हे प्रभु, मेरे मन पर मेरा अधिकार कर दो! रहो भीतर: जीओ बाहर!

             


       डॉ जगदीश गाँधी


संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ



(1) हे प्रभु, मेरे मन पर मेरा अधिकार कर दो:-
मन जब तक बाहर के क्षेत्र में विचरण करता है, हमेशा बुद्धि के अधीन रहता है। लेकिन जैसे ही वह अन्दर के क्षेत्र में प्रवेश करता है, बुद्धि की अधीनता से स्वतंत्र हो जाता है। मनुष्य का जीवन सुख और आनन्द के बीच में रहता है। जो मन बहिर्मुखी होता है, उसका मन जीवन के सुखों से प्रभावित होता है। जिसका जीवन अन्तर्मुखी है उसका मन आनन्द से प्रभावित रहता है। मन स्वभाव से ही सुख चाहता है। जहां पर मन को सांसारिक सुख मिलता है, मन अपने आप उसमें लगने लगता है। संसार के भौतिक विषयों के सुख में जब मन लगता है, तो उसे सांसारिक विषयों का ध्यान कहा जाता है। सभी धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि परमात्मा को अन्दर खोजें। मौको कहा ढूढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में। अतः प्रार्थना के द्वारा हम अपने अन्दर जाकर परमात्मा को गुणों के रूप में अनुभव कर सकते हैं। इस शक्ति के द्वारा हम अपने मन में उठती हुई समस्त सही इच्छाओं की पूर्ति और गलत इच्छाओं पर अंकुश लगा सकते हैं। कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूंढे वन मांहि। ऐसे घट-घट में राम हैं, दुनिया देखे नांहि।। पास रहता हूँ तेरे सदा में अरे, तू नहीं देख पाये तो मैं क्या करूँ?
(2) सुखी होने का उपाय है हर पल शुभ कार्य में लगे रहना:-
प्रयासपूर्ण और प्रयासहीन इन दो प्र्रकार के क्षणों द्वारा ही जीवन सधता है। हमारे जीवन में इन दो प्रकार के क्षणों के अतिरिक्त किसी तीसरे प्रकार के क्षण नहीं पाए जाते। अगर हम अपने सामथ्र्यानुसार कर्म करें, तो हम अपने आप को अचंभित कर डालेंगे। उस व्यक्ति के लिए सभी परिस्थितियाँ अच्छी है जो अपने भीतर खुशी संजो कर रखता है। आप प्रसन्न है यह सोचने के लिए फुरसत होना ही दुखी होने का रहस्य है, और इसका उपाय है हर पल शुभ कार्य में पूरे मनोयोग से लगे रहना। याद रखें कि भविष्य एक बार में एक दिन करके आता है। कभी-कभी छोटे निर्णय छोटे कार्य भी जीवन को हमेशा के लिये बदल सकते हैं।
(3) अपने लक्ष्य पर निरन्तर नजर बनाये रखे:-
जो व्यक्ति धन गंवाता है, बहुत कुछ खो बैठता है, जो व्यक्ति मित्र को खो बैठता है, वह उससे भी कहीं अधिक खोता है, लेकिन जो अपने विश्वास को खो बैठता है, वह व्यक्ति अपना सब कुछ खो देता है। परिवर्तन नए अवसर लाता है। एक ऐसा व्यक्ति जिसका जीना सफल है, वह ऐसा व्यक्ति होता है जो अपने लक्ष्य पर निरन्तर नजर बनाए रखता है और इसके लिए अडिग रहता है। इसी को समर्पण कहा जाता है। जो व्यक्ति दूसरों की भलाई चाहता है, वह अपनी भलाई को सुनिश्चित कर लेता है।
(4) जो जैसा सोचता है वैसा बन जाता है:-
जीवन में दो मूल विकल्प होते हैं, स्थितियों को उसी रूप में स्वीकार करना जैसी वे हंै, या उन्हें बदलने का उत्तरदायित्व स्वीकार करना। आपकी मर्जी के बिना कोई भी आपको तुच्छ होने का अहसास नहीं करवा सकता है। जो जैसा सोचता है वैसा बन जाता है। हम आगे बढ़ते हैं, नए रास्ते बनाते हैं, और नई योजनाएं बनाते हैं, क्योंकि हम जिज्ञासु हंै और जिज्ञासा हमें नई राहों पर ले जाती है। जिसे व्यक्ति को इंसानों से प्रेम हैं और इंसानियत की समझ है, उसे अपने आप में ही संतुष्टि मिल जाती है।
(5) जब समाज में कुछ गलत होता है तो उसके लिए हम भी जिम्मेदार है:-
जब समाज में कुछ गलत होता था, तो उस गलत होने में महात्मा गांधी स्वयं को जिम्मेदारी मुक्त नहीं मानते थे। उन्हें लगता था कि उनके आत्मशुद्धि की कमी भी इसके लिए जिम्मेदार है। इसीलिए उपवास उनके लिए आत्मा के शुद्धिकरण का माध्यम था। यदि आप दूसरों की खुशी चाहते हैं तो आपको सहानुभूति अपनानी चाहिए, यदि आप स्वयं खुश होना चाहते हैं तो भी आपको सहानुभूति ही अपनानी होगी।
(6) जीवन में उत्साह सबसे बड़ी शक्ति है निराशा सबसे बड़ी कमजोरी:-
अगर हम सिर्फ वही करते हैं जो हम जानते हैं कि हम कर सकते हैं - तो हम कभी ज्यादा कुछ नहीं करते। उस्ताद वह नहीं जो आरंभ करता है, बल्कि वह है जो पूर्ण करता है। उस व्यक्ति को आलोचना करने का अधिकार है जो सहायता करने की भावना रखता है। सपने पूरे होंगे हम सपने देखना शुरू तो करें। बिना उत्साह के आज तक कुछ भी महान उपलब्धि हासिल नहीं की गई है।
(7) परमात्मा की प्रार्थना मनुष्य को फौलाद की तरह मजबूत बना देती है:-
आमतौर पर हमारा मन धन, सत्ता, प्रसिद्धि एवं प्रशंसा का भूखा होता है। मन के इन भोजनों को हम जितना कम करते जायेंगे, हमारे अन्तकरण एवं हमारे वातावरण की शुद्धि का मार्ग उतना ही खुलता जायेगा। मन की एक खुराक ज्ञान भी है। इस खुराक की पूर्ति को प्रार्थना से पूरा किया जा सकता है। प्रार्थना परमात्मा से वार्तालाप है। प्रार्थना में शब्दों का नहीं वरन् भावना का महत्व है। निर्मल मन वाला परमात्मा की निकटता प्राप्त कर लेता है।
(8) वृक्ष का एक भी पत्ता, समूचे झाड़ की मूक सम्मति के बिना पीला नहीं पड़ सकता:-
वर्तमान सभ्यता का मतलब क्या हैं? वह अभिशाप है या वरदान? अगर हम उसे संकट मानते हैं तो उसकी जड़ में जाकर हमें उसके कारण ढूंढने होंगे और इलाज भी। प्रसिद्ध तत्ववेत्ता खलील जिब्रान कहते थे - जिस तरह वृक्ष का एक भी पत्ता, समूचे झाड़ की मूक सम्मति के बिना पीला नहीं पड़ सकता, वैसे ही हम में छिपी हुई इच्छाओं के बिना इस संकट का निर्माण नहीं हुआ है।
(9) हम किस आदर्श के लिए प्रयासरत है यह महत्वपूर्ण है:-
हमें यह नहीं मानना चाहिए कि जीत ही सब कुछ है, अधिक महत्व इस बात का है कि हम किस आदर्श के लिए प्रयासरत हों। यदि हम किसी आदर्श पर डट नहीं सकते तो हम जीतेंगे क्या? अगर कोई छोटे मामलों में सच के प्रति लापरवाह होता है तो उस पर बडे़ मामलों की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती। हार तो कोई भी मान सकता है, इससे आसान दुनियाँ में कुछ नहीं है। लेकिन जब हर कोई आपके हार मान लेने को समझ सकता हो, तब जुटे रहना ही असली मजबूती है। अश्रु वे शब्द हैं जिन्हें हृदय व्यक्त नहीं कर सकता।
(10) जिन्दगी का सफर करने वाले अपने मन का दीया तो जला ले:-
खुश होने का मतलब यह नहीं कि सब कुछ उत्तम है। इसका मतलब है कि आपने कमियाँ के परे देखना शुरू कर दिया। ‘एक अच्छी पुस्तक पढ़ने का पता तब चलता है जब उसका आखिरी पृष्ठ पलटते हुए आपका कुछ ऐसा लगे जैसे आपने एक मित्र को खो दिया। पुस्तक एक ऐसा तोहफा है जो आप बार बार खोल सकते हैं। अपने मन को थोड़ा आराम दें, जिस खेत को थोड़ा खाली रखा जाता है, उसमें अच्छी पैदावार होती है। एक दिन हमारा पूरा जीवन एक क्षण के लिए हमारी निगाहों के सामने झलकेगा। आइये, हम हर पल अभी से कोशिश करें कि यह क्षण, यह दिन देखने लायक हो। अभी नहीं तो कभी नहीं। फिर न कहना कि कुछ कर न सके। समय और शक्ति के रहते हमें अपने जीवन के लक्ष्य, आदर्श तथा उद्देश्य को प्राप्त कर लेना चाहिए।