अ से आत्मा, प से परमात्मा तथा स से संसार हमारा!


                डॉ जगदीश गाँधी


संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ




(1) अ से आत्मा, प से परमात्मा तथा स से संसार हमारा:-
प्रेम गली अति सांकरी जाॅ में दो न समाये। हमारे हृदय में एक के ही रहने के लिए जगह है। या तो हम परमात्मा की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर रख लें या फिर हम अपनी स्वार्थ से भरी इच्छाओं को रख लें। ऐ मनुष्य, तूने जो सबसे कीमती चीज को खोआ है वही तो तेरी आत्मा थी? जिसे तूने ठुकरा दिया है वही तेरी किस्मत थी। मेरे द्वारा बख्शी सबसे कीमती दौलत थी। पास रहता हूँ तेरे सदा मैं अरे! तू नहीं देख पाये तो मैं क्या करूँ? परमात्मा सदैव हमारे पास आत्मा के रूप में रहता है। तुम करो प्रभु से प्यार अमृत बरसेगा। जब हम परमपिता परमात्मा से निःस्वार्थ भाव से प्रेम करते हैं तो परमात्मा का अमृत प्रसन्नता, विश्वास, एकता, अध्यात्म, सामाजिकता, उल्लास, उत्साह, ज्ञान, विज्ञान के रूप में हमारे अन्तःकरण में बरसता है। जीओडी गाॅड, गाॅड मायने ईश्वर। जी मायने जनरेटर - शक्ति। ओ मायने आपरेटर - संचालक। डी मायने डिस्टेªकर - सांसारिक चीजों से मोह रहित होना। एल से लाइट। लाइट मायने - परमात्मा का ज्ञान प्रकाश के रूप में बरसता है। आइये, इस लाइन को दोहराये तथा इसके पीछे छिपे भाव को आत्मसात करें - अ से आत्मा, प से परमात्मा तथा स से संसार हमारा।
(2) स्वार्थ रूपी जहर सारे गुणों को समाप्त कर देता है:-
ईश्वर की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है, और न तो कोई हत्यारा किसी के जीवन की
अवधि में कमी ही कर सकता है, न कोई मित्र उसकी रक्षा ही कर सकता है। स्वार्थ रूपी जहर का एक अवगुण मनुष्य के सभी गुणों को समाप्त कर देता है। ईश्वर-प्राप्ति के लिए स्वार्थरहित होकर पवित्र व पूर्ण समर्पण के रूप में अपने को मिटा देना सीखना पड़ता है। जिन्दगी का सफर करने वाले अपने मन दीया तो जला लें । वक्त की आवाज यह कह रही है कष्ट क्यों आत्मा सह रही है। देख ऐसी जगह तू खड़ा है ज्ञान गंगा जहाँ बह रही है। एक कदम बढाकर ज्ञान की गंगा में डुबकी लगा लें।
(3) मोको कहाँ ढूंढ़े  रे बन्दे मैं तो तेरे पास में:-
संसार के गहन वन में कहीं खो न जाना। संसार में कहीं हमारी निगाहें भटक न जायें। हर कदम सोच कर उठा लें। अपने मन दीया तो जला ले। ईश्वर हृदय-रूपी घर में रहता है और उसकी बंसी में है अंतर्नाद। हमें निर्जन वन में जाने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपने अंतर में ईश्वर का मधुर नाद सुनना है। सिवा ईश्वर की मदद के और कोई चारा ही नहीं है। आत्मा-विहीन व्यक्ति पृथ्वी पर भार-स्वरूप होता है। आत्मा अमर है, शरीर नाशवान है। आत्मा अविनाशी है और सेवा कार्यों के द्वारा अपनी मुक्ति निकालने के लिए नये-नये रूप धारण करती रहती है। जितना साफ असर भौतिक शास्त्र में अमुक मिश्रणों का या क्रियाओं का हम देखते हैं, उतना ही, बल्कि उससे भी ज्यादा, साफ असर रूहानी क्रियाओं का होता है।
(4) सब सौंप दो प्यारे प्रभु को सब सरल हो जायेगा:-
रात लम्बी है गहरा अन्धेरा कौन जाने कहाँ हो सवेरा। तू है अन्जान मंजिल का राही चलते जाना ही है काम तेरा। जब क्षितिज अत्यंत अंधकारमय होता है, जब चारों ओर निराशा का घोर अंधकार छा जाता है, तब अक्सर दिव्य प्रकाश हमारा मार्गदर्शन करता है। हम ईश्वर से डरेंगे तथा उससे प्रेम करेंगे तो मनुष्य से हमारा डर मिट जायगा। ईश्वर को नहीं मानने से सबसे बड़ी हानि वही है, जो हानि अपने को नहीं मानने से हो सकती है, अर्थात ईश्वर को न मानना आत्महत्या जैसा है। हम अगर अपने-आपको भगवान की इच्छा के सुपुर्द कर दें तो हमें कभी चिंता करनी ही न पड़े। भीतर का आनंद ईश्वर का काम करने से ही पैदा होता है। जो ईश्वर को अधिक चाहता है, उसकी परमात्मा ज्यादा परीक्षा लेता है। सब सौंप दो प्यारे प्रभु को सब सरल हो जायेगा, खुशियों की सुन्दर झील में जीवन कमल मुस्करायेगा।