भारत की आजादी में किसानोंं की भूमिका


भारत प्राचीन काल से एक कृषि प्रधान राष्ट्र रहा है। इस देश में कृषि एवं पशुपालन जीवन पद्धति रही है और आज भी है। औपनिवेसिक काल में कृषि की समृद्ध पारम्परिक व्यवस्था नष्ट हो गई तथा भारत से अधिकाधिक धन के शोषण हेतु कृषि की अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर उसे अवनत किया गया जो भारत की अर्थ-व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हुआ। भू-राजस्व के निर्धारण एवं वसूली की प्रक्रिया में ग्राम पंचायतों की उपेक्षा कर अनेक प्रणालियों का प्रयोग किया गया जो असफल रहा। सन् 1700 से 1800 के आस-पास तक भारत की समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था के कारण भारत को सोने की चिड़ियाँ कहा जाता था। उसका कारण था हमारे देश की उन्नत कृषि एवं व्यापार। उस समय पूरे दुनियाँ की लगभग एक- तिहाई कृषि उत्पादन भारत वर्ष में होता था अगर भारत चीन के उत्पादन को जोड़ दिया जाय तो यह दुनियाँ के कृषि उत्पादन का लगभग 62 प्रतिशत होता था। यही नहीं दुनियाँ के कुल व्यापार का लगभग 31 प्रतिशत व्यापार भारत द्वारा किया जाता था। अंग्रेजो के आने के पहले भारत देश अत्यन्त समृद्ध था लेकिन ब्रिटिश राज में अंग्रेजों ने जान बूझ कर भारत की पारम्परिक कृषि अर्थव्यवस्था को बर्वाद कर अंग्रेजों के अनुकूल बनाया गया जिससे भारत किसानों की दशा अत्यन्त दंयनीय हो गयी और कई अकालों का सामना करना पड़ा जिसमें लाखों किसान एवं गरीब भूख से मरे। विश्लेषण करने पर अंग्रेजी राज्य में कृषि की निम्नांकित समस्याएँ उत्पन्न हुई जो कृषकों में अशान्ति एवं आन्दोलन का कारण बनी। 1. भू-राजस्व की दूषित नीति। 
2. भू-राजस्व के निर्धारण एवं ग्राम पंचायत की उपेक्षा। 
3. भू-राजस्व की राशि निश्चित न होना। 
4. जनसंख्या की वृद्धि एवं खेतों का विभाजन। 
5. भू-राजस्व की राशि का कृषि सुधार में उपयोग न होना। 
6. राहत कार्यो का न खोजा जाना।
 7. ऋण लेने की मजबूरी। 
8. भूमि पर स्वामित्व न रहना। 
9. विकास-कर वसूली। 
10. गोहत्या का प्राविधान।
  उपरोक्त कारणों से फैले असन्तोष की वजह से भारतीय कृषकों ने देश के विभिन्न भागों में आन्दोलन किये।
1857 ईं के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों ने कुछ देशी रियासतों की सहायता से दबा तो दिया लेकिन इसके पश्चात भी भारत में कई जगहों पर संग्राम की ज्वाला लोगों के दिलों में दहकती रही। इसी बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आन्दोलन हुए। इनमें से अधिकांश आन्दोलन अंग्रेजों के खिलाफ किये गए थें। 
कितने ही समाचार पत्रों ने किसानों के शोषण उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों के पक्षपातपूर्ण व्यवहार और किसानों के संघर्ष को अपने पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित किया था। नील विद्रोह, पाबना विद्रोह तेभागा आन्दोलन, चम्पारन सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आन्दोलन के रूप में जाने जाते हैं। जहाँ 1918 ईं. का खेड़ा सत्याग्रह गाँधीजी द्वारा शुरू किया गया, वहीं मेहता बन्धुओं (कल्याण जी कुँवर जी) ने भी 1922 ईं. में बारदोली सत्याग्रह का प्रारम्भ किया था। बाद में इस सत्याग्रह का नेतृत्व सरदार बल्लभ भाई पटेल जी के हाथों में रहा।
प्रमुख किसान आन्दोलनप्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भारत में हुए प्रमुख किसान आन्दोलन इस प्रकार थे। 
नील आन्दोलन (1859-1860 ई.) 
यह आन्दोलन भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के खिलाफ बंगाल में किया गया। अपनी आर्थिक माँगों के सन्दर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आन्दोलन उस समय का एक विशाल आन्दोलन था। अंग्रेज अधिकारी बंगाल तथा बिहार के जमींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिये ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे, तथा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली सी रकम अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थो जो बाजार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को 'ददनी प्रथा' कहा जाता था।
पाबना विद्रोह (1873-1876 ईं.)- पाबना जिले के काश्तकारों को 1859 में एक एक्ट द्वारा बेदखली एवं लगान में वृद्धि के विरुद्ध एक सीमा तक संरक्षण प्राप्त हुआ था, इसके बाबजूद भी जमींदारों ने उनसे सीमा से अधिक लगान वसूली एंव उनको जमीन के अधिकार से वंचित किया। जमींदार को ज्यादती का मुकाबला करने के लिए 1873 ई. में पाबना के युसुफ सराय के किसानों ने मिलकर एक 'कृषक संघ' का गठन किया। इससंगठन का मुख्य कार्य पैसे एकत्र करना एवं सभायें आयोजित करना होता था।



दक्कन विद्रोह
महाराष्ट्र के पूना एवं अहमदनगर जिलों में गुजराती एवं मारवाड़ी साहूकार ढेर सारे हथकण्डे अपनाकर किसानों का शोषण कर रहे थे। दिसम्बर 1874 ई. में एक सूदखोर कालूराम ने किसान (बाबा साहिब देशमुख) के खिलाफ अदालत से घर की नीलामी की डिक्री प्राप्त कर ली। इस पर किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया। इन साहूकारों के विरुद्ध आन्दोलन की शुरुआत 1874 ई. में शिरूर तालुका के करडाह गाँव से हुई।
उत्तर प्रदेश में किसान आन्दोलन
होमरूल लीग के कार्यकताओं के प्रयास तथा गौरीशंकर मिश्र, इन्द्र नारायण द्विवेदी तथा मदन मोहन मालवीय के दिशा निर्देशन के परिणामस्वरूप फरवरी 1918 ई. में उत्तर प्रदेश में 'किसान सभा' का गठन किया गया। 1919 ई. के अन्तिम दिनां में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। प्रतापगढ़ जिले की एक जागीर में 'नाई धोबी बंद सामाजिक बहिष्कार संगठित कारवाई की पहली घटना थी। अवध की तालुकेदारी में ग्राम पंचायतों के नेतृत्व में किसान बैठकों का सिलसिला शुरु हो गया। झिंगुरीपाल सिंह एवं दुर्गपाल सिंह ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन जल्द ही एक चेहरे के रूप में बाबा रामचन्द्र उभर कर सामने आए। उत्तर प्रदेश के किसान आन्दोलन को 1920 ई. को प्रतापगढ़ जिले में' 'अवध किसान सभा' का गठन किया गया। प्रतापगढ़ जिले का 'खरगाँव' किसान सभा की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था। इस संगठन को जवाहरलाल नेहरू, गौरीशंकर मिश्र, माता बदल पाण्डेय, केदारनाथ आदि ने अपने सहयोग से शक्ति प्रदान की। उत्तर प्रदेश के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने 'एका आन्दोलन' नाम का आन्दोलन चलाया। इस आन्दोलन में कुछ जमीदार भी शामिल थे। इस आन्दोलन के प्रमुख नेता 'मदारी पासी' और 'सहदेव' थे। ये दोनों निम्न जाति के किसान थे।
मोपला विद्रोह (1920 ई.) 
 केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपलाओं द्वारा 1920 ई. में विद्रोह किया गया। प्रारम्भ में यह विद्रोह अंग्रेज हुकुमत के खिलाफ था। महात्मा गाँधी, शौकत अली, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद जैसे नेताओं का सहयोग इस आन्दोलन को प्राप्त था। इस आन्दोलन के मुख्य नेता के रूप में 'अली मुसलियार' चर्चित थे। 15 फरवरी, 1921 ई. को सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर खिलाफत तथा कांग्रेस के नेता याकूब हसन, यू. गोपाल मेनन, पी. मोइद्दीन कोया और के. माधवन नायर को गिरतार कर लिया। इसके बाद यह आन्दोलन स्थानीय मोपला नेताओं के हाथ में चला गया। 1920 ई. में इस आन्दोलन ने हिन्दू मुसलमानों के मध्य साम्प्रदायिक आन्दोलन का रूप ले लिया, परन्तु शीघ्र ही इस आन्दोलन को कुचल दिया गया।



कूका विद्रोह
 कृषि सम्बन्धी समस्याओं के खिलाफ अंग्रेज सरकार से लड़ने के लिए बनाये गये इस संगठन के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। 1872 ई. में इनके शिष्य बाबा राम सिंह ने अंग्रेजों का कड़ाई से सामना किया। कालान्तर में उन्हें कर रंगून (अब यांगून) भेज दिया गया, जहाँ पर 1885 ई. में उनकी मृत्यु हो गई।
रामोसी किसानों का विद्रोह- महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रमोसी किसानों ने जमींदारों के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया।
रंपाओं का विद्रोह
 आन्ध प्रदेश में सीताराम राजू के नेतृत्व में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हुआ जो 1879 ई. से लेकर 1920-22 ई. तक छिटपुट ढंग से चलता रहा। रंपाओं को 'मुट्टा' तथा उनके जमींदार को 'मुट्टादार' कहते थे। सुलिवन ने रंपाओं के विद्रोह के कारणों की जाँच की। उसने नये जमींदारों को हटाकर पुराने जमींदारों को रखने की सिफारिश की थी।
ताना भगत आन्दोलन-इस आन्दोलन की शुरुआत 1914 ईं. में बिहार में हुई। यह आन्दोलन लगान की ऊँची दर तथा चौकीदारी कर के विरुद्ध किया गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक 'जतरा भगत' थे, जिसे कभी 'विरसा', कभी 'जमी' तो कभी 'केसर बाबा' के समतुल्य होने की बात कही गयी है। इसके अतिरिक्त अन्य नेताओं में बलराम भगत, गुरुरक्षितणी भगत आदि इस आन्दोलन से सम्बद्ध थे। 'मुण्डा आन्दोलन' की समाप्ति के करीब 13 वर्ष बाद 'ताना भगत आन्दोलन' शुरू हुआ। यह ऐसा धार्मिक आन्दोलन था, जिसके राजनीतिक लक्ष्य थे। यह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नये 'पंथ' के निर्माण का आन्दोलन था। इस मायने में यह बिरसा मुण्डा आन्दोलन का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा मुण्डा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धारित किये थे।
तेभागा आन्दोलन- किसान आन्दोलनों में 1946 ईं. का बंगाल का तेभागा आन्दोलन सर्वाधिक सशक्त आन्दोलन था, जिसमें किसानों ने 'लाइड कमीशन' की सिफारिश के अनुरूप लगान की दर घटाकर एक तिहाई करने के लिए संघर्ष शुरू किया था। यह आन्दोलन जोतदारों के विरुद्ध बंटाईदारों का आन्दोलन था। इस आन्दोलन के महत्वपूर्ण नेता 'कम्पाराम सिंह' एवं 'भवन सिंह' थे। बंगाल का 'तेभागा आन्दोलन'फसल का दो-तिहाई हिस्सा उत्पीड़ित बटाईदार किसानों को दिलाने का आंदोलन था। यह बंगाल के 28 में से 15 जिलों में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। 'किसान सभा' के आह्नान पर लड़े गए इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मजदूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
तेलंगाना आन्दोलन
 आन्ध्र प्रदेश में यह आन्दोलन जमींदारों एवं साहूकारों के शोषण की नीति के खिलाफ तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध 1946 इंर्. में किया गया था। 1858 ईं. के बाद हुए किसान आन्दोलनों का चरित्र पूर्व के आन्दोलन से अलग था। अब किसान बगैर किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे। इनकी अधिकांश माँगे आर्थिक होती थीं। किसान आन्दोलन ने राजनीतिक शक्ति के अभाव में ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया। किसानों की लड़ाई के पीछे उद्देश्य व्यवस्था-परिवर्तन नहीं था, बल्कि वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे। इन आन्दोलनों की असफलता के पीछे किसी ठोस विचारधारा, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कार्यक्रमों का अभाव था।
बिजोलिया किसान आन्दोलन
 यह 'किसान आन्दोलन' भारत भर में प्रसिद्ध रहा, जो मशहूर क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में चला था। बिजोलिया किसान आन्दोलन सन 1847 से प्रारम्भ होकर करीब अर्द्ध शताब्दी तक चलता रहा। जिस प्रकार इस आन्दोलन में किसानों ने त्याग और बलिदान की भावना प्रस्तुत की, इसके उदाहरण अपवाद स्वरूप ही प्राप्त हैं। किसानों ने जिस प्रकार निरंकुश नौकरशाही एवं स्वेच्छाचारी सामंतों का संगठित होकर मुकाबला किया, वह इतिहास बन गया।
अखिल भारतीय किसान सभा (1936 ईं.) 1923 ईं. में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 'बिहार किसान सभा' का गठन किया। 1928 ईं. में 'आन्ध प्रान्तीय रैय्यत सभा' की स्थापना एन.जी.रंगा ने की। उड़ीसा में मालती चौधरी ने 'उत्तकाल प्रान्तीय किसान सभा' की स्थापना की। बंगाल में 'टेंनेंसी एक्ट' को लेकर अकरम खाँ, अब्दुर्रहीम, फजलुलहक, के प्रयासों से 1929 ईं. में 'कृषक प्रजा पार्टी' की स्थापना हुई। अप्रैल 1935 ईं. में संयुक्त प्रान्त में किसान संघ की स्थापना हुई। इसी वर्ष एन.जी.रंगा एवं अन्य किसान नेताओं ने सभी प्रान्तीय किसान सभाओं को मिलाकर एक 'अखिल भारतीय किसान संगठन' बनाने की योजना बनाई।
चम्पारन सत्याग्रह 
चम्पारन का मामला बहुत पुराना था। चम्पारन के किसानों से अंग्रेज बागान मालिकों ने एक अनुबंध कर लिया था, जिसके अंतर्गत किसानों को जमीन के 3/20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। इसे 'तिनकठिया पद्धति' कहते थे। 19वीं शताब्दी के अन्त में रासायनिक रंगों की खोज और उनके प्रचलन से नील की बाजार में गिरावट आने लगी, जिससे नील बागान के मालिक अपने कारखाने बंद करने लगे। किसान भी नील की खेती से छुटकारा पाना चाहते थे।
खेड़ा सत्याग्रह
 चम्पारन के बाद गाँधीजी ने 1918 ईं. खेड़ा किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया। खेड़ा गुजरात में स्थित है। खेड़ा में गाँधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक 'किसान सत्याग्रह' की शुरुआत की। खेड़ा के कुनबी-पाटीदार किसानों ने सरकार से लगान में राहत की माँग की, लेकिन कोई रियासत नहीं मिली। गाँधीजी ने 22 मार्चा 1918 ईं. में खेड़ा आन्दोलन की बागडोर सम्भाली। अन्य सहयोगियों में सरदार वल्लभ भाई पटेल और इन्दुलाल याज्ञनिक थे। 22 मार्च, 1918 ईं. को नाडिया डमें एक आम सभा में गाँधीजी ने किसानों का लगान अदा न करने का सुझाव दिया। लगान न अदा करने का पहला नारा खेड़ा के 'कापड़गंज' तालुका में स्थानीय नेता 'मोहन पाड्ण्या' ने दिया। गाँधीजी के सत्याग्रह के आगे विवश होकर सरकार ने यह आदेश दिया कि वसूली समर्थ किसानों से ही की जाय।
बारदोली सत्याग्रह (1920 ईं.)
 सूरत (गुजरात) के बारदोली तालुके में 1928 ईं. में किसानों द्वारा 'लगान' न अदायगी का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में केवल 'कुनबी-पाटीदार' जातियों के भू-स्वामी किसानों ने ही नहीं, बल्कि 'कालिपराज' (काले लोग) जनजाति के लोगों ने भी हिस्सा लिया। बारदोली सत्याग्रह पूरे राष्ट्रीय आन्दोलन का सबसे संगठित, व्यापक एवं सफल आन्दोलन रहा हैं बारदोली के 'मेड़ता बन्धुओं' (कल्याण जी और कुवर जी) तथा दयाल जी ने किसानों के समर्थन में 1922 ईं. से आन्दोलन चलाया था। बाद में इसका नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया। बारदोली क्षेत्र में कालिपराज जनजाति रहती थी, जिसे 'हाली पद्धति' के अन्तर्गत उच्च जातियों के यहाँ पुश्तैनी मजदूर के रूप में कार्य करना होता था।
तेलंगाना का किसान आन्दोलन (1946-1951ई.)
 हैदराबाद रियासत में तेलंगाना में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह आन्दोलन शुरू हुआ। यहाँ पर किसानों से कम दाम पर अनाज की जबरन वसूली की जा रही थी, जिसके कारण उनके अन्दर एक आक्रोश उत्पन्न हुआ। इस आन्दोलन का तात्कालिक कारण 'कम्युनिस्ट नेता' कमरैया की पुलिस द्वारा हत्या कर देना था। किसानों ने पुलिस व जमींदारों पर हमला कर दिया तथा हैदराबाद रियासत को समाप्त कर भारत का अंग बनाने माँग की। तेलंगाना कृषक आन्दोलन भारतीय इतिहास के सबसे लम्बे छापामार कृषक युद्ध का साक्षी बना।
 इस प्रकार उपरोक्त तथ्यों से स्वतः स्पष्ट है कि भारत की आजादी में किसान आन्दोलनों की प्रमुख भूमिका रही है। भारत की आजादी का वर्तमान स्वरूप अन्य के अलावा किसानों के आन्दोलन रूपी योगदान से ही सम्भव हो सका है। यद्यपि इस  देश में अंग्रेजों के समय की तरह ही आज भी किसान सबसे ज्यादा उपेक्षित है जो किसी आत्मघात से कम नहीं है। इसलिए भारत की समग्र समृद्धि के लिए कृषि एवं किसानों को शीर्ष प्राथमिकता देनी ही होगी।
      हमारे सद्गन्थों के अनुसार  अन्नं तु धान्यसंभूतं धान्यं कृष्या विना न च। तस्मात्सर्व परित्यज्य कृषि यत्नेन कारयेत्।।
अर्थात् ''भोजन अन्न से बनता है, अन्न खेती बिना उत्पन्न नहीं होता, अतएव दूसरे काम छोड़कर, सबसे पहले खेती करनी चाहिए।।''
भगवान कृष्ण भी कहते है, ''क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञान यत्तज्ज्ञानं मतं मम'' ।। गीता 2/13  अर्थात
'क्षेत्र'  (खेत), और 'क्षेत्रज्ञ' (किसान) को जानना ही मेरे मत में वास्तविक 'ज्ञान' है। 
The real Knowledge or Perception is to know the "Field" and "Farmer" in their real characteristics.