रोगी नहीं, भोगी नहीं, योगी बनो रे!

       


                डॉ जगदीश गाँधी


संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ



(1) रोगी नहीं, भोगी नहीं, योगी बनो रे:-
आज मनुष्य अनेक शारीरिक तथा मानसिक रोगों से पीड़ित है। इन रोगों का बढ़ने का कारण मनुष्य का प्रकृति से दूर होते जाना है। एक भी रोग शरीर में लग जाने से जीवन कष्टदायी बन जाता है। खाओ पीओ और मौज करो से भरा भोगी जीवन जीने से शरीर में अनेक रोग अपना घर बना लेते हैं। अर्थात अप्राकृतिक जीवन शैली जीने के कारण हम रोगग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए रोजाना योग, आसन तथा व्यायाम को अपने जीवन में अपनाना अति आवश्यक है। जोड़ लो मन के तार प्रभु से योग के पावन पथ पर चलकर सुखमय जीवन जी लो। जीवन है अनमोल खजाना इसको न यूँ खो देना। श्रेष्ठ समय है तू बीज फिर से बो लेना। जन्म जन्म की प्यास बुझा लो प्रभु की यहीं पुकार है। प्रेम करो परमात्मा से प्रेम ही सुख का सार है। भागो नहीं, भोगो नहीं, योग में जागो। शरीर का महत्व इसलिए है क्योंकि इसमें आत्मा वास करती है। आरोग्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार के साथ ही जन्म सिद्ध कर्तव्य भी है। आइये, रोजाना एक घण्टे पूरे मनोयोग से योग करें तथा 16 घण्टे सच्चे कर्मयोगी बने। तथा 6 या 7 घण्टे चिन्तारहित गहरी नींद लें ।
(2) आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का प्रयास करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है:-
पवित्र मन रखो, पवित्र तन रखो, पवित्रता ही मनुष्यता की शान है। जो मन वचन कर्म से पवित्र है वह चरित्रवान ही महान है। यह जन्म हमारा इम्तिहान है। सांसों के सहयोग बिना पल भर न कोई जी पाये। प्राण का सहयोग न हो तन माटी में मिल जाये। योगमय जीवन जीने के लिए सचेत करने के लिए सुन्दर विचार है - जीवन खत्म हुआ तब जीने का ढंग आया जब शमा बुझ गयी तब महफिल में रंग आया। मन की मशीनरी ने तब ठीक चलना सीखा, जब तन के हर एक पुर्जे में जंग आया। प्रत्येक दिन की शुरूआत योग, आसन तथा प्राणायाम से होनी चाहिए।
(3) बच्चों को जीवन में विजयी बनायें:-
स्वस्थ शरीर में स्वस्थ र्मिस्तष्क का वास होता है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। दिनचर्या की शुरूआत योग तथा प्रार्थना से शुरू करने से हमारा जीवन योगमय हो जाता है। हमें बच्चों को प्राणायाम, खेलकूद एवं व्यायाम के द्वारा निरोग, तरोताजा तथा चुस्त बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। बच्चे रोजाना प्रातः उठते ही पहले घंटे में अपने को पूरे दिन के लिए तैयार करे। पहले घंटे में जो आप काम करेंगे उससे आपका दिमाग पूरे दिन के लिए तैयार होगा। 30 से 60 मिनट के दौरान प्रभु एवं उसकी सृष्टि की महिमा तथा अपने भविष्य की योजनाओं के बारे में सोचे और दोहराये। संसार के अधिकांश सफल लोगों की आत्मकथा पढ़ने से यह ज्ञात होता है कि वे अपने जीवन के प्रत्येक दिन की शुरूआत बड़े ही अच्छे ढंग से करके पूरा जीवन जीने का प्रयास करते थे। हमारे प्रत्येक कार्य प्रतिदिन परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने। बच्चों को बालवस्था से ही खेल खेल में जीवन में विजयी बनने की सीख देनी चाहिए। बच्चों को सेक्स शिक्षा की नहीं वरन् योग शिक्षा देने की आवश्यकता है।
(4) प्रकृति-प्रदत्त आठ चिकित्सक:-
शरीर का निर्माण पृथ्वी (मिटटी), जल, अग्नि, आकाश और वायु इन पाँच प्राकृतिक तत्त्वों से हुआ है। यह देखा गया है कि जिन तत्त्वों से शरीर का निर्माण हुआ, उन्हीं तत्त्वों से इसकी उत्तम चिकित्सक भी होती है। प्रकृति-प्रदत्त आठ ऐसे चिकित्सक हमें प्राप्त हैं , जिनके सहयोग तथा उचित सेवन से हम यथासम्भव आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं:-
(1) वायु: मानव जीवन में वायु का स्थान जल से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। वायु अमृत है, वायु प्राणरूप में स्थिर है। प्रातःकाल वायु-सेवन करने से देह की धातुए और उपधातुएँ शुद्ध और पुष्ट होती है, मनुष्य बुद्धिमान की शक्ति बढ़ती है, इन्द्रिय-संयम सुलभ होता है तथा प्रसन्नता, आह्नाद व शांति की प्राप्ति होती है। शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध भूमि, शुद्ध प्रकाश एवं शुद्ध अन्न यह पंचामृत कहलाता है। प्रातःकालीन वायुसेवन तथा भ्रमण सैकड़ों रोगों की एक रामबाण औषधि है। शरीर, मन, प्राण, ब्रह्मचर्य, पवित्रता, प्रसन्नता, ओज, तेज, बल, सामथ्र्य, चिरयौवन और चिर उल्लास बनाये रखने के लिए के लिए शुद्ध वायु का सेवन व प्रातःकालीन भ्रमण अति आवश्यक है। प्रातःकाल का वायु-सेवन ‘ब्रह्मवेला का अमृतपान’ कहा गया है।
(2) आहार: शरीर और भोजन का परस्पर संबंध है। प्रत्येक व्यक्ति को सात्त्विक भोजन करना चाहिए क्योंकि सात्त्विक आहार से शरीर की सब धातुओं को लाभ पहुँचता है। सुगमता से पच सके उतना (भूख से थोड़ा कम) आहार लेना स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होता है। मौन होकर लिया गया सुपाच्य एवं सात्त्विक आहार शरीरपोषक, बलप्रद, तृप्तिकारक, आयु, तेज, साहस तथा मानसिक शक्ति व पाचनशक्ति को बढ़ानेवाला होता है। आध्यात्मिक उन्नति में आहार के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए ‘छांदोग्य उपनिषद्’ करती है: आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि....अर्थात् आहार की शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है, सत्त्वशुद्धि से बुद्धि निर्मल और निश्चयी बन जाती है। फिर पवित्र एवं निश्चयी बुद्धि से मुक्ति भी सुगमता से प्राप्त होती है।
(3) जल: सूर्योदय से पहले आठ घूँट जल पीनेवाला मनुष्य रोग और बुढ़ापे से रक्षित होकर दीर्घायु प्राप्त करता है। ताँबे के पात्र में रखा हुआ जल पीने के लिए अधिक अच्छा है। भोजन के बीच-बीच में व दो घंटे बाद जल पीना हितकारी है परंतु भूख लगने पर जल पीना बहुत हानिकारक है। व्यक्ति को एक दिन में कम-से-कम ढाई से तीन लीटर जल पीना चाहिए, इससे रक्त-संचार सुचारू रूप से होता है। देश, ऋतु, प्रकृति, आयु आदि के अनुसार इस मात्रा में परिवर्तन हो सकता है।
(4) उपवास: उपवास से शरीर, मन और बुद्धि सभी की उन्नति होती है। शरीर के त्रिदोष नष्ट हो जाते हैं। आँतों को अवशिष्ट भोजन को पचाने में सुविधा होती है तथा शरीर स्वस्थ होकर हलका-सा प्रतीत होता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से उपवास बहुत ही आवश्यक है। उपवास करने से मनुष्य की आत्मिक शक्ति बढ़ती है। कहते हैं कि यदि महीने में दोनों एकादशियों के निराहार व्रत का विधिवत् पालन किया जाय तो व्यक्ति की प्रकृति पूर्ण सात्त्विक हो जाती है। उपवास से शारीरिक और मानसिक आरोग्य प्राप्त होता है।
(5) सूर्य: जीवन की रक्षा करने वाली सभी शक्तियों का मूल स्त्रोत सूर्य है। सूर्य की किरणें शरीर पर पड़ने से शरीर के अनेक रोग-कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। सूर्य से आरोग्य प्राप्ति के विषय में ‘अथर्ववेद’ में लिखा हैः ‘हे जीव ! सबका स्वामी सूर्य, सबका प्रेरक परमात्मा तुझे अपनी व्यापक बलकारिणी किरणों से ऊँचा उठाये रखे। तेरे शरीर को और जीवनीशक्ति को गिरने न दे।’ प्रातः सूर्य किरणों से स्नान करने से अनेक प्रकार के रोग शांत किये जा सकते हैं।
(6) व्यायाम: व्यायाम से आलस्य-थकान दूर होकर स्फूर्ति आती है, कार्यक्षमता बढ़ती है, मोटापा नहीं रहता तथा शरीर पुष्ट हो जाता है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है, उचित मात्रा में नींद आती है, सौंदर्य बढ़ता है और मन की चंचलता दूर होती है। सदाचार और व्यायाम के बल पर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन सम्भव हो सकता है। व्यायाम में भी सूर्यनमस्कार विशेष हितकारी है।
(7) विचार: विचारों का प्रभाव सीधा स्वास्थ्य पर पड़ता है। संकल्प की दृढ़ता व सात्त्विक चिंतन-मनन रोगों को निर्मूल करने के लिए बहुत आवश्यक हैं। दूषित विचारों से न केवल मन विकृत होकर रूग्ण होता है, अपितु शरीर भी रोगी हो जाता है। सम्यक् सत् चिंतन एवं सम्यक् सद्विचार एक जीवनीशक्ति है। अतः आरोग्य-लाभ के लिए मनुष्य को विचारशक्ति का आश्रय लेना चाहिए।
(8) निद्रा: स्वास्थ्य-रक्षा के लिए यथोचित एवं प्रगाढ़़ निद्रा भी आवश्यक है। रात्रि में उचित समय पर सोने से धातुएँ साम्य अवस्था में रहती हैं और थकान-आलस्य दूर होता है। पुष्टि, कांति, आयु, बल और उत्साह बढ़ता है तथा जठराग्नि प्रदीप्त होती है। स्वप्नदोष, धातुदौर्बल्य, सिर के रोग, आलस्य, अल्पमूत्र और रक्तविकार आदि से रक्षा होती है। सोते समय ढीले वस्त्र पहनने चाहिए तथा मुँह ढक्कर नहीं सोना चाहिए। दिन की निद्रा रोगकारक है परंतु जागरण होने पर व गर्मियों में अल्प मात्रा में ले सकते हैं। सोने से पहले मन को समस्त शोक, चिंता व भय से रहित कर प्रसन्नता, संतोष और धैर्य को धारण कर लेना चाहिए। फिर प्रार्थना, आत्मचिंतन व अजपाजप करते हुए सोना चाहिए। इसे ‘योगनिद्रा’ कहते हैं, जो स्वास्थ्य-लाभ के साथ-साथ महान आध्यात्मिक लाभ भी प्रदान करती है। इससे आप प्रातःकाल अपने में महान परिवर्तन पायेंगे।
इस प्रकृति-प्रदत्त आठ चिकित्सकों के समुचित सेवन से मनुष्य-जीवन स्वस्थ, समृद्ध, सुख-सम्पत्ति तथा आनंद से परिपूर्ण और दीर्घायु होता है। तेरा नाम ही मेरा आरोग्य है, तेरा स्मरण ही मेरी औषधि।