कोरोना विषाणु (कोविड-19) महामारी नियंत्रण में गाॅधी दर्शन एवं आचरण ही एक मात्र समाधान।


डा0 सत्येन्द्र कुमार सिंह, 
संयुक्त कृषि निदेशक,
(शोध एवं मृदा सर्वेक्षण अनुभाग),
कृषि भवन, लखनऊ
 


गाँधीजी की 150 वीं वर्षगांठ वर्ष 2020 के मार्च महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा घोषित विश्वव्यापी आसुरी महामारी कोरोना वाइरस (कोविड-19) ने पूरी दुनिया एवं मानवता को हिला कर रख दिया है। इस महामारी से  पूरी दुनिया के विकसित, विकासशील एवं अविकसित सभी देश अछूते नही रहे हैं। अंहकार ग्रसित पूरी मनुष्य जाति अनजाने भय, दहशत, अकाल मृत्यु से ग्रसित हो गया है। इस विषाणु ने पूरे विश्व को विज्ञान की सीमा एवं क्षणभुरता का अहसास करा दिया है और एक बहुप्रचलित कहावत ‘‘विज्ञान एक अच्छा नौकर है लेकिन बहुत बुरा मालिक है’’ सिद्ध हो गया है। साथ ही साथ प्रकृति यानी ईष्वर की अनन्त शक्ति का परिचय भी मिला एवं यह सिद्ध भी हो रहा है। स्वयं को विश्व  शक्ति एवं अपराजेय मानने वाले देशों  ने इस प्राकृतिक विपदा कोरोना के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया है। कोविड-19 मानवता एवं विश्व इतिहास की एक निराली, निरंकुश एवं  अनियंत्रित विपदा है। ऐसा प्रतीत होता है कि कोविड-19 महामारी मनुष्य निर्मित आपदा है। 
 
मनुष्य के द्वारा धरती ग्रह पर किये गये अत्याचार एवं अन्याय के विरूद्ध प्रकृति का न्याय एवं प्रतिशोध का सुंदर चित्रण


 इस विश्व व्यापी विपदा से निपटने में गाँधीजी के धर्म आधारित विचार, दर्शन एवं लोक व्यवहार में जीवन चर्या जैसे ईश्वर में अगाध निष्ठा समुचित आहार-बिहार, सम्यक आचार-विचार बुद्धिमत्तापूर्ण सोच-समझ, पंचमहाभूतों छिति-जल-पावक-गगन-समीरा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एवं इनकी शांति हेतु-निरन्तर प्रार्थना योग एवं संस्कृति इत्यादि बहुत सहायक है। गाँधी के अनुसार मनुष्य को पेड़-पौधे, नदी-तालाब, सूरज-चाँद, धरती-आकाश, जंगली जीव, जमीन, जल, जंगल, जानवर समस्त जन जरूरतमंद, गरीब, भूखे, बेघर की सेवा को अपने परिवार का सदस्य समझ कर व्यवहार करना चाहिए। गाँधीजी को ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ का आशय हमारे इसी आचरण से है।
गाँधी दर्शन की वर्तमान में प्रासंगिकता को याद करते हुए लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सभी देशवासियों से अपील किया है कि इस विश्वव्यापी विपदा के समय, गरीबों एवं वंचितों तथा दरिद्रनारायन की सेवा ही देश सेवा की सर्वश्रेष्ठ तरीका है। कोबिड़-19 को परास्त करने का एक मात्र उपाय उसके प्रति ‘उपेक्षा‘ एवं ‘उदासीनता‘ का भाव रखना है तथा कोरोना संक्रमण से बचने के लिए लोगों में प्रेम, सकारात्मक ऊर्जा, करुणा, दया, सहायता से संक्रमित किया जाय। हमारी अन्तर्शक्ति  एवं शास्त्रों में समाया हुआ है भय, संदेह और बीमारी के विषाणु का समाधान। हमारे पास अन्तजगत की यात्रा करने का शुभ अवसर है। आन्तरिक क्रांति, खुद व खुदा से मिलने और बिखरे हुए मन व मानव जीवन को समेटने का यह सर्वथा उपयुक्त समय है। सम्पूर्ण लाॅक डाऊन का यह सुअवसर नृत्य-गायन संगीत सीखने, मन पसन्द पुस्तकें एवं पौराणिक ग्रन्थ पढ़ने-लिखने, खाना बनाने, सफाई-पोछा लगाने, माता-पिता तथा बुजुर्गो के साथ समय बिताने सबके साथ रामायण-महाभारत जैसे धारावाहिक को देखने, चित्रकारी, यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान तथा समाधि(समता) का अभ्यास, भोजन बनाने में पत्नी का हाथ बटाने चुटकले सुनने-सुनाने जैसे कार्यों में व्यतीत किया जा सकता है। ऐसे उपायों से आन्तरिक खुशी एवं तनाव मुक्ति भी मिलेगी। गाँधीजी के मतानुसार भारतीय संस्कृति में ‘एकान्तवास’ की सुसंस्कृति रही है। हमारे लिए भीतरी परीक्षण का यह सुअवसर है। सम्यक, श्रम, सम्यक आहार, सम्यक निद्रा एवं सम्यक ध्यान, इन सबके लिए यह लाॅक डाउन अवधि सबसे उपयुक्त समय है।
 बापू के लिए ‘रामनाम’ जप एक महामंत्र है रामकृष्ण का व्यक्तित्व, जीवन दर्शन, रुप-लावण्य इत्यादि भारतीय जन मानस में आज भी पूर्ण जीवन्तता के साथ व्याप्त है। इन दोनों महापुरुषों की वाणी, मातृ-पितृ-मित्र-परिवार-जनभक्ति युद्ध कौशल प्रबंधन आसुरी शक्तियों के समय न झुकना, विपत्ति में धैर्य रखना हमें जीवन जीने की कला एवं मरने की कला सिखाता है। भगवान राम एवं कृष्ण हमारी समृद्ध परम्परा के महानायक हैं। सभी सबंधित एवं निराश मानवता को दर्पण दिखाते है। हम इस वैश्विक महामारी रूपी रावण-कंस से, भीतर की प्रज्ञा, आत्म, संयम, विवेक, संकल्प, सरल, विद्या, अहिंसा, विनय, सकारात्मक चिंतन प्रार्थना द्वारा विजय प्राप्त कर सकते है। बापू तो कहते है कि संस्कृति एवं शास्त्र के अनुसार ‘परमात्मानाम‘ महाऔषधि है। विश्व वंदनीय गांधी कहते है कि ‘‘मेरे जीवन में, और कई प्रकार से राष्ट्रा  एवं विश्व में आई विपत्तियों एवं विपदा को मैने रामनाम के बल पर ही उबारा है और रामनाम ने मुझे बहुत बल दिया है।‘’ यह दृष्टा को खोजने का सबसे उपयुक्त अवधि काल है। हम सभी को इस थोपे हुए एकान्तवास का सदुपयोग करना चाहिए। वास्तव में यह एकान्तवास सबसे बड़ी औषधि है और हमारे अंदर की असीमित शक्तियों को जगाने का यह उपयुक्त समय है। 
कोरोना विपदा के कुछ अत्यन्त सकारात्मक परिणाम आए हैं। मनुष्य का अहंकार कम हुआ है और मनुश्य के क्षण भंगुरता की पुष्टी हुई है। ईश्वर एवं प्रकृति के प्रति विश्वव्यापी आस्था एवं श्रद्धा बढ़ी है। अति भौतिकता एवं बाह्य आडम्बर से मुक्ति मिल रही है। भारतीय संस्कृति जैसे नमस्कार, प्रकृति पूजा एवं आत्म चिन्तन का विस्तार हुआ है तथा  निश्चित रुप से भूमि, जल, वायु, ध्वनि, रेडियोएक्टिव प्रदूषण में बहुत कमी आयी है, जिसका आंकलन  भविष्य  निर्धारित करेगा। विकास एवं विनाश एक दूसरे के पूरक हैं अर्थात जहाॅ अनियन्त्रित भौतिक विकास होगा वहाॅ मानव निर्मित दैवीय आपदाऐं एवं विनाश अवश्यंभावी है।


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