दोगुना आय का साधन ,वैज्ञानिक विधि से पशुपालन

उत्तर प्रदेश पशुधन संख्या के दृष्टिकोण से देश का सबसे बड़ा प्रदेश है। दुग्ध और मांस उत्पादन में भी उ0प्र0 अग्रणी है।देश के कुल मॉंस के निर्यात का 60 प्रतिशत उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा किया जाता है। प्रदेश के 80 प्रतिशत लघु, सीमांत एवं भूमिहीन कृषकों द्वारा पशुपालन का व्यवसाय किया जाता है। प्रदेश दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। प्रदेश के सकल प्रादेशिक घरेलू उत्पाद (Gross State Domestic Product) में पशुधन सेक्टर (डेयरी एवं पोल्ट्री) का योगदान 29 प्रतिशत है। इस प्रकार कृषि के विकास की दृष्टि से प्रदेश के लिए यह सेक्टर अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
यदि पशुपालक वैज्ञानिक बिन्दुओं पर ध्यान दे तो निश्चित तौर पर वे लाभकारी पशुपालन कर सकते हैं।
पशुपालन हेतु निम्न बिन्दुओं पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होता है :-



1. पशु प्रबन्धन (Animal Management)
2. पशु प्रजनन (Animal Breeding)
3. पशु आहार व्यवस्था (Animal Feeding)
4. पशु रोग नियंत्रण (Animal disease control)
5. नवजात पशुओं का देख-भाल
*पशुओं के रहने वाले स्थान की अच्छी तरह से सफाई होनी चाहिए।
*पशुबाड़ा हवादार होना चाहिए जिसमें स्वच्छ हवा एवं प्रकाश का आवागमन सुगमता से हो सके।
*पशुओं के चरही को रोजाना अच्छी तरह सफाई किया जाना चाहिए।
*पशुओं को रखने वाले स्थान मानक के अनुरूप ही पशु रखे जिससे पशुओं को चोटिल होने से बचाया जा
सके।
*पशुओं को पीने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी उपलब्ध होना चाहिए।
*पशुबाड़ा की फर्श खुरदरी एवं नाली के तरफ 1.5 प्रतिशत ढलान होनी चाहिए।
*पशुओं के गर्मी में आने के लक्षण की जानकारी पशुपालक को सजग रूप से होनी चाहिए।
*मादा पशुओं के गर्मी में आने के 12 से 14 घण्टें बाद ही कृत्रिम गर्भाधान/प्राकृतिक गर्भाधान कराना
चाहिए।
*मादा पशु लगभग 21 दिन के अन्तराल पर पुनः गर्मी में आती है। अतः 21 दिन बाद गर्मी के लक्षण आने की
निगरानी करनी चाहिए।
*मादा भैसों में विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि उसमें गर्मी के लक्षण अधिक स्पष्ट नही होते।
गर्मी में आने वाले पशुओं को कृत्रिम गर्भाधान से ही गर्भित कराना चाहिए जिससे उच्चकोटि के संतति
उत्पन्न हो।



*वर्तमान समय में पशुपालन विभाग द्वारा गायों में साहीवाल, गंगातीरी, हरियाणा, थारपारकर वर्गीकृत वीर्य
का उपयोग कर उच्च कोटि के मादा संतति को पैदा किया जा रहा है।
*पशुपालक को गाय की स्वदेशी नस्ल का (साहीवाल, हरियाणा, गंगातीरी, गिरि, थारपारकर) पालन करना
चाहिए एवं भैसों में मुर्रा एवं भदावरी प्रजाति के पशुओं को पालना चाहिए।
*पशुपालकों को जमुनापारी एवं बरबरी प्रजाति की बकरियों का पालन करना चाहिए।
*पशुपालकों को नाली एवं मगरा, जालौनी एवं मुजफ्फरनगरी प्रजाति की भेड़ों का पालन करना चाहिए।
*पशुपालकों को अण्डा उत्पादन के लिए मुर्गी की व्हाईट लेगहार्न एवं मीट के लिए ब्रायलर को पालना
लाभकारी होता है।
*सामान्तया एक वयस्क पशु को प्रतिदिन 6 किलो भूसा तथा 15 से 20 किलो तक हरा चारा खिलाना चाहिए।
*फलीदार एवं बिना फलीदार हरे चारे को समान अनुपात में मिलाकर खिलाना चाहिए।
*अधिक हरे चारे की उपलब्धता होने पर हरे चारे को सुखा कर हे या गढ्ढे में दबाकर साईलेज बनाकर
संरक्षित रखना चाहिए।
*पशुओं को स्वस्थ्य रखने व उनके दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लिए संतुलित पशु आहार/बाई पास प्रोटीन
आहार खिलाना चाहिए।
*जब पशुओं को खिलाने हेतु सूखा चारा उपलब्ध हो तो यूरिया मोलेसेस मिनरल ब्लाक का उपयोग किया
जाना चाहिए।
*पशुओं को प्रतिदिन अच्छी गुणवत्ता का मिनरल मिक्सचर पाउडर खिलाना चाहिए।
*पशुओं का आहार अचानक न बदलकर धीरे-धीरे बदलना चाहिए।
*हरे चारे की बुआई सीजन के अनुसार किया जाना चाहिए। जैसे रबी सीजन में बरसीम, जई, लूसर्न, सरसों,
शलजम एवं खरीफ सीजन में ज्वार, बाजरा, मक्का, चरी, लोबिया तथा जायद सीजन में सारघम, सुडान
ग्रास, गिनी ग्रास, दीनानाथ ग्रास आदि की बुआई करना चाहिए।
जैसा हम सभी जानते हैं कि किसी भी बीमारी के होने से पहले उसका बचाव ही आवश्यक है। पशुओं में कुछ
बीमारियां ऐसी है जिनका समय से उपचार न होने से पशुओं की मृत्यु निश्चित है।
 बीमारी का नाम      


गला घोटू   
लक्षण :- जीवाणु जनित बीमारी तेज बुखार, गले तथा वर्षा पूर्व गलाघोटू का टीका जबडें में सूजन, सास लेने मे कठिनाई के कारण घुर्र-घुर्र की आवाज, मुह से लार आना आदि।
बचाव :- वर्षा पूर्व गलाघोटू का टीकालगवाये।
2. लंगड़ा बुखार :- तेज बुखार, कन्धें एवं पुट्ठों में सूजन को दबाने पर चरचराहट की आवाज।
बचाव :- वर्षा पूर्व टीका लगवाये।
3. चकरी रोग (सर्रा)  
लक्षण :-  बुखार, लार आना, चारा न खाना, गोल चक्कर 
बचाव :- समीप के एवं ऑख का लाल होना। पशुचिकित्सालय पर इलाजकराये।
4. खुरपका-मुॅह पका रोग  
लक्षण :-  अचानक तेज बुखार आना, पशु बेचैन रहना, मसूडों, जीभ एवं खुरों में छाले निकलना।  
बचाव :- मार्च एवं नवम्बर में टीकाकरण अवश्य कराये।
5. नवजात पशुओं की देख-भाल -
*जन्म के तत्काल बाद पशुओं के बच्चे की नाक और उसके मुॅह को साफ करना आवश्यक है।
*नवजात बच्चों की छाती पर धीरे-धीरे मालिश करे जिससे उसे सॉस लेने में आसानी हो।
*नाल (नैवेल कार्ड) को 2 इंच की दूरी पर धागे के साथ बॉध दें तथा बची हुई नाल को साफ कैची से काट
कर उस पर टिंक्चर आयोडीन लगाये जिससे की नाल में संकमण को रोका जा सके।
*जन्म के बाद आधे घण्टे के भीतर नवजात को मॉ के दूध (खीस) को पिलाये।
*21वें दिन कृमिनाशक दवा दे तदोपरान्त 6 से 8 माह तक महीने में एक बार।
*चार माह से ऊपर की आयु होने पर टीकाकरण अवश्य कराये।
पशुपालन विभाग की योजनाएं-
*गाय/भैंसों में कृत्रिम गर्भाधान एवं प्राकृतिक गर्भाधान द्वारा पशु प्रजनन की सुविधाओं का सुधार एवं विस्तार
करने की योजना।
*गाय/भैसों एवं अन्य पशुओं में बॉझपन निवारण की योजना (राज्य योजना)।
*अतिहिमीकृत वीर्य उत्पादन केन्द्र-स्थानीय प्रजातियों यथा साहीवाल, गंगातीरी, हरियाणा व गिर प्रजाति
की गायों एवं मुर्रा व भदावरी प्रजाति के भैंसों की उन्नत नस्ल सुधार कार्यक्रम।
*खुरपका, मुंहपका रोग नियंत्रण कार्यक्रम (100 प्रतिशत केन्द्र पोषित) निःशुल्क टीकाकरण सुविधा।
*कुक्कुट पालन की 10,000 कामर्शियल लेयर्स पंक्षियों की योजना- योजना की कुल लागत रू0 70 लाख,
लाभार्थी अंश रू0 20 लाख तथा बैंक लोन रू0 50 लाख 12 प्रतिशत की दर पर (विभाग द्वारा 10 प्रतिशत)।
*कुक्कुट पालन की 30,000 लेयर्स की योजना-योजना लागत रू0 180 लाख, लाभार्थी अंश रू0 54 लाख,
बैंक लोन रू0 126 लाख बैंक ब्याज दर 12 प्रतिशत (विभाग द्वारा 10 प्रतिशत)।
*बैकयार्ड कुक्कुट पालन योजना (ग्रामीण क्षेत्र के अनुसूचित जाति/अनु0 जनजाति के बी0पी0एल0 श्रेणी के
लाभार्थियों को 50 चूजें तथा कुक्कुट आहार एवं छप्पर की व्यवस्था करने हेतु धनराशि देय)
*सूकर प्रक्षेत्रों की स्थापना, विकास सुदृढ़ीकरण एवं प्रजनन सुविधाएं उपलब्ध कराना।
*चारा उत्पादन- विभाग द्वारा बीज विक्रय रबी में बरसीम एवं जई तथा खरीफ में लोबिया। वर्ष भर हरे चारे
का प्रबंधन न्यूनतम 150 दिन हेतु अवश्य किया जाए।


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