विलुप्त नदियों का पुनर्जन्म

हजारों वर्षों से अदृश्य पौराणिक नदी सरस्वती जिसे बाम पंथी विचारकों द्वारा कपोल कल्पना मान लिया गया था वह नदी जीवन दायिनी के रूप में आज पुनः मूर्तिमान हो गई है तथा अपनी पयस्वनी जल धार से हमारे तन -मन को पुनः अभि सिंचित करने लगी हैं । यद्यपि समाचार पत्रों ने इस अत्यंत महत्वपूर्ण घटना को ज्यादा महत्व न देकर अन्दर के पृष्ठों पर थोड़ा स स्थान जरूर दिया मगर टी.आर. पी. और विज्ञापनों के चक्कर में 24 घंटों की सजीव बहस चलाने वाले चैनलों की नजर में यह घटना कुछ खास महत्व नहीं पा सकी। यदि सरस्वती के पुनरोदय के समय वहां पर कोई नेता अथवा उद्योगपति मौजूद रहा होता तो इस उपलब्धि को उससे जोड़ने की होड़ जरूर चैनलो में लग जाती । मेरी समझ से यह घटना इस सदी की सबसे बड़ी प्राकृतिक घटना है जिसका संज्ञान केवल हमारे पर्यावरण चिंतकों और प्रकृति प्रेमियों ने लिया है । सरकार ने भी इस महान घटना को कुछ खास तवज्जो नहीं दिया है। नदियां का विलुप्त होना और उनका पुनरोदय केवल प्राकृतिक परिघटना ही न होकर मानव कृत्यों का भी परिणाम है। केवल सरस्वती ही नहीं दर्जनों नदियां हमारी उपेक्षा के चलते हमसे नाराज होकर विलुप्त हो गईं और हमने अपनी भूल को स्वीकारते हुए उन्हें जब फिर मनाना चाहा ,पुनः धरती पर बुलाना चाहा तो  वे एक कोमल हृदया माता की भाँति सरलता से मान गई और हमारे कल्याणार्थ पुनः प्रकट भी हुईं ।
बात पौराणिक नदी सरस्वती की हो या फिर उत्तर प्रदेश में फतेहपुर जनपद की ससुर खदेरी नदी की। जब उन्हे पुर्नप्रतिष्ठापित करने की कोशिश की गई तो वे रूठी हुई माँ की भाँति प्रसन्न होकर मानव सेवा के लिए प्रगट हो गईं। इसी प्रकार राजस्थान की अरावली पर्वत माला में इठला कर बहने वाली भगाणी नदी के जब दुर्दिन आये तो तरुण भारत संघ ने क्षेत्रीय लोगां को जागरूक कर भगाणी नदी के बेसिन में सैकड़ों जोहण बना डाले और 1985 में पुनर्जीवन प्राप्त यह नदी आज भी सतत रूप से बह रही है।


                              इसी प्रकार यहां की अखरी नदी को भी पुनर्जीवन तरुण भारत संघ ने 1986 में ही दिया। क्षेत्रीय लोगो द्वारा  जंगलों का काट गिराये जाने से इस नदी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और यह नदी जगह-जगह सूखने लगी। तब तरुण भारत संघ ने ताल-पाल-झाल के सिद्धांत पर काम शुरू कर 1990 में इस नदी को पुनर्जीवित किया। इसी प्रकार राजस्थान की ही सरसा ,और जहाज वाली नदियां भी जंगलों की अधाधुध कटाई के कारण जंगल तो समाप्त हुए ही जलस्रोत भी सूखने लगे। फिर शासन और जन-सहयोग से जगह जगह जोहड़ और बांध बना कर पानी को रोकने की व्यवस्था की गई और यह नदियां पुनर्जीवित हो उठीं। जहाज वाली नदी अलवर जिले के राजगढ़ तहसील क्षेत्र में स्थित हैं। इसी प्रकार राजस्थान के ही गुवाड़ा देवरी गांवों के क्षेत्र में रूपारेल नदी को भी पुनर्जीवन तरुण भारत संघ ने ही 1990 में दिया। संघ यहीं भी जन-सहयोग से श्हां भी वही प्रक्रिया अपनायी और रूपारेल को पुनर्जीवन देने में सफलता हासिल की।
बात यदि सरस्वती नदी की करें तो इस कार्य  में सर्वाधिक श्रेय जाता है सरकार को। सरकार ने सर्व प्रथम सेटेलाइट चित्रों के माध्यम से इस नदी के भौगोलिक स्तित्व का पता लगाया और जमुना नगर के मुगलावली (हरियाणा) गाँव में खुदाई शुरू हुई जमीन के अन्दर से जलस्रोत फूट पड़ा। यह पानी जाँचा गया तो इसमें जड़ी बूटियों ,खनिज तत्वों के अंश पाये गये। अब तो विश्व विद्यालयां के बहुत सारे वैज्ञानिक इस जल स्रोत के पानी, रेत, बजरी और शैल परतों के सैम्पल लेकर जाँच कर रहे हैं। अब शोधकर्ताओं का कहना है कि प्राकृतिक अपघटन के कारण सहस्रों वर्ष पुरानी इस नदी के ऊपर बड़ी चट्टानें आ जाने से नदी इनके नीचे दब तो जरूर गई मगर भीतर ही भीतर इसका प्रवाह जारी रहा। इसी लिए अब शोधकर्ताओं का दावा है कि इस नदी के जलस्रेत ने भू-गर्भ में ही अपने बहाव का रास्ता ढूंढ लिया और इस नदी का पानी आज राजस्थान, गुजरात और पाकिस्तान में भी प्रवाहित हो रहा हैं। जिसका इस्तेमाल भू-गर्भीय जल के रूप में हो रहा हैं। अगी भी इस नदी के अनुमानित पथ की खुदाई्र जगह-जगह की जा रही है जहां पर इस नदी की मौजूदगी की पुष्टि होती जा रही है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में फतेहपुर जनपद की विलुप्त हो चुकी नदी ससुर खदेरी का पुनर्जन्म हुआ है। सात हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैली जिले की ठिठौरा झील से निकली यह नदी जनपद मे 46 किलोमीटर के दायरे में बह रही थी और जिले की कृषि की जीवन रेखा बनी हुई थी। इसका जल सिंचाई और पीने के काम आ रहा था मगर समय के थपेड़ों के साथ वर्षौं पहले यह नदी सूख कर विलुप्त हो गई और किसान उसकी तलहटी में खेती -बारी करने लगे तथा नदी का स्तित्व समाप्त हो गया। इस बीच वर्ष 2012 में आई.ए.एस. अधिकारीं कंचन वर्मा जनपद फतेह पुर में जिलाधिकारी के पद पर तैनात हुईं और उनका ध्यान जिले की इस विलुप्त हो चुकी नदी की ओर गया,और उन्होंने इस नदी के पुनर्जन्म की पटकथा लिख डाली। उन्होंने पहले इस के लिए कार्य योजना तैयार की और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के धन का सदुपयोग करते हुए उन्होंने ठिठौरा झील और नदी क्षेत्र की खुदाई शुरू करा दिया। इस कार्य में उन्हें जन सहयोग तो मिला ही सरकारी अमले ने भी पूर्ण सहयोग प्रदान किया और उनके मात्र सवा वर्ष के कार्यकाल में 38 किलोमीटर नदी क्षेत्र और ठिठौरा झील की खोदाई पूरी हो गई और आज, विलुप्त हो चुकी ससुर खदेरी नदी का पुनर्जन्म हो चुका हे। अब यह नदी 12 से लेकर 45 मीटर तक की चौड़ाई में फिर से बहने लगी हैं। भारत सरकार ने उनके इस प्रेरणा परक कार्यों से प्रभावित होकर पहले तो पूरी जानकारी प्राप्त की और इसके बाद उन्हें दूसरे राज्यों में भेज कर अपने कार्य को बताने का अवसर प्रदान किया साथ ही उनके कार्यों का सम्मान करते हुए उन्हें प्रधानमंत्री पुरस्कार से सम्मनित किया है। ससुर खदेरी के पुनर्जन्म से जनपद वासियों और किसानों में खुशी की लहर दौड़ गयी है। जनपद वासियां को जहाँ अपना खोया हुआ अपना एक पुराना पेय जल स्रोत फिर से मिल गया है वहीं किसानों को सिंचाई एक नया जल स्रोत पुनः हासिल हो गया है।