जब चारों ओर अंधेरा हो तब प्रभु नाम का  दीप जला लेना !
 

               


                डॉ जगदीश गाँधी


संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ



(1) कर दो दूर प्रभु मेरे मन में अंधेरा है:-
आज संसार के प्रत्येक मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन चारों ओर से अज्ञान के अंधेरे से घिर गया है। हमंे मानव शरीर अपने कार्य के लिए ही नहीं मिला है वरन् प्रभु के काम के लिए भी मिला है। जब शरीर की इतनी देखभाल तो आत्मा की क्यों नहीं? जब चारों ओर अंधेरा हो तो प्रभु नाम का दीया अपने अन्तःकरण में जला लेने में ही समझदारी है। जब संसार में चारों ओर अंधेरा हो तो अंधेरा भगाने में जुटना ही स्वधर्म है। एकता का जब आयेगा सवेरा तब दूर हो जायेगा सब अन्धेरा। स्नेहियों का एक समाज होगा हर तरफ एकता से ओतप्रोत आध्यात्मिक साम्राज्य होगा। होगा घर-घर में सुख का बसेरा दूर हो जायेगा सब अन्धेरा। सब के सहयोग से सब के सहकार से यह सम्भव होगा।
(2) मानव मन में स्वार्थ आने से वह प्रभु से दूर हो जाता है:-
जिस प्रकार पाॅवर हाउस से बल्व का संबंध टूट जाने से बल्व में अन्धेरा हो जाता है। उसी प्रकार मानव मन में स्वार्थ आने से वह प्रभु से दूर हो जाता है और मन अंधेरे से भर जाता है। पवित्र हृदय से की गयी प्रार्थना द्वारा मनुष्य की आत्मा का संबंध परमात्मा की परम आत्मा से जुड़ता है और उसका मन प्रभु के ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है। रावण ने अपना संबंध परमात्मा से काटकर अपने मन को अंधेरे से भर लिया। परमात्मा से संबंध कटते ही वह अज्ञानता के अन्धेरे में चला गया। अज्ञानता से घिरते ही उसकी संशय वृत्ति हो गयी। सही तथा गलत का निर्णय लेने में वह असमर्थ हो गया। रावण का मन आन्तरिक संघर्ष से घिर गया और वह भगवान राम से ही युद्ध करने का निर्णय ले बैठा। इस प्रकार रावण ने स्वयं के साथ ही अपने कुटुम्ब का विनाश कर लिया।
(3) परमात्मा की कृपा से ही मोह रूपी अन्धकार का नाश होता है:-
महाभारत युद्ध के निर्णायक क्षण में अर्जुन ने युद्ध भूमि से कायरों  की तरह पलायन करने का मन बना लिया था। परमपिता परमात्मा ने जब देखा कि अर्जुन को कृष्ण की बातों का कोई प्रभाव नहीं हो रहा है तो वे कृष्ण की आत्मा में अवतरित होकर अर्जुन को उनके कर्तव्य का बोध कराया। अन्ततः अर्जुन के मोह का नाश हो जाता है और अब अर्जुन पूरी तरह से परमात्मा की शरण में आकर कहते हैं:- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचंन तव।।  हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली, अब मैं सन्देहरहित होकर स्थिर हूँ, अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। (यह महत्वपूर्ण श्लोक गीता के 18वें अध्याय में 73वें श्लोक के रूप में वर्णित है।) परमात्मा की कृपा से अर्जुन के मोह रूपी अन्धकार का नाश होता है तथा ज्ञान रूपी प्रकाश की प्राप्ति होती है।
(4) अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत:-
मनुष्य अपने द्वारा लिए गये प्रत्येक निर्णय में अच्छे या बुरे का विचार कर सकता है। जानवरों को अपने मन को जीतने का ज्ञान नहीं होता परन्तु मनुष्य को यह ज्ञान होता है। मनुष्य को विचारवान आत्मा मिली है। मनुष्य जैसे ही पवित्र हृदय करके परमात्मा से अपने को जोड़ेगा वैसे ही उसकी आत्मा में प्रकाश आ जायेगा। इसके साथ ही हमें किसी भी कार्य को करने के पूर्व उसके अन्तिम परिणाम पर विचार कर लेना चाहिए।
(5) एक शुद्ध, दयालु एवं प्रकाशित हृदय धारण करे:-
हे प्रभु, हमें वह शक्ति दें कि हम एक शुद्ध, दयालु एवं ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय धारण करके तेरे महान उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायक बन सके। हे प्रभु, इस मार्ग में निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए हमारा पथ प्रदर्शन करने की कृपा कीजिए। हमें एक पल के लिए भी अपनी स्नेह भरी छत्रछाया से दूर मत करना। प्रभु हमें एक प्रफुल्लित हृदय धारण करने का आशीर्वाद प्रदान कर। प्रेम गली अति साँकरी, जा में दोउ न समाय, जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं, जब हरि था ‘मैं’ नाहीं। अर्थात हृदय में एक ही के रहने के लिए जगह है। या तो उसमें हम परमात्मा की इच्छाओं को रख लें या फिर अपनी इच्छाओं को ही रख लें। परन्तु हमें ध्यान रखना है कि मेरे हृदय में कहीं मेरी इच्छाओं के रूप में मेरा स्वार्थ न घुस जाये।
(6) मानव मन में घनघोर अन्धेरा है:-
परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये अवतारों को अलग-अलग मानने के कारण आज मानव मन में घनघोर अन्धेरा है। धर्म के नाम पर चारों ओर जमकर मारामारी हो रही है। संसार में सबसे ज्यादा युद्ध धर्म के नाम पर ही हुए हैं। प्रभु के अवतार एवं उनके द्वारा प्रगटित ग्रन्थ ही हमारे सच्चे गुरू होते हैं, जो हमें ईश्वर एवं ईश्वर की शिक्षाओं का ज्ञान कराने के साथ ही उन पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। जब हम इस सच्चाई को हृृदय से स्वीकार करेंगे कि सभी अवतार एक ही परम पिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये हैं और हम सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं, तभी हमारे आपसी भेदभाव तथा मारामारी दूर होगी। इस प्रकार हमारा मन ईश्वरीय ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो जायेगा।
(7) परमात्मा का ज्ञान पवित्र ग्रन्थों में संकलित है:-
परमात्मा अजन्मा है। हम उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। परमपिता परमात्मा का कोई नाम, आकार-प्रकार नहीं होता है। परमात्मा प्रकाश-पुंज की तरह है। परमात्मा संसार के किसी पवित्र हृृदय के व्यक्ति को अवतार के रूप में चुनकर अपना युगानुकूल दिव्य ज्ञान उनके द्वारा पृथ्वी पर मानव जाति के पास भेजता है। परमात्मा के अवतारों का अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। अवतारों पर परमपिता परमात्मा से दिव्य प्रकाश आता है। परमात्मा का प्रकाश रूपी ज्ञान अवतारों की आत्मा में अवतरित होता है। परमात्मा का ज्ञान पूजा स्थलों में नहीं वरन् पवित्र ग्रन्थों में संकलित है। अवतार संसार में भारी कष्ट उठाकर हमें एक परम पिता परमात्मा की प्रार्थना करने की प्रेरणा देते हैं। मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारा किसी भी पूजा स्थल में जाकर प्रार्थना की जायें उसको सुनने वाला गाॅड, खुदा, ईश्वर तथा वाहे गुरू एक ही परमात्मा है।
(8) अवतारों द्वारा जीवन भर उठाये गये कष्टों को याद करें:-
हम अपने मन का अन्धेरा दूर करने के लिए अवतारों द्वारा जीवन भर उठाये गये कष्टों को याद करें तथा उनकी शिक्षाओं का पालन करते हुए परमात्मा की करोड़ों वर्षो से सृजित इस सुन्दर सृष्टि की एकता तथा शान्ति को बिगाड़ने वालों से इसे बचाने के लिए अब हर पल प्रयास करें। इस तरह के प्रयासों से हमें निश्चित रूप से सर्वशक्तिमान और अदृश्य देवदूतों की कृपापूर्ण सहायता निरन्तर प्राप्त होगी और हम पूरे विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना में अवश्य सफल होंगे।