कार्बनिक खेती एवं हरी खाद

भारत दुनिया का सबसे बड़ा कृषि प्रधान देश है। आजादी के समय हमारे देश में किसान व उसके कारोबार से जुड़े लोगों की संख्या 90 प्रतिशत थी। समय बदलता रहा। कृषि भूमि का क्षेत्रफल लगातार कम होता रहा जिस वजह से एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार यह आंकड़ा अब 60 प्रतिशत के पास के पास पहुंच गया है। एक अनुमान के अनुसार हर वर्ष खेती की जमीन 3 प्रतिशत कम हो जाती है। देष गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। अर्थव्यवस्था को कृषि सबसे ज्यादा स्थिरता प्रदान करती है। 1940 में देश के सफल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खेती का हिस्सा 50 प्रतिशत था जो घटकर अब 14 प्रतिशतरह गया है। वर्श 2014 के लिए राश्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनपएसएसओ) द्वारा पेश  आंकड़ों के मुताबिक कृषि पर निर्भर लोगों की आय महज 3078 रुपये है। हमें अपने देश के लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए सारी बातों से ऊपर उठकर किसान की तरक्की व उसकी रक्षा के लिए डटकर उसके साथ खड़ा होना होगा। क्योंकि देश में अभी तक किसानों के लिए कोई स्थाई कृषि व खाद्यान्न नीति नहीं बन पाई है, जिसकी वजह से किसान अपनी समस्याओं से स्वयं ही जूझता रहता है। किसान जब अपनी फसल बेचता रहता है, तो उसका भाव बहुत कम होता है। जब वही फसल बाजार में पहुंच जाती है तो उसक भाव काफी बढ़ जाता है। इसके बाद जमाखोरों के गोदामों में पहुंच जाने पर उसी फसल की कीमत कई गुणा हो जाती है। किसानों को यदि अपने द्वारा ही उत्पादन की कई चीजें को बाजार से खरीदना पड़े तो भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उस समय किसान अपने को ठगा हुआ महसूस करता है। किसान देश के लोगों की जीविका के लिए अनाज, दलहन, तिलहन, फल, सब्जी, साग, दूध सहित अनेक चीजां का उत्पादन करता है। आजादी के समय हमारे देष की आबादी 34 करोड़ के पास थी, जो अब 125 करोड़ को पार कर गई है। यदि जनसंख्या इसी तरह बढ़ती रही और खेती की जमीन घटती रही तथा किसानों की उपेक्षा जारी रही तो देष भयानक संकट की ओर बढ़ता जाएगा। किसानों की उपेक्षा जारी रही तो देश भयानक संकट की ओर बढ़ता जाएगा। किसानों की उपेक्षा जारी रही तो देश भयानक संकट की ओर बढ़ता जाएगा। कभी सूखा कभी भारी वर्शा, बरसात से बाढ़, आंधी तूफान, पाला व ओले गिरने से फसलें खराब व नष्ट हो जाती है।
1 सामान्य उपज के लिए जरूरी है फसल प्रबन्धन
प्रबन्ध या मैनेमेंट किसी भी व्यापार-व्यवसाय में जितना जरूरी है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है फसल उत्पादन में फसल उत्पादन में जोखिम व्यापार-व्यवसाय की अपेक्षा कई गुना ज्यादा है। आदर्श फसल प्रबन्धन का सबसे पहला व महत्वपूर्ण घटक है, वानस्पतिक विविधता। प्रकृति में पेड़, झाड़ी, बहुवर्षीय फसलें, एकवर्षीय फसलें, मौसमी घास, चारे आदि अनेक वर्ग के पेड़-पौधे पाए जाते हैं।
फसलों में भी अनाज, दलहन, तिलहन, रेशा, शकर, पशु चारा, औषधि व सुरभीय फसलों में से उपयुक्त मिलान किए जा सकते हैं। ये उपयोग की दृष्टि से ही नही,ं वरन् वानस्पतिक कुल के हिसाब से भी अलग-अलग वर्ग के हैं। इनकी मौसम, मिट्टी और पोषण संबंधी जरूरतें अलग-अलग होती है। इसलिए इन्हें मिलाकर मिश्रित फसल या अंतरवर्ती फसल पद्धति से उगाए जाने पर मिट्टी, मौसम, पोषण, सिंचन, कीड़े और रोग संबंधी जोखिम भी कम होने की संभावना रहती है।
इस पद्धति से किसान को किसी न किसी फसल की अच्छी उपज मिलकर दूसरी फसल की कम उपज की क्षतिपूर्ति हो ही जाती है। इसी रबी के मौसम में छः-सात सिंचाई वाले गेहूँ एक हैक्टेयर में लगाने की अपेक्षा एक या दो सिंचाई चाहने वाले गेहूँ एक हैक्टेयर में लगाने पर उतने ही पानी में कुल उत्पादन अधिक मिल सकता है। सीमित सिंचाई वाले गेहूँ की अकेली फसल की अपेक्षा गेहूँ के साथ चना, अलसी, सरसों आदि फसलें अलग-अलग कतारों में अंतरवर्ती फसल के रूप में लेना अधिक लाभदायक हो सकता है। कतारों का अनुपालन मुख्य और सहायक फसल में अलग-अलग रखा जा सकता है। मुख्य फसल की कतारों की संख्या अधिक और सहायक फसल की कतारों की संख्या कम रखी जाती है। उज्जैन व मंदसौर क्षेत्र में गेहूँ की 8-10 कतारों के बाद सरसों, राई की दो कतारें लगाई जाती हैं। गेहूँ (सीमित सिंचाई) की 4 या 6 कतारों के साथ चने या अलसी की दो कतारें लगाई जा सकती हैं। इसी प्रकार जौ की 4-6 कतारों के साथ चने की दो कतारें बोई जा सकती है। असिंचित क्षेत्रों में एक बार पलेवा करके अलसी, मसूर या चना लगाया जाता है। यहाँ भी अलसी दो कतारों के बच चना या मसूर की दो कतारें लेना लाभदायक हो सकता है।
सामान्यतः अलसी की चार से आठ कतार की पट्टियाँ गेहूँ या चने के खेत के आसपास लगाई जाती है। अलसी के पौधों को पशु नही चरते हैं, इसलिए ये फसलें भी नुकसान से बच जाती हैं।
अंतरवर्ती फसल पद्धति में मुख्य फसल की उपज उस अकेली फसल से कुछ कम हो जाती हैं, परन्तु मुख्य व सहायक दोनों फसलों की उपज मुख्य फसल की अकेली उपज से सवा से डेढ़ गुना तक मिल जाती हैं। साथ ही सहायक फसल दलहन वर्ग की हो तो उसके द्वारा वातावरण से ली गई नत्रजन मुख्य फसल को भी मिल जाती है। इस प्रकार उर्वरक पर होने वाले खर्च में कुछ कमी की जा सकती है।
अंतरवर्ती फसल पद्धति में मौसम की असामान्यता व रोग कीड़ों से हानि तथा एक ही फसल की उपज के बाजार भाव में होने वाले उतार-चढ़ाव की जोखिम दो फसलों के उत्पादन के कारण कम होने की संभावना रहती है। यदि आप एक ही फसल लेना चाहते हैं तो उसकी भी एक ही किस्म उगाने की अपेक्षा अलग-अलग तीन-चार किस्में उगाना कम जोखिम भरा होगा।
2. हरी खाद
कृषि में हरी खाद उस सहायक फसल को कहते है जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्वों को बढ़ाने तथा उसमें जैविक पदार्थों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। प्रायः इस तरह की फसल को इसके हरी स्थिति में ही हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। हरी खाद में भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है और भूमि की रक्षा होती है।
मृदा के लगातार दोहन से उसमें उपस्थित पौधे की बढ़वार के लिये आवश्यक तत्व नष्ट होते जा रहे हैं। इनकी क्षतिपूर्ति हेतु व मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाने रखने के लिये हरी खाद एक उत्तत विकल्प है। बिना गले-सड़े हरे पौधे(दलहनी एवं अन्य फसलों अथवा उनके भाग)  को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता है तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं।
हरी खाद के उपयोग से न सिर्फ नत्रजन भूमि में उपलब्ध होता हैं बल्कि मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में भी सुधार होता है। वातावरण तथा भूमि प्रदूषण की समस्या को समाप्त किया जा सकता है लागत घटने से किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, भूमि में सूक्ष्म तत्वों की आपूर्ति होती है साथ ही मृदा की उर्वरा शक्ति भी बहेतर हो जाती हैं।
हरी खाद के लाभ
1. हरी खाद केवल नत्राजन व कार्बनिक पदार्थो का ही साधन नहीं है बल्कि इससे मिट्टी में कई अन्य आवश्यक पोषक तत्व भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
2. हरी खाद के प्रयोग में मृदा भुरभुरी, वायु संचार में अच्छी, जलधारण क्षमता में वृद्धि, अम्लीयता/क्षारीयता में सुधार एवं मृदाक्षरण में भी कमी होती हैं।
3. हरी खाद के प्रयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है तथा मृदा की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता भी बढ़ती हैं।
4.हरी खाद में मृदाजनित रोगों में भी कमी आती हैं।
5.इसके प्रयोग से रसायनिक उर्वरकों में कमी करके भी टिकाऊ खेती कर सकते है।
हरी खाद प्रयोग में कठिनाईयाँ
(क) फलीदार फसल में पानी की काफी मात्रा होती है परन्तु अन्य फसलों में रेशा काफी होने की वजह से मुख्य फसल (जो हरी खाद के बाद लगाना हो) में नत्रजन की मात्रा काफी कम हो जाती है।
(ख) चूंकि हरी खाद वाली फसल के गलने के लिए नमी की आश्यकता पड़ती हैं तथा कई बार हरी खाद के पौधे नमी जमीन से लेते हैं जिसकें कारण अगली फसल में सूखे वाली परिस्थितियाँ पैदा हो जाती है।
हरी खाद के व्यावहारिक प्रयोग
(क) उन क्षेत्रों में जहां नत्रजन तत्व की काफी कमी हों।
(ख) जिन क्षेत्रों की मिट्टी में नमी की कमी कम हो।
(ग) हरी खाद का प्रयोग कम वर्षा वाले क्षेत्र में न करें। इन क्षेत्रों में नमी का संरक्षण मुख्य फसल के लिए अत्यन्त आवश्यक है। ऐसी अवस्था में नमी की संरक्षण के अन्य तरीके अपनायें।
(घ) जिनके तने तथा जडे़ काफी मात्रा में पानी प्राप्त कर सकें।
(ड) ये वे फसले होनी चाहिए जो जल्दी ही जमीन की सतह को ढक लें। चाहे जमीन रेतीली या भारी या जिसकी बनावट ठीक न हो में ठीक प्रकार बढ़ सकें।
(च) जब ऊपर बतायी बातें फसल में विद्यमान हों तो फलीदार फसल का प्रयोग अच्छा होता है क्योंकि उन फसलों से नत्राजन भी प्राप्त हो जाती है।
हरी खाद वाली फसलें



हरी खाद के लिए दलहनी फसलों में सनैइ (सनहेम्प), ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग, ग्वार आदि फसलों का उपयोग किया जा सकता है। इन फसलों की वृद्धि शीघ्र, कम समय में हो जाती हैं पत्तियाँ बड़ी वजनदार एवं बहुत संख्या में रहती हैं, एवं इनकी उर्वरक तथा जल की आवश्यकता कम होती हैं, जिससे कम लागत में अधिक कार्बनिक पदार्थ प्राप्त हो जाता है। दलहनी फसलों में जड़ों में नाइट्रोजन को वातावरण से मृदा में स्थिर करने वाले जीवाणु पाये जाते हैं।
अधिक वर्षा वाले स्थानों में जहां जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सनई का उपयोग करें, ढैंचा को सूखे की दशा वाले स्थानों में तथा समस्याग्रस्त भूमि में जैसे क्षारीय दशा में उपयोग करें। ग्वार को कम वर्षा वाले स्थानों में रेतीली, कम उपजाऊ भूमि में लगायें। लोबिया को अच्छे जल निकास वाली क्षारीय मृदा में तथा मूंग, उड़द को खरीफ या ग्रीष्म काल में ऐसे भूमि में ले जहां जल भराव न होता हो। इससे इनकी फलियों की अच्छी उपज प्राप्त हो जाती है तथा शेष पौधा हरी खाद के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है।
3. गोबर से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया
आप अपना जैविक खाद गोबर से केसे बना सकते हैं? कोई भी माली या किसान अगर पौधे को बढ़ाने के मकसद से मिट्टी में जैविक तत्व या पोषक तत्व मिलाता है तो उसे फायदा होगा। ऐसी स्थिति में सबसे फायदेमंद और मशहूर चीज है कम्पोस्ट या जैविक खाद। कम्पोस्ट को किसी भी उद्यान या बगीचा आपूर्ति केंद्र से खरीद सकते हैं लेकिन अपना कम्पोस्ट बनाना ना सिर्फ आसान है। बल्कि खर्च भी बहुत कम पड़ता है।
गोबर की खाद में वनस्पति और पशुओं के अपशिष्ट का इस्तेमाल वनस्पतियों के पोषक ततव के स्त्रोत की तरह किया जाता हैं इन अपशिष्ट के अपघटन या सड़ने के बाद वो पोषक ततव का रिसाव करते हैं। फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए जानवर, आदमी और सब्जियों के अपशिष्ट के संकलन और इस्तेमाल की कला उतनी ही पुरानी है जितनी की कृषि। गोबर की खाद या मैन्योर जानवर, आदमी और पौधों के अवशेष से प्राप्त जैविक तत्व है जिसमें पौधों के पोषक तत्व जटिल जैविक रूप में मौजूद होते हैं। प्राकृतिक तौर पर घटित या कृत्रिम रसायनों से युक्त सामग्री जिसमें वनस्पतियों के लिए पोषक तत्व मौजूद होता है। उर्वरक कहलाता है। कम पोषक तत्व वाले खाद, प्रति ईकाई मात्रा पर गुणवत्ता का लंबे समय तक अवशेष का प्रभाव उच्च पोषक तत्वों से युक्त रसायन उर्वरक या खाद के मुकाबले मिट्टी के भौतिक गुणधर्म में सुधार पर होता है। खाद के अहम आगत श्रोत निम्नवत हैं। पशुशाला अवशेष गोबर, पेशाब और बायो गैस से निकलनेवाला गारा या पतला मसाला मानवीय निवास अवशेष- रात्रि मिट्टी मानवीय मूत्र, शहरों का कचरा, नाली से बहनेवाला पानी इत्यादि, कीचड़ और कूड़ा-करकट पॉल्ट्री जिटर, भेड़ और बकरियों की गोबर या लीद।
बूचड़खाने के अवशिष्ट-अस्थिचूर्ण मीट मील, ब्लडमील, सींग और हूफमील और मछलियों का अवशिष्ट।
कृषि उद्योगों का उप उत्पाद-खली, खोई (गन्ने की पेराई के बाद निकला हुआ) और छापेखाने की मिट्टी, फल और सब्जियों के 4 प्रसंस्करण वाले अवशिष्ट
फसलों का अवशेष-गन्ने का कचरा या अवशेष, फसल की कटाई के बाद बचा हुआ पुआल और दूसरी इसी तरह की जुड़ी हुई चीजें जल कुंभी, घास-फूस और तालाब की कीचड़ और हरी खाद की फसलें और हरी पत्तियों जो खाद के लिए सामग्री हैं पोषक तत्वों के गाढ़ेपन या सघनता के हिसाब से खाद का वर्गीकरण-भारी जैविक खाद और सघन जैविक खाद के तौर पर किया जा सकता है।
5 भारी जैविक खाद
भारी जैविक खाद में पोषक तत्वों का प्रतिशत कम होता है और इनका इस्तेमाल अधिक मात्रा में किया जाता है। फर्म की खाद कम्पोस्ट और हरी-खाद ज्यादा महत्वपूर्ण और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किये जाने वाले भारी जैविक खाद हैं। इस्तेमाल करने पर भारी जैविक खाद के कई फायदे हैं। ये पौधे को पोषक और सूक्ष्म पोषक तत्व पहुंचाते हैं।
ये मिट्टी के भौतिक गुणधर्म में सुधार करते हैं जैसे ढांचा, पानी संग्रहण की शक्ति इत्यादि।
ये पोषक तत्व की उपलब्धता का इजाफा करते हैं। कार्बन डायऑक्साइड खाद के मामले में जब अपघटन होता है तो कार्बन डायऑक्साइड निकलता है और पौधे के परजीवी गोल कीड़ा और कवक या फफूंद पर मिट्टी के अन्दर सूक्ष्मजीव के संतुलन में बदलाव कर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है।
भेड़ और बकरियों की लीद में फार्म की खाद या कम्पोस्ट के मुकाबले पोषक तत्व की उच्च मात्रा पाई जाती है। एक अंदाज के मुताबिक, खाद में तीन फीसदी नाइट्रोजन, एक फीसदी यानी फोस्फोरस पेंटोक्साइड और दो फीसदी यानी पोटैशियम ऑक्साइड पाया जाता है। इनका खेत में दो तरीके से इस्तेमाल किया जाता हैं अपघअन के लिए भेड़ और बकरियों की सफाई के लिए शेड गड्डे में रखे जाते हैं और बाद में इसका इस्तेमाल खेतों में किया जाता है। इस तरीके से मूत्र में मौजूद पोषक तत्व बर्बाद हो जाता है। दूसरी पद्धति में, भेड़ों और बकरियों को रातभर खेत में बांध कर रख जाता है और इसके मूत्र और मल को मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके लिए खेत में एक छोटा सा गड्डा कर दिया जाता है।
6 कुक्कुट खाद



पक्षियों का मल-मूत्र बहुत जल्दी उफनता है यानी खमीर बन जाता हैं अगर यह खुला रह गया तो 30 दिन के भीतर इसका 50 फीसदी नाइट्रोजन बर्बाद हो जाता है। खाद में दूसरी भारी जैविक खाद के मुकाबले भारी मात्रा में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस पाया जाता है। इसके पोषक तत्व में नाइट्रोजन 3.03 फीसदी, यानी फोस्फोरस पेंटोक्साइड 2.63 फीसदी, 20 यानी पोटैशियम ऑक्साइड 1.4 फीसदी की औसत मात्रा पाई जाती है।
7 संकेन्द्रित जैविक खाद
भारी जैविक खाद के मुकाबले संकेन्द्रित जैविक खाद में पोषक तत्व की काफी उच्च मात्रा पाई जाती है। महत्वपूर्ण संकेन्द्रित जैविक खाद हैं, खली, ब्लडमील, मछली खाद आदि। ये सभी जैविक नाइट्रोजन खाद के नाम के तौर पर भी जाने जाते है। जब तक कि फसलें इनके जैविक नाइट्रोजन को इस्तेमाल कर सके तब तक यह जीवाणु-संबंधी तरीके से प्रयोग करने लायक अमोनियाइ्र नाइट्रोजन और नाइट्रेट नाइट्रोजन में तब्दील हो जाते हैं। इस वजह से ये जैविक खाद अपेक्षाकृत धीरे काम करते हैं, लेकिन वो उपलब्ध नाइट्रोजन को लंबे समय तक प्रदान करते रहते है।
खली खाद



तिलहन से तेल निकालने के बाद, बचा हुआ ठोस हिस्सा केक की तरह सूखा होता है, उसक इस्तेमाल खाद की तरह किया जा सकता है। खली दो तरह के होते है।
1.खानेवाले तेल की खली को सुरक्षित तरीके से पशुओं को खिलाया जा सकता हैं, जैसे कि मूंगफली की खली, नारियल की खली आदि और
2.गैर खाने वाले तेल की खली जो कि मवेशियों के चारे के लिए सुरक्षित नहीं होता है, जैसे कि अरंडी की खली, नीम की खली, महुआ की खली आदि।
खाने वाले और गैर खानेवाले दोनों ही तरह की खलियों का इस्तेमाल खलियों को मवेशियों को खाने के लिए और गैर खानेवाली खली का इस्तेमाल खाद की तरह खासकर बागवानी की फसलों के लिए किया जाता है। धातु के रूप में बदलने के बाद खली में पोषक तत्व मौजूद रहते है और इन्हें 7 से 10 दिनों के बाद फसलों में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध करा दिया जाता है। जल्दी से अपघअन और बराबर वितरण के लिए इन खलियों को पाउडर की तरह चूर कर तैयार कर लेना चाहिए और उसके बाद उसका इस्तेमाल करना चाहिए।
8 खाद के निवेश से जैविक कम्पोस्ट का निर्माण
कम्पोस्ट बनानाः कम्पोस्अ बनाना एक तकनीक या प्रक्रिया है जिसमें प्राकृतिक अपघटन या गलने की प्रक्रिया को तेज कर दिया जाता है। यह तकनीक जैविक अवशेष को गीली घास में तब्दील कर देता है जिसका इस्तेमाल मिट्टी को उपजाऊ और अच्छी हालत में लाने के लिए किया जाता है। पत्तियों का अवशेष प्राकृतिक तौर पर दो साल में अपघटित हो जाता है। मानवीय नियंत्रण को देखते हुए कम्पोस्अ बनाने की प्रक्रिया एक साल से लेकर मात्र 14 दिन तक भी चल सकती है।
जैविक कम्पोस्ट निर्माण में लगने वाली सामग्री आंगन या बाड़े की अधिकांश अवशिष्ट का इस्तेमाल जैविक कम्पोस्ट बनाने के लिए किया जा सकता है जिसमें पत्तियां, घास की कतरने, पौधों का उपयोग कर सकते हैं।
9 फार्म की खाद (एफएमवाई)
1.-फार्म की खाद जानवरों के गोबर और मूत्र के साथ भूसे के ढेर और मवेशियों के चारे का अपघटित मिश्रण होता है। एक औसत अनुमान के मुताबिक अच्छी तरह से अपघटित फार्म की खाद में नाइट्रोजन का 0.5 फीसदी, यानी फास्फोरस पेंटोक्साइड का 0.2 फीसदी और यानी पोटैशियम ऑक्साइड का 0.5 फीसदी होता है। फार्म की खाद को बनाने का किसानों के मौजूदा तरीके में कमी है, उसमे ंदोष है। मूत्र जो कि बर्बाद कर दिया जाता है उसमें एक फीसदी नाइट्रोजन और पोटैशियम की 1.35 फीसदी मात्रा पाई जाती है। मूत्र में मौजूद नाइट्रोजन अधिकांशतः यूरिया के रूप में होता है जो कि वाष्प् के तौर पर खत्म होने वाला रहता है। यहां तक भंडारण के वक्त भी निक्षालन और वाष्पीकरण की वजह से पोषक तत्व खत्म हो जाता है। हालाकि यह व्यवहार के तौर पर ऐसे नुकसान को एक साथ रो पाना असंभव है, लेकिन इसमें कमी जरूर लाई जा सकती है। इसके लिए फार्म की खाद को बनाने के लिए कुछ विकसित तरीके अपनाने होंगे। इसके लिए 6 मी से 7 .5 मी की लंबाई, 1.5 मी से 2.0 मी चौड़ाई और 1.0 मी गहराई की खाईयां खोदी जाती है। 
2-.सभी उपलब्ध भूसे के ढेर और अवशिष्ट या मलबा को मिट्टी के साथ मिला दिया जाता है ओर छाया में फैला दिया जाता है ताकि वो मूत्र को सोख सके। अगले दिन सुबह, मूत्र का सोखा गया अवशिष्ट या मलबे को गोबर के साथ जमा कर लिया जाता है और उसे गड्ढे में रख दिया जाता है। गड्ढे के एक हिस्से के एक सिरे को इस तरह के अवशिष्ट से भरने के लिए चुन लेना चाहिए। जब वो भाग जमीन से करीब 45 सेमी से 60 सेमी की ऊंचाई तक भर जाता है तब ढेर के हिस्से को गुंबद की तरह बना दिया जाता है और उसे गोबर से प्लास्टर यानी उसकी लिपाई कर दी जाती है। यह प्रक्रिया चलती रहती है और जब पहला गड्ढा पूरी तरह भर जाता है तब दूसरा गड्ढा तैयार किया जाता है।
3.-गुंबद पर प्लास्टर या लिपाई के करीब चार से पांच महीने के बाद खाद इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है। अगर मूत्र का संग्रह क्यारी में नहीं किया जाता है तो इसे जानवरों के धोने वाले शेड में जहां सीमेंट का गड्ढा होता है। वहां जमा किया जा सकता है जो बाद में फार्म की खाद वाले गड्ढे में मिला दिया जाता है। यहां साधारण तौर पर इस्तेमाल किया जानेवाला रसायन जिप्सम और सुपरफॉस्फेट होता है। जिप्स को मवेशी के शेड में फैला दिया जाता है जो मूत्र को सोख लेता है और वो मूत्र में मौजूद यूरिया के वाष्पाकरण को रोक लेता है और वो उसमें कैल्सियम और सल्फर को जोड़ देता है। नुकसान को कम करने में सुपरफॉस्फेट भी इसी तरह काम करता है और फॉस्फोरस की मात्रा को बढ़ा देता है।
4-.ऑशिक तौर पर गला हुआ फार्म की खाद का प्रयोग बुआई के तीन से चार सप्ताह पहले किया जाता है, जबकि पूरी तरह से गला हुआ खाद का प्रयोग बुआई से ठीक पहले किया जाता है। आमतौर पर 10 से 20 टन प्रति हेक्टेयर खाद का प्रयोग किया जाता है, लेकिन 20 टन प्रति हेक्टेयर से अधिक का इस्तेमाल चारे वाली घास और सब्जियों के लिए किया जाता है। इस तरह के मामले में फार्म की खाद का इस्तेमाल 15 दिन पहले किया जाना चाहिए ताकि नाइट्रोजन के निसंचालन से बचा जा सके। मौजूदा पद्धति में खेतों में खाद को छोटे से ढेर में जहां-तहां लंबे वक्त के लिए छोड़ देने से नाइट्रोजन का नुकसान होता है। इस तरह के नुकसान को कम किया जा सकता है, इसके लिए इस्तेमाल किए जा रहे खाद को फैलाना होगा और तुरंत इसकी जुताई करनी होगी।
5-.सब्जियों की फसलें जैसे कि आलू, टमाटर, शकरकंद, गाजर, मूली, प्याज आदि को फार्म की खाद से बहुत फायदा होता है। दूसरे फायदा उठाने वाली फसलें हैं गन्ना, चालव, नेपियर घार और बगीचा वाली फसलों में नारंगी, केला, आम और नारियल।
6-.पोषक की पूरी मात्रा जो फार्म की खाद में मौजूद रहता है वो तुरंत नहीं मिलता है। नाइट्रोजन की करीब 30 फीसदी, फॉस्फोरस की 60 से 70 फीसदी और पोटैशियम की 70 फीसदी मात्रा पहली फसलों में मौजूद होती है।