प्राकृतिक खेती (कृषि-ऋषि परम्परा) के मूलभूत सिद्धान्त

         


डा0 सत्येन्द्र कुमार सिंह, अध्यक्ष,
एलुमिनाई एसोसिएशन, चन्द्र शेखर आजाद
कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर।



1. मिश्रित खेती (Mixed Farming) के अन्तर्गत कृषि-पशुपालन-उद्यान-मत्स्य-सब्जी की खेती इत्यादि को बढ़ावा दिया जाय जिससे उपलब्ध संसाधनों को सदुपयोग, आय तथा रोजगार में वृद्धि हो सकें।
2. सुनिश्चित उत्पादन एवं भूमि उर्वरता वृद्धि के लिए मिश्रित फसल (Mixed Cropping) की बुआई को प्रोत्साहन दिया जाय।
3. सुनिश्चित आय के लिए समन्वित कृषि प्रणाली (आई0एफ0एस0) एवं कृषि वानिकी को  प्रोत्साहन दिया जाय। 
4. खेत की तैयारी अन्तर्गत गर्मी में गहरी जुताई से खेत में ताप-वायु का संचार होता है  तथा हानिकारक कीडें-मकोड़े नष्ट होते है।
5. स्वास्थ्य मृदा एवं भूमि उर्वरता हेतु शस्य विज्ञान के सिद्धांतो (जैसे-कम पानी वाली फसल के बाद अधिक पानी वाली फसल, गहरी जड़ वाली फसलों के बाद उथली जड़ वाली फसलें, धान्य फसलों के बाद दलहनी एवं तिलहनी फसलें द्वारा उगाकर इत्यादि) का अनुपालन किया जाय।
6. कम जोखिम, कम लागत और अधिक लाभ के लिए सहफसली खेती को प्रोत्साहित किया जाय।
7. रोगरोधी उन्नतिशील प्रजातियों का प्रयोग किया जाय। 
8. भूमि शोधन एवं बीजोपचार से भूमि, कवक एवं वायुजनित रोगों में कमी तथा उत्पादन में वृद्धि होती है।
9. फसल की समय से बुआई से लगभग 15 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि होती है।
10. एक गहरी जुताई के बाद न्यूनतम जुताई से न्यूनतम भूमि को डिस्टर्ब किया जाय।
11. खाद एवं उर्वरक का मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित प्रयोग किया जाय।
12. खेत में फसल अवशेष न जलाये बल्कि भूमि में मिलाये जाय क्योंकि यह पर्यावरण प्रतिकूल एवं दण्डनीय हैं।
13. गेहू में सिचाई क्यारियाॅ बनाकर जल प्रबन्धन करें तथा अन्य फसलों एवं फलों में स्प्रिन्कलर एवं ड्रिप सिचाई व्यावस्था अपनाए।
14.  दलहनी एवं तिलहनी फसलों में जिप्सम का प्रयोग लाभकारी है।
15.  राई में विरलीकरण (Thinning) और चनें में खोटाई (Nipping) जरूर करें।
16. कृषि रक्षा रसायनों के बजाय जैविक कृषि रक्षा उपायों जैसे ट्राईकोडर्मा, ब्यूवेरिया बैसियाना, ट्राईको कार्ड, फैरोमोन ट्रैप आदि को प्राथमिकता दें।
17. फसल अवशेष को जलाने के स्थान पर फसल अवशेष को सड़ाकर शीघ्र खाद बनाने के लिए वेस्टडीकम्पोजर का प्रयोग करें। भारत सरकार के कड़े के अनुसार देश में प्रति वर्ष 50 करोड़ टन फसल अवशेष उत्पन्न होता है। जिसमें से लगभग 9 करोड़ टन जला दिया जाता है।  फसल अवशेष (पराली) प्रबन्धन के लिए अवश्यक कृषि यंत्रो पर 80 प्रतिशत छूट कस्टम हायरिंग सेण्टर और फार्म मशीनरी बैंक के माध्यम से दी जा रही है। 
18. लेजर लैण्ड लेवलर से भूमि समतल कर, कम पानी से अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई कर,  अच्छी उत्पादकता प्राप्त की जा सकती है।
19. फसल चक्र अपनायें तथा दलहनी एवं तिलहनी फसलों की खेती के साथ-साथ बागवानी,  पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम, मछली पालन आदि भी करें।
20. भूमि एवं जल संरक्षण विधियाॅ अपनायी जाय।
21. 5 M- Micro organism, Meditation, Music, Mantra तथा  Moon Movemant इत्यादि का प्रयोग कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दें।
22. प्रति इकाई उत्पादन बढ़ाना, समेकित कृषि प्रणाली, कृषि निवेश प्रबन्धन।
23. अभिनव तकनीकी का प्रयोग, फसल सघनता एवं कृषि विविधीकरण एवं राष्ट्रीय कृषि बाजार परियोजना (ई-नेम)।
24. कम लागत वाली प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन।
25. खाद्य प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्द्धन।
26. किसानों के उत्पादन के सापेक्ष न्यूनतम डेढ़ गुना मूल्य (न्यूनतम समर्थन मूल्य)।
27. फसल बीमा।
28. जैव ऊर्जा।
29. पारदर्शी किसान सेवा मोबाइल एप्प एवं डी0बी0टी0।
30. फसल सुरक्षा हेतु उपाय।


       गाँधीजी के कृषि विकास एवं प्राकृतिक खेती (सजीव कृषि) संबंधी सिद्धांत ‘‘अधिकतम हाथो  (92 प्रतिशत लघु एवं सीमान्त) से अधिकतम उत्पादन’’ के मूल मंत्र को अपनाने के सिवाए अन्य कोई चारा नहीं है। यह मूल मंत्र हमें आर्थिक मंदी अवसाद से हमेशा के लिए मुक्त रखेगा। हमें किसान (विशेष रूप से सीमांत एवं लघु कृषकों) को अन्नदाता के रूप में हर हाल में सम्मान देना ही पड़ेगा अन्यथा खेती एक विषाद बनकर रह जाएगी। इसलिए उत्तर प्रदेश एवं भारत की समृद्धि के लिए कृषि-ऋषि परम्परा आधारित प्राकृतिक खेती (सजीव कृषि) को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी ही होगी।


‘मानव मात्र की आजीविका के केवल तीन साधन हैं- कृृषि, पशुधन और उद्योग। इन्हीं तीन साधनों के सहारे मानव स्वावलंबन एवं स्वाभिमानपूर्ण जीवन बिता सकता है।‘‘
               - पं0 दीन दयाल उपाध्याय