुर के राजाओं का भारतीय किसानों ने हृदय से सहयोग दिया। गोरखपुर के जमींदरों ने विद्रोह किया तो वहाँ के किसानों ने भी उनका खुलकर साथ दिया।
1857 के पश्चात् के आन्दोलन- बंगाल में यथार्थ में प्रथम संगठित कृषक विद्रोह 1858-60 में तब हुआ जब नील के खेतीहर बागान मालिकों के विरुद्ध उठ खड़े हुए। बागान मालिक कानूनों के खिलाफ कार्य करते थे। उन्होंने स्थानीय लोगों को फुलसा कर नील की खेती में लगा दिया। इस कार्य के लिए वे किसानों को अग्रिम धन भी देते थे। जो किसान बागान मालिकों से अग्रिम धन लेता था वह एक प्रकार से उनका गुलाम हो जाता था।उन पर मालिक मनमाना अत्याचार करते थे।
बगान मालिकों के मित्र सरकार में थे, अतः वे उनकों हर प्रकार का संरक्षण प्रदान करते थे। अन्त में जब किसानों की दषा अत्यन्त शोचनीय हो गई और उन्हें किसी भी तरह से सहायता मिलने की आशा  नहीं रही तो उन्होंने 1859 में प्रसिद्ध (इतिहास) नील विद्रोह कर दिया। किसानों ने नील उगाने के लिए पेषगी लेना बन्द कर दिया तथा बागान मालिकों के घरों और दफ्तरों पर हमला कर दिया। जो अंग्रेज मालिक घोड़ों पर धूम रहे थे, उन पर भी किसानों ने हमले किए तथा नील के खेतों को नष्ट कर दिया। 1860 में यह विद्रोह अधिक व्यापक हुआ, क्योंकि 1859 के रेंट अधिनियम के विरुद्ध असन्तोष भी इसमें सम्मिलित हो गया।
आगे चलकर भी समय-समय पर कृषक विद्रोह होते रहे। पटना के आस-पास के देहातों में किसानों की दशा  अत्यन्त शोचनीय थी। जब उनकी दशा  अत्यन्त असहनीय हो गयी तो 1873 में उन्होंने विद्रोह कर दिया। सरकार को विवश  हो 1879 में एक कमीशन नियुक्त करना पड़ा जिसकी सिफारिश  पर 1885 में बागान टेनेन्सी एक्ट पास करना पड़ा।
बीसवीं सदी के कृषक आन्दोलन- 20वीं सदी तक कांग्रेस एक राष्ट्रीय संस्था के रूप में कार्य करने लगी थी। अब कृषकों को कांग्रेस का पर्याप्त सहारा मिल गया था। कांग्रेस केवल बुद्धिजीवियों की ही संस्था मात्र नहीं रही थी वह भारतीय ब्रिटिश राज में भारतीय कृषि एवं इसकी समस्यायें।
किसानों के कष्टों को सुनती थी तथा उनको दूर करने के उपायों पर विचार भी करती थी। महात्मा गांधी ने जब कांग्रेस में प्रवेश किया तो कृषक आन्दोलन को और बल मिला। गांधीजी कांग्रेस को केवल पढ़े-लिखे लोगों की संस्था बनाने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने गाँव-गाँव पैदल घूमकर भारतीय कृषकों की समस्याओं को सुना तथा उनके हल करने के लिए किसानों को संगठित किया और आन्दोलन चलाये। इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप भारतीय किसानों में जागृति फैल गई और कुछ मामलों में सरकार को भी झुकना पड़ा। नेहरू जी ने भी कृषक आन्दोलन में भाग लिया था। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। इसने भी कृषकों के हितों की रक्षा की। आज भी किसानों ने संगठित होकर किसान-रैली आदि प्रदर्शन नों से अपनी अशान्ति को व्यक्त किया है, तथा सरकार को कृषि एवं कृषकों के हित में कार्य करने को विवश किया है। आज भी जहाँ सूखा आदि पड़ता है, वहाँ सरकार राहत कार्य चलाती है। यह बात अलग है कि उसके क्रियान्वयन में कहीं गड़बड़ियाँ होती हों।