फसलों के सूक्ष्म पोषक तत्व, कार्य एवं कमी के लक्षण

गन्धक (सल्फर)(sulfur )-
*यह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है।
*विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम 3ए22 के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है।
*यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये आवश्यक है। तम्बाकू की पैदावार 15-30 प्रतिशत तक बढ़ती है।
*प्रोटीन संरचना को स्थिर रखने में सहायता करता है।
*तेल संश्लेषण और क्लोरोफिल निर्माण में मदद करता है।
*विटामिन के उपापचय क्रिया में योगदान करता है।
गन्धक-कमी के लक्षण-
*नई पत्तियों का पीला पड़ना व बाद में सफेद होना तने छोटे एवं पीले पड़ना।
*मक्का, कपास, तोरिया, टमाटर व रिजका में तनों का लाल हो जाना।
*ब्रेसिका जाति (सरसों) की पत्तियों का प्यालेनुमा हो जाता हैं।
लोहा (आयरन) iron (Fe)
*लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है।
*क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है।
*यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है। श्वसन क्रिया में आक्सीजन का वाहक है।
*पौधों में क्लोरोफिल के संश्लेषण और रख रखाव के लिए आवश्यक होता है।
*न्यूक्लिक अम्ल के उपापचय में एक आवश्यक भूमिका निभाता है।
*अनेक एंजाइमों का आवश्यक अवयव है।
लोहा-कमी के लक्षण-
*पत्तियों के किनारों व नसों का अधिक समय तक हरा बना रहना।
*नई कलिकाओं की मृत्यु को जाना तथा तनों का छोटा रह जाना।
*धान में कमी से क्लोरोफिल रहित पौधा होना, पैधे की वृद्धि का रूकना।
जस्ता (जिंक) ्zinc (Zn)
*कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है!
*हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है।
*यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, लेसीथिनेज, इनोलेज,डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है। क्लोरोफिल निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
*पौधों द्वारा फास्फोरस और नाइट्रोजन के उपयोग में सहायक होता है!
*न्यूक्लिक अम्ल और प्रोटीन-संश्लेषण में मदद करता है।
*हार्मोनों के जैव संश्लेषण में योगदान करता है।
*अनेक प्रकार के खनिज एंजाइमों का आवश्यक अंग है।
जस्ता-कमी के लक्षण-
*पत्तियों का आकार छोटा, मुड़ी हुई, नसों मे निक्रोसिस व नसों के बीच पीली धारियों का दिखाई पड़ना।
*गेहूँ में ऊपरी 3-4 पत्तियों का पीला पड़ना।
*फलों का आकार छोटा व बीज कीपैदावार का कम होना।
*मक्का एवं ज्वार के पौधों में बिलकुल ऊपरी पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं।
*धान में जिंक की कमी से खैरा रोग हो जाता है। लाल, भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं।
ताँबा (कॉपर ) opper (Cu)
*यह इंडोल एसीटिक अम्ल वृद्धिकारक हार्मोन के संश्लेषण में सहायक है।
*ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है।
*अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है।
*पौधों में विटामिन 'ए' के निर्माण में वृद्दि करता है।
*अनेक एंजाइमों का घटक है।
ताँबा-कमी के लक्षण-
*फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।
*अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों मेंरिक्लेमेशन नामक बीमारी होना।
बोरान boron (B)
*पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है।
*दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है।
*यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है।
*यह डी.एन.ए., आर.एन.ए., ए.टी.पी. पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है।
*प्रोटीन-संश्लेषण के लिये आवश्यक है।
*कोशिका दृविभाजन को प्रभावित करता है।
*कैल्शियम के अवशोषण और पौधों द्वारा उसके उपयोग को प्रभावित करता है।
*.कोशिका झिल्ली की पारगम्यता बढ़ाता है!
बोरान-कमी के लक्षण-
*.पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना।
*पौधों मे बौनापन होना। जड़ का विकास रूकना।
*बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप- सिकनेस नामक बीमारी का लगना।
मैंगनीज manganese (Mn)
*क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वागीकरण में सहायक है।
*पौधों में ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
*प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
*प्रकाश और अन्धेरे की अवस्था में पादप कोशिकाओं में होने वाली क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
*नाइट्रोजन के उपापचय और क्लोरोफिल के संश्लेषण में भाग लेने वाले एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है।
*पौधों में होने वाली अनेक महत्वपूर्ण एंजाइमयुक्त और कोशिकीय प्रतिक्रियओं के संचालन में सहायक है।
*कार्बोहाइट्रेड के आक्सीकरण के फलस्वरूप कार्बन आक्साइड और जल का निर्माण करता है।
मैंगनीज-कमी के लक्षण-
*पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं।
*अनाज की फसलों में पत्तियाँ भूरे रग की व पारदर्शी होती है तथा बाद मे उसमे ऊतक गलन रोगपैदा होता है।
*जई में भूरी चित्ती रोग, गन्ने का अगमारी रोग तथा मटर का पैंक चित्ती रोग उत्पन्न होते हैं।
क्लोरीन chloride (Cl)-
*यह पर्णहरिम के निर्माण में सहायक है। पोधो में रसाकर्षण दाब को बढ़ाता है।
*पौधों की पंक्तियों में पानी रोकने की क्षमताको बढ़ाता है।
क्लोरीन-कमी के लक्षण-
*गमलों में क्लोरीन की कमी से पत्तियों में विल्ट के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
*कुछ पौधों की पत्तियों में ब्रोन्जिंग तथा नेक्रोसिस रचनायें पाई जाती हैं।
*पत्ता गोभी के पत्ते मुड़ जाते हैं तथा बरसीम की पत्तियाँ मोटी व छोटी दिखाई पड़ती हैं।
मालिब्डेनम molybdenum (Mo)
*यह पौधों में एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवंनाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है।
*यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है।
*पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है।
मालिब्डेनम-कमी के लक्षण-
*सरसों जाति के पौधो व दलहनी फसलों में मालिब्डेनम की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं!
*पत्तियों का रंग पीला हरा या पीला हो जाता है तथा इसपर नारंगी रंग का चितकबरापन दिखाई पड़ता है।
*टमाटर की निचली पत्तियों के किनारे मुड़ जातेहैं तथा बाद में मोल्टिंग व नेक्रोसिस रचनायें बन जाती हैं।
*इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं।
*.नीबू जाति के पौधो में मॉलिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग लगता हैं।