जल जाते चुपचाप तेल सा.......


देर रात तक जाग-जाग कर खबर आपको देता।
उस पर चाहे जो भी गुजरे,सभी कष्ट सह लेता।।
लोकतंत्र का है वह प्रहरी, लेकिन खुद बेचारा।
खुद की खबर न होती उसको,फिरता मारा-मारा।।



सर्दी, गर्मी ,वर्षा से वह ,कभी नहीं घबराता।
लेने खबर,पुष्टि करने को चक्कर रोज लगाता।।
नेता अफसर की हो प्रशंसा,तो हैं खुब इतराते।
बात अगर उल्टी पड़ जाये,तुरत मुकर वे जाते।।



बुला मीडिया को वे चट-पट करते खण्डन जारी।
कहते तोड़-मरोड़ के बातें, छापी गयीं हमारी।।
पत्रकार को गलत बता कर ,झुट्ठे हैं इतराते।
'शासक' बन करके जनता पर,अपना रौब जमाते।।



जनमानस का कष्ट वही है शासन तक पहुॅचाता।
शासन सत्ता की बातें ,जनता को वही बताता ।।

खबर नबीसों की पीड़ा ,क्या कभी आपने सोचा।
' ऊपर'से जब पड़ता प्रेशर ,जाता वही दबोचा।।
नीलकण्ठ बन शोषण का वह गहन गरल पी जाता।
बन कर तेल दिये सा जलता,सबको राह दिखाता।।



खबर जुटाने के चक्कर में जब-तब पिट भी जाता।
पत्रकार पाठक ,पीड़ित से  फिर भी रखता नाता।।
जलने की मिशाल हैं जग में ,शम्माँ अरु परवाने ।
जल जाते चुप-चाप तेल सा ,लेकिन यह दीवाने।।



वोट बैंक भी न बन पाये,इसी लिए मजबूर।
वरना इनकी भी भारत में,होती कदर जरूर।।
दस फीसद लोगों पर ही सत्ता की मेहर बरसती।
नब्बे फीसद खबर-नबीसों की है आँख तरसती।।



सदा उपेक्षित रह जाते वे जो अखबार बनाते।
नेता,अफसर के लंगोटिये ही हैं लाभ उठातें।।