मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य एवं कृषि उत्पादकता में सुधार

                                                                 


                                       संयुक्त कृषि निदेशक (शोध एवं मृदा सर्वेक्षण अनुभाग),  


                                              उ0प्र0, कृषि भवन, लखनऊ।


किसी राष्ट्र की समृद्धि उसके प्राकृतिक सम्पदा और सम्यक् प्रयोग पर निर्भर हैै। इसी प्रकार भारत एवं उत्तर प्रदेश की उन्नति, उसके प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता एवं सदुपयोग पर पूर्णतः आधारित है। सौभाग्यवश भारत वर्ष में उत्तर प्रदेश विविध प्राकृतिक संसाधनों यथा-जमीन, जल, जंगल, जानवर एवं जन (पाॅच ‘ज’) के मामले में अत्यन्त समृद्धिशाली है। इन पंच तत्वों में भूमि अर्थात मृदा अत्यन्त महत्वपूर्ण है जिस पर खाद्यान उत्पादन तथा समस्त जीवधारियों का जीवन-यापन होता है।


समस्त सुखो यथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का आधार स्वास्थ्य ही है और स्वास्थ्य का आधार सम्यक् भोजन है तथा स्वस्थ भोजन स्वस्थ मृदा से ही प्राप्त होता है। अर्थात् स्वस्थ मृदा और स्वस्थ्य जीवन एक दुसरे के पर्याय है।


स्वतंत्रता के समय मृदा स्वास्थ्य खराब होने के कारण भूमि की उत्पादकता अत्यन्त कम थी। बढ़ती जनसंख्या के फलस्वरूप कम अन्न उत्पादन की कमी को दूर करने के लिए साठ के दशक् में मात्र गेहूॅ और धान में हरित क्रान्ति के कारण उत्पादन में वृद्धि तो हुयी लेकिन धान-गेहूॅ फसल चक्र के निरन्तर प्रयोग से क्षेत्रीय असन्तुलन एवं फसल असन्तुलन मंे भी वृद्धि हुयी और मोटे अनाज, दलहन एवं तिलहन के क्षेत्राच्छादन एवं उत्पादन-उत्पाकता में कमी आयी, जिसके कारण मृदा स्वास्थ एवं भूमि उर्वरता में भी जर्बदस्त गिरावट आयी।


इसलिए सम्यक् उत्पादन-उत्पादकता हेतु मृदा स्वास्थ्य में सुधार एवं वृद्धि हमारी प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए।


मृदा स्वास्थ्य कार्ड एवं मृदा स्वास्थ्य प्रबन्धन कार्यक्रम


जैसा कि हम सभी भली-भाॅति अवगत है कि फसल उत्पादन-उत्पादकता, मृदा स्वास्थ्य, मृदा उर्वरता तथा कृषक आय में वृद्धि हेतु मृदा स्वास्थ्य कार्ड एवं मृदा स्वास्थ्य प्रबन्धन कार्यक्रम भारत सरकार एवं उत्तर प्रदेश की महत्वाकाक्षीं (Flagship) योजना हैं और इस कार्यक्रम की भारत सरकार एवं उत्तर प्रदेश द्वारा निरन्तर समीक्षा की जा रही है।


मृदा स्वास्थ्य कार्ड का लक्ष्य


 ‘‘किसान के खेत की मिट्टी परीक्षण के आधार पर तैयार मृदा स्वास्थ्य कार्ड में दी गयी संस्तुतियों के आधार पर जैविक एवं रसायनिक उर्वरकों के संतुलित प्रयोग से उत्पादन-उत्पादकता, मृदा स्वास्थ्य, मृदा उर्वरता तथा कृषक आय में वृद्धि होती है।’’


मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम के उद्देश्य


*   प्रदेश के सभी कृषको को निःशुल्क मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराते हुये मृदा में पोषक तत्वों की कमी एवं उर्वरक उपयोग से अवगत कराना है।


*  मृदा का विस्तृत विश्लेषण कर, मृदा उर्वरता को प्रभावित करने वाले कारकों की उपलब्धता ज्ञात करते हुये तहसील/विकास खण्डवार उर्वरक संस्तुति का निर्धारण करना।


*  प्रदेश में जनपदवार मृदा परीक्षण के आधार पर पोषक तत्वों के प्रबन्धन एवं उपयोग क्षमता में वृद्धि हेतु कृषकों को जागरूक करना।


* कृषि के छात्रों की भागीदारी और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई0सी0 ए0आर0)/राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के साथ समन्वय कर उनका क्षमता विकास करते हुए मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं कोे सुदृढ़ कराना।


*  संतुलित जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है, जिससे


*  मृदा स्वास्थ्य एवं भूमि उर्वरता में वृद्धि होती है तथा सम्यक् उत्पादन एवं उत्पादकता तथा और किसानों की आय में बढ़ोत्तरी होती है।


 मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम की प्रगति


(Progress of Soil Health Card Programme)










































चक्र



वर्ष



मृदा नमूना एकत्रीकरण का लक्ष्य



एकत्रित मृदा नमूने



विष्लेषित मृदा नमूने       



मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण का लक्ष्य  



वितरित मृदा स्वास्थ्य कार्ड



प्रथम चक्र


 (2 वर्ष)



2015-16 एवं 2016-17



47.70



49.27



49.27



169.91



170.14



द्वितीय चक्र


(2 वर्ष)



2017-18 एवं 2018-19 



48.67



52.73



49.02



233.25



203.54



माॅडल ग्राम


(821)


 



2019-20


(12-02.2020 तक) 



2.55



2.55



2.55



2.55



2.42



मृदा स्वास्थ्य एवं फसल उत्पादकता बढ़ाने के उपाय


       मृदा स्वास्थ्य एवं फसल उत्पादकता बढ़ाने के लिए निम्न उपायों पर विचार कर इसे क्रियान्वित किया जाना चाहिए -



  1. मिश्रित खेती (Mixed Farming) के अन्तर्गत कृषि-पशुपालन-उद्यान-मत्स्य-सब्जी की खेती इत्यादि को बढ़ावा दिया जाय जिससे उपलब्ध संसाधनों को सदुपयोग, आय तथा रोजगार में वृद्धि हो सकें।

  2. सुनिश्चित उत्पादन एवं भूमि उर्वरता वृद्धि के लिए मिश्रित फसल (Mixed Cropping) की बुआई को प्रोत्साहन दिया जाय।

  3. सुनिश्चित आय के लिए समन्वित कृषि प्रणाली (आई0एफ0एस0) एवं कृषि वानिकी को प्रोत्साहन दिया जाय।

  4. खेत की तैयारी अन्तर्गत गर्मी में गहरी जुताई से खेत में ताप-वायु का संचार होता है तथा हानिकारक कीडें-मकोड़े नष्ट होते है।

  5. स्वास्थ्य मृदा एवं भूमि उर्वरता हेतु शस्य विज्ञान के सिद्धांतो (जैसे-कम पानी वाली फसल के बाद अधिक पानी वाली फसल, गहरी जड़ वाली फसलों के बाद उथली जड़ वाली फसलें, धान्य फसलों के बाद दलहनी एवं तिलहनी फसलें द्वारा उगाकर इत्यादि) का अनुपालन किया जाय।

  6. कम जोखिम, कम लागत और अधिक लाभ के लिए सहफसली खेती को प्रोत्साहित किया जाय।

  7. रोगरोधी उन्नतिशील प्रजातियों के प्रयोग से प्रयोग किया जाय।

  8. भूमि शोधन एवं बीजांेपचार से भूमि, कवक एवं वायुजनित रोगों में कमी तथा उत्पादन में वृद्धि होती है।

  9. फसल की समय से बुआई से लगभग 15 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि होती है।

  10. एक गहरी जुताई के बाद न्यूनतम जुताई से न्यूनतम भूमि को डिस्टर्ब किया जाय।

  11. खाद एवं उर्वरक का मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित प्रयोग किया जाय।

  12. खेत में फसल अवशेष न जलाये बल्कि भूमि में मिलाये जाय क्योंकि यह पर्यावरण प्रतिकूल एवं दण्डनीय हैं।

  13. गेहू में सिचाई क्यारियाॅ बनाकर जल प्रबन्धन करें तथा अन्य फसलों एवं फलों में स्प्रिन्कलर एवं ड्रिप सिचाई व्यावस्था अपनाए।

  14. दलहनी एवं तिलहनी फसलों में जिप्सम का प्रयोग लाभकारी है।

  15. राई में विरलीकरण (Thinning) और चनें में खोटाई (Nipping) जरूर करें।

  16. कृषि रक्षा रसायनों के बजाय जैविक कृषि रक्षा उपायों जैसे ट्राईकोडर्मा, ब्यूवेरिया बैसियाना, ट्राईको कार्ड, फैरोमोन ट्रैप आदि को प्राथमिकता दें।

  17. फसल अवशेष को जलाने के स्थान पर फसल अवशेष को सड़ाकर शीघ्र खाद बनाने के लिए वेस्टडीकम्पोजर का प्रयोग करें। भारत सरकार के आँकड़े  के अनुसार देश में प्रति वर्ष 50 करोड़ टन फसल अवशेष उत्पन्न होता है। जिसमें से लगभग 9 करोड़ टन जला दिया जाता है।


                      फसल अवशेष (पराली) प्रबन्धन के लिए अवश्यक कृषि यंत्रो पर 80 प्रतिशत छूट कस्टम हायरिंग सेण्टर और फार्म मशीनरी बैंक के माध्यम से दी जा रही है।



  1. लेजर लैण्ड लेवलर से भूमि समतल कर, कम पानी से अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई कर, अच्छी उत्पादकता प्राप्त की जा सकती है।

  2. फसल चक्र अपनायें तथा दलहनी एवं तिलहनी फसलों की खेती के साथ-साथ बागवानी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम, मछली पालन आदि भी करें।

  3. भूमि एवं जल संरक्षण विधियाॅ अपनायी जाय।

  4. 5 M- Micro organism, Meditation, Music, Mantra तथा Moon Movemant के अनुसार बुआई कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दें।


"I believe growth should be constant, sustainable and inclusive."


                                                                - Shri Narendra Modi


 


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