बेलपत्र और  फलों का शिवरात्रि में महत्व

                                                                   


                                                            डा.  शैलेंद्र राजन निदेशक
                                                    केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान,


                                                        रहमानखेड़ा, लखनऊ 226101



बेलपत्र और  फलों के बिना  शिवरात्रि के दिन शिव मंदिरों में पूजा की कोई कल्पना नहीं कर सकता है|  आमतौर पर बेलपत्र चढ़ाते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता है कि बेल का फल कितना बड़ा है और बेलपत्र किस प्रकार के फल देने वाले पेड़ का है| यही कारण है की शिवरात्रि के दिन छोटे बड़े सभी तरह के फल देने वाले बेल के पौधों का उपयोग होता है| शिव पूजा में बेल के पत्तों एवं फलों के  उपयोग ने इसके लाखों पौधों को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है|


कुछ दशक पहले, छोटे फल वाले  बेल के पौधों की  भरमार थी क्योंकि इनका मुख्य उद्देश पूजा के लिए बेलपत्र का उपयोग ही था| आज बेल को व्यवसायिक स्तर प्राप्त हो गया है और बेलपत्र के अतिरिक्त फलों के औषधीय महत्व के कारण इसकी खेती के प्रति किसान उत्साहित हैं|  बाजार में अच्छा दाम मिल रहा है और धीरे-धीरे फलों की भी  मांग भी बढ़ती जा रही है वर्तमान में अच्छे आकार के,  अधिक गूदे वाले,  कम बीज और श्लेष्मा वाले  फलों की अधिक मांग है|


ग्राफ्टिंग की तकनीकी के विकसित हो जाने के कारण इसकी अच्छी-अच्छी किस्मों को संरक्षित करने के अतिरिक्त  अधिक से अधिक क्षेत्र में  लगाना संभव हो सका है| ग्राफ्टिंग के कारण यह सुनिश्चित हो जाता है कि कलमी पौधा अपने मात्र वृक्ष की तरह ही मात्र मात्र मातृ भक्त की तरह ही अच्छे गुणवत्ता वाले फल प्रदान करेगा| बीजू पौधों में फल आने के लिए कई वर्षों का इंतजार करना पड़ता था और अधिकतर 8 से 10 साल बाद पता चलता था की फल बहुत छोटे आकार के हैं| फल आने का इंतजार काफी लंबा होता था  और इस इंतजार में बेलपत्र के उपयोग के कारण कई पौधे समाप्त होने से बच जाते हैं| नियमित रूप से बेलपत्र का उपयोग करके लोग पौधों को महत्वपूर्ण बना देते हैं| अब कलमी पौधों में 5 साल के में ही फल आने लगता है इसीलिए लोगों ने इसको व्यवसायिक से फसल के रूप में  गाना शुरू कर दिया है| पहले बेल के भाग मिलना शायद मुश्किल था लेकिन अब ब्लॉक काफी संख्या में पौधे लगाकर आम अमरूद की तरह ही भाग विकसित कर रहे हैं|


वास्तु शास्त्र ने भी बेल की  विविधता के  संरक्षण में मदद की है। केवल भगवान शिव की पूजा के लिए ही नहीं, बल्कि घर की उत्तर-दक्षिण दिशा में पौधे लगाना भी शुभ माना जाता है। वास्तु में विश्वास करने वाले लोग इसे परिवार की शांति और खुशी के लिए बीमा मानते हैं।


शिवरात्रि में बड़े पैमाने पर उपयोग एक कारण है कि बेल में काफी विविधता अभी भी उन क्षेत्रों में उपलब्ध है जहां लोग भगवान शिव की पूजा में इसका उपयोग करते हैं। बाजार में बेल के पत्ते बेचे जाते हैं और प्रसिद्ध शिव मंदिरों के कई स्थानों पर अन्य फूलों के साथ इन पत्तियों व्यापारिक महत्व को देख सकता हैं। भगवान शिव की पूजा करने के पारंपरिक उपयोग के कारण कई अन्य पौधों को भी संरक्षण लाभ मिलता है। धतूरा, जंगली बेर, भांग के साथ शिव लिंगम को जल चढ़ाया जाता है। पूजा के लिए उपयोगिता के कारण पौधे समाप्त होने से बच जाते हैं और लोग पत्ती, फूल और फल के उपयोग के कारण पौधों की रक्षा करते हैं।


भारतीय  परंपराओं ने विलुप्त होने से कई पौधों की प्रजातियों की विविधता को संरक्षित करने में मदद की है। इन पौधों में से अधिकांश का उपयोग दैनिक भोजन में नहीं किया जाता है, लेकिन औषधीय गुणों के कारण अभी भी पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग किया जा रहा है। शिव मंदिर के बाहर, भगवान शिव की पूजा के लिए फूल, फल और पत्ते बेचने वाले विक्रेताओं का कहना है कि इनमें से अधिकांश पौधे बड़े शहरों में उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन फिर भी, लोग शिव पूजा के लिए इन पत्तियों और फलों की मांग करते हैं और हमें कुछ हजार रुपये प्राप्त हो जाते हैं| गाँवों से व्यवस्था करके जहाँ अभी भी ये पौधे उपलब्ध हैं। हालाँकि गाँवों में इन पौधों का बहुत अधिक आर्थिक मूल्य नहीं है, ये भगवान और देवी की पूजा से जुड़े हुए हैं| शिवरात्रि के दिन ये पौधे महत्वपूर्ण हो जाते हैं और कई विक्रेताओं को कुछ ही रुपये की लागत से शिवरात्रि पर इन चीजों को उपलब्ध कराने के लिए अच्छी आमदनी मिलती है ।


आईसीआर-केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ ने  बहुत से फलों के सुंदर भविष्य का आंकलन करते हुए उनकी विविधता को बचाने हेतु कदम उठाए हैं । संस्थान ने बेल की दो किस्मों, CISH-B-1 और CISH-B-2 का विकास किया, जो प्रसंस्करण और अधिक उपज के लिए उपयुक्तता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में लोकप्रिय हो रहे हैं। बेल के ग्राफ्टेड पौधों की मांग  बढ़ रही है। संस्थान की नर्सरी काफी कलमी संख्या में पौधों का उत्पादन कर रही है और उनमें से अधिकांश संस्थान में विकसित किस्मों के हैं। संस्थान किसानों को बेल की खेती के विभिन्न पहलुओं की जानकारी भी प्रदान करता है| रोग और कीट नियंत्रण और मूल्य संवर्धन की तकनीक की जानकारी किसान प्राप्त करते है । आईसीएआर-सीआईएसयच ने बेल की उन्नत क़िस्मों के मातृ ब्लॉकों को विकसित करने के लिए विभिन्न नर्सरी, केवीके, विश्वविद्यालयों और राज्य बागवानी विभागों को उच्च उपज देने वाली किस्मों की प्रमाणित रोपण सामग्री प्रदान करके किसानों के बीच बेल जैसे फल को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।