बरसात में पशुओं के पाचन प्रणाली से संबन्धी प्रमुख रोग


मनुष्य की तरह पशु भी बरसात में विभिन्न रोगो के प्रति संवेदनशील होते है, बहुधा देखा गया है कि वर्षा ऋतु में पाचन से सम्बन्धित रोग अधिक प्रकोप करते है। हमारे ग्रामीण भाइयो तथा पशुपालको के  मुल्यवान पशु देखते ही देखते एसी बीमारियो का शिकार होकर मौत के घाट उतर जाते है। 
इस मौसम में भूसा, हरा-चारा, दाना, दलिया, एंव चोकर इत्यादि में फफूद का प्रकोप हो जाता है एंव नदियो तालाब का पानी कीटाणुओ  तथा विभिन्न प्रकार के परजीवियो से प्रदूषित हो जाता है। पशुओ के इस प्रदूषित चारे दाने एंव पानी के सेवन से पाचन से संबन्धित बीमारिया हो जाती है, जीससे पशुओ का उत्पादन प्रभावित होता है। पशुओ मे अपच/अजीर्ण, अफरा ,दस्त डायरिया ,भुख की कमी एंव आमाशय शोथ इत्यादि बीमारिया हो जाती हैै। 
( 1 ) अपच/अजीर्ण:- 
अन्य रोगो से पिडित अथवा कमजोर प्शुओ को अपच प्रायः हो जाता है पशु भरपेट चारा नही खाता है इस कारण  उसकी कार्यक्षमता एंव उत्पादन घट जाता है। 
कारण:- स्वास्थ पशुओ को रुखे सुखे मोटे चारे खिलाते रहने तथा उनके आहार में हरे चारे का अभाव हो जाने के कारण उन्हे अपच का रोग लग जाता है। आंतो तथा आमाशय में उपस्थित परजीवी अपच पैदा करते है क्योकि ये आमाशय एंव आंतों की त्वचा को कमजोर एंव नष्ट करते है। पशुओ को एक स्थान पर बाधे रहने कंे कारण भी यह रोग होता है। कम परिश्रम, अधिक आराम, जल्दी जल्दी बीना चबाये अधिक चारा खाना एंव बुढापा, निर्बलता आदि भी इस रोग के प्रधान कारण है। 
रोग के लक्षणः- पशु बेचैन रहता है, जुगाली करना बंद कर देता है, भरपेट चारा नही खाता है, पशु सुस्त रहता है गोबर सुखा  तथा कम मात्रा मे करता है तथा कभी दस्त भी हो जाती है जीसमें बीना पचे चारा निकलता है।
चिकित्सा:-रोग का कारण पता लगाकर चिकित्सा करनी चाहिये।
1. पशु को हलका दस्त कराना चाहिये इसके लिये  मैगसल्फ 200ग्रा $  नमक 250 ग्रा आधा ली. शीरा में घोलकर पानी के साथ पिलाना चाहिये जीससे दस्त हो जाय।
2. अगर पेट मे किडे की वजह से अपच हो तो कृमिनाशक दवा पशु को देना चाहिये।
3. रुमिजेस्ट पाउडर 25-30 ग्रा सुबह -शाम गुड या सत्तु के साथ मीलाकर देना चाहिये ।
( 2 ) गोबर का बंद होना ( अधिक खाना) :- जब पशु के पेट मे अपाच्य चारे की मात्रा जैसे- भूसा एंव सुखा चारा अधिक मात्रा मे पहुच जाता है, अथवा शादी विवाह के मौके पर बची हुइ चावल पुडी सब्जी इत्यादि पशुओ को खाने के लिये दे दिया जाता है जीससे पशु अधिक मात्रा  आहार खा लेता है तो गोबर बंद हो जाता है इस बीमारी मे पशु का पहला पेट जरुरत से ज्यादा भर जाता है। पशुओ के चारे दाने मे अचानक परिवर्तन कर देने से भी यह रोग उत्तपन्न हो जाता है तथा पशुओ को कम मात्रा मे पानी पीलाया जाता है तब भी यह बीमारी हो जाती है। 



रोग के लक्षणः-पशु चारा खाना बंद कर देता है, शरीर को सिकोडता है तथा पीछे के पैर पटकता है एंव बेचैन रहता है। पशु दात पीसता है, कडकडाता है दस्त के लिये जोर लगाता है। पशु बहुत कम मात्रा मे गोबर करता है तथा पशु का पेट कडा महसुूस होता है, बायी कोख तनी हुइ तथा बाहर की ओर उभरी दिखाइ देती है। ंजीसे  उगली से थपथपाने पर भद्द की आवाज आती है। 
चिकित्साः- सर्व प्रथम पशुओ का चारा दाना बंद कर देना चाहिये साधारण हालात मे दस्तावर दवा 200ग्रा मैगसल्फ $250ग्रा नमक$ खाने का मीठा सोडा 30ग्रा $सोठ 30ग्रा$ 1.0 ली पानी मे घोलकर पीलाना चाहिये। पीलाने के कुछ देर बाद पशु  को  बदबूदार दस्त हो जायेगी, जीससे पशु को आराम मील जायेगा। 
जब पशु 24 घंटे बाद जुगाली करना शुरु कर दे तब हल्का सुपाच्य हरा चारा थोडा-थोडा करके पशु को देना चाहिये।
 पशु चिकित्सक की सलाह से रुमेंन्टम, रुमिबियोन, रुमैक्सोन, एंव रुमेनोरान इत्यादि की टबलेट पशु को देना चाहिये।  
( 3 ) अफारा ( पेट फुलना ):- यह रोग जुगाली करने वाले पशुओं जैसे- गाय, भैस, भेड , बकरी एंव ऊट को होता है। पशुओ के पहले पेट मे गैस भर जाने के कारण उत्तपन्न होती है। अधिक गिला एंव स्टार्च से युक्त हरा चारा जो ओंस या वर्षा से भीगा रहता है के खाने से पेट मे फरमनटेसन होने लगता है जीससे कार्बन डाईआक्साइड, मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड, नाइट्रोजन, अमोनिया आदि गैस एकत्रित होकर पेट को तान देती है जीससे पशु बहुत बेचैन हो उठता है इस रोग को अफारा कहते है पेंट की मांस पेसियो के खिचाव शक्ति कम होने के कारण पशु का शरीर धूप से गरम हो एंव उसी समय पशु को ठंडा पानी पीला दिया जाय या पशु के चारे दाने मे अचानक परिवर्तन कर देने से यह रोग उत्तपन्न हो जाता है।
रोग के लक्षण
पशु को सांस लेने मे कठिनाई होती है। पेट में गैस भर जाने के कारण पशु बेचैन हो जाता ह,ै मुह खुला रहता है, नाक फैल जाती है। पशु अपना सिर बायी तरफ पेट पर बार- बार मारता हैं। पशु गोबर एंव मुत्र जल्दी- जल्दी करता है। पेट को थपथपाने पर ढोल जैसी आवाज आती है। पाशु बार-बार उठता बैठता है एंव कष्ट के कारण पाशु कराहता है। 
चिकित्सा  
निम्न दवाओं मे से कोइ एक दस्तावर दवा का प्रयोग करना चाहिये।
1. गैस अधिक भर जाने पर कैनुला से पेट छेदकर गैस बाहर निकाल देना चाहिये चूकि यह एक खतरनाक बीमारी है इसलिये घरेलु इलाज से फायदा न हो तो पशु चिकित्सक से इलाज कराना चाहिये। 
2.दलहनी दाना जैसे- चना, मटर, इत्यादि दलकर पानी मे 6 घंटे भिगोकर खिलाना चाहिये।
3.सडा गला पानी मे भींगा चारा जैसे- बरसात में चारे पानी से भीग जाते है या बाड़ का पानी खेत में घुुस जाता है जीससे चारा गल जाता है, ऐसे चारो का प्रयोग नही करना चाहिये इसलिये यह बीमारी बरसात में ही फैलती है।
( 4 ) दस्त होना-
पशुओं मे दस्त का होना पाचन प्रणाली की कमजोरी एंव सूजन उत्तपन्न होने से होता है, इस रोग मे पशु थोडी- थोडी देर के बाद पतला गोबर करता है। अनियमित एंव दूषित आहार, सडे गले बासी आहार खाने से यह रोग हो जाता है। इसके अतिरिक्त संक्रामक रोग पोकनी गलाघोटू अतिसार फैलाने वाले जीवाणु भी इस रोग का कारण बनते है। इस रोेग मे भलि भाति चिकित्सा न होने पशु की मृत्यु भी हो जाती है।
रोग के लक्षण
 पशु बार-बार पतला गोबर करता है, गोबर करने मे दर्द एंव बेचैनी महसूस करता है। दस्त मे पतले गोबर के साथ रक्त एंव म्यूकस भी आता है, पशु बहुत कमजोर हो जाता है जल्द चिकित्सा न कराई जाय तो पशु की मृत्यु भी हो सकती है। 
चिकित्साः- इलाज मे आँतो की खरास दूर करने के लिये अलसी, तील, अथवा अरन्डी का तेल आधा ली. तथा छोटे पाशुओ को 100 मी.ली. पीलाना चाहिये, इसके बाद अजवाइन 25ग्रा.$ कथ्था 25ग्रा.$ सौफ 25ग्रा. सबको बारीक पीसकर आधा किलो माड के साथ सुबह शांम दो बार देना चाहिये जब तक की पशु स्वस्थ न हो जाय।
( 5 )आमाशय शोथ 
 पशुओ के चैथे पेट में सूजन हो जाती है, जीससे पशु बहुत बेचैन होकर छटपटाता है। सडे गले दूषित चारे विशैले पदार्थ अथवा अधिक शक्तिशाली दवाओ के निरन्तर प्रयोग से या चारे के साथ कील काटी पेट मे चला जाता है तो यह रोग उत्तपन्न हो जाता है। इसके अलावा जीवाणु-विषाणु तथा परजीवी के संक्रमण से भी आमाशय शोथ उत्तपन्न हो जाता है। 
रोग के लक्षण
 पशु के पेट मे दर्द रहने के कारण चारा-दाना नही खाता है। जुगाली करना बंद कर देता है पेट मे खोचा मारने वाला तेज दर्द होता है, जीसके कारण पशु बार बार उठता बैठता है। पशु को अजीर्ण होकर दस्त प्रारम्भ हो जाता है।
 इलाज मे आँतो की खरास दूर करने के लिये अलसी, तील, अथवा अरन्डीका तेल आधा ली. तथा छोटे पाशुओ को 100 मी.ली. पीलाना चाहिये इसके बाद अजवाइन 25ग्रा.$ कथ्था 25ग्रा.$ सौफ 25ग्रा. सबको बारीक पीसकर आधा किलो माड के साथ सुबह शांम दो बार देना चाहिये जब तक की पशु स्वस्थ न हो जाय।
( 6 )खुनी दस्तः- यह  रोग संक्रामक होता है, इसमे पेट तथा अतडियो मे शोथ जीवाणु के द्वारा होता है। यह रोग एक परजीवी के द्वारा होता है, यह परजीवी मलद्वार तथा मलाशय की त्वचा पर आक्रमण कर त्वचा को नष्ट कर देता है, जीसके कारण रक्त नलिकाये फट जती है और दस्त मे रक्त आने लगता है। रोग की गंभीर अवस्था मे ज्यादा रक्त आने लगता है



चिकित्साः- 
इसमे भी डायरिया वाली दवाये चलती है, लेकिन गंभीर दशा मे चिकित्सक से मील कर अति शीघ्र करवाना चाहिये अन्यथा पशु की मृत्यु भी हो सकती है। 
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