सत्कर्मों की खेती है-अध्यात्म

           


                डॉ जगदीश गाँधी


संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ


प्रश्न 1 अध्यात्म क्या है?
उत्तर: आध्यात्मिकता का अर्थ है- उस चेतना पर विश्वास करना जो प्राणधारियों को, एक के साथ दूसरे को जोड़ती है। सुख-संवर्द्धन और दुःख निवारण की स्वाभाविक आकांक्षा को अपने शरीर या परिवार तक सीमित न रखकर अधिकाधिक व्यापक विस्तृत बनाती है। अध्यात्म का सीधा अर्थ आत्मीयता के विस्तार के रूप में किया जा सकता है। आध्यात्मिकता और आस्तिकता एक ही लक्ष्य के दो प्रयोजन हैं। ईश्वर की दार्शनिक व्याख्या मानवी अंतःकरण में विद्यमान उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के रूप में ही की जा सकती है।
सत्कर्मों की खेती है-अध्यात्म। अध्यात्मशास्त्र का मंतव्य यह है कि हर व्यक्ति को अपने शारीरिक और मानसिक क्षेत्र को उर्वर भूमि मानकर उसमें सद्गुणों की, सत्कर्मों की, सत्स्वभाव की कृषि करनी चाहिए। सद्भावनाओं और सत्प्रवत्तियों की बहुमूल्य फसलें उगानी चाहिए। अध्यात्म भारत की महानतम संपत्ति है। उसे मानवता का मेरूदंड कहा जा सकता है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक चिरस्थायी उत्कर्ष का एकमात्र
आधार यही है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सुख-शांतिपूर्वक जीने के लिए अध्यात्म ही एकमात्र उपाय है।
अध्यात्म मानव जीवन के श्रेष्ठतम सदुपयोग की एक वैज्ञानिक पद्धति है। उसे जीवन जीने की कला भी कहा जा सकता है। मानव जीवन इस संसार का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। भगवान के पास जो कुछ विभूतियाँ हैं, वे सभी मनुष्य शरीर में बीज रूप में भर दी हैं। ऐसे बहुमूल्य संयंत्र का सुसंचालन एवं सदुपयोग यदि प्राप्त न हो तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। मानव जीवन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं मूल्यवान प्रक्रिया है। उसका विज्ञान एवं विधान जाने बिना या जानकर उस पर चले बिना यह आनंद एवं श्रेय नहीं मिल सकता जो मनुष्य जीवन जीने वाले को मिलना ही चाहिए।
अध्यात्म हमें अपने अन्तःकरण की यात्रा कराता है। अध्यात्म हमें अपने हृदय में विराजे परमात्मा से साक्षात्कार तथा वार्तालाप कराता है। आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने के लिए सर्वप्रथम एक पवित्र, दयालु एवं ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय धारण करना पड़ता है। ऐसा करने से यह पुरातन एवं अमिट सारी सृष्टि हमें अपनी प्रतीत होने लगती है। हमें सारी वसुधा कुटुम्ब की तरह प्रतीत होती है।
प्रश्न 2 वह कौन सा ज्ञान है जिससे आत्मा व परमात्मा का अनुभवपरक ज्ञान हो?
उत्तर: हमें लोक कल्याण की भावना से ओतप्रोत होकर नौकरी या व्यवसाय करते हुए अपनी आत्मा का विकास करना चाहिए। कर्तव्यपरायणता, निष्ठा, सेवाभाव तथा मेहनत से अपनी नौकरी या व्यवसाय के द्वारा ही हम अपनी आत्मा व परमात्मा के अनुभवपरक ज्ञान को अर्जित कर सकते हैं। हमें हर पल प्रार्थना करनी चाहिए कि हे ईश्वर, हमारे प्रत्येक कार्य-व्यवसाय रोजाना तेरी सुन्दर प्रार्थना बने। एक छात्र के रूप में हमें शिक्षा लोक कल्याण के भाव से अर्जित करनी चाहिए। हमें ऐसा कैरियर, नौकरी या व्यवसाय चुनना चाहिए जो हमें आध्यात्मिक संतुष्टि प्रदान करें।
प्रश्न 3 वह कौन सा ज्ञान है जिसे जानने के बाद कुछ जानना शेष न रह जाए?
उत्तर: संत तुलसी के शब्दों में - जानत तुमहि, तुमहि होई जाई। परमात्मा हमारी आत्मा का पिता है। अपनी आत्म स्थिति को ऊँचा उठाकर परमात्मा तक पहुँचना ही जीव का परमात्मामय हो जाना है। परमात्मा की एकमात्र इच्छा लोक कल्याण की सदैव से रही है। परमात्मा की लोक कल्याण की इच्छा को अपनी इच्छा बना लेना परमात्मामय हो जाना है।
एक सुन्दर प्रार्थना है - हे परमात्मा मैं साक्षी देता हूँ कि तूने मुझे इसलिए उत्पन्न किया मैं तुझे जांनू तथा तेरी पूजा करूँ। तुझे जानने का मायने है तेरी शिक्षाओं की गहराई में जाकर उसके गूढ़ रहस्यों को जांनू तथा पूजा के मायने है उन शिक्षाओं को आचरण में उतारकर उसके अनुरूप अपने कार्य-व्यवसाय को करूँ। परम पिता परमात्मा नये-नये रूप धारण करके मानवता का उद्धार करने तथा उसे सच्चा मार्ग दिखाने धरती पर आता है। परम पिता परमात्मा की ओर से अलग-अलग युग में तथा अलग-अलग रूपों में अपने युग के अनुकूल शिक्षायें लेकर युग अवतार संसार में आते रहे हैं और आगे भी निरन्तर आते रहेंगे। अपने युग के युगावतार को पहचान करके उनकी शिक्षाओं पर दृढ़तापूर्वक चलना सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। युग अवतार को पहचाने तथा उसकी शिक्षाओं को जान लेने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रहता।
प्रश्न 4 बहाई धर्म क्या है?
उत्तर: बहाई विश्व परिवार एक ऐसी धार्मिक संस्था है जिसके अनुयायी विभिन्न देशों, संस्कृतियों, धर्माे एवं विभिन्न विश्वासों की पृष्ठभूमि से हैं। बहाईयों की सभी धर्मो के प्रति सम्मान एवं सामॅंजस्य की भावना विश्व शान्ति का वातावरण निर्मित कर रहा है। बहाई विश्व परिवार हम सभी को संसार में एक साथ मिलजुल कर रहने तथा कार्य करने की प्रेरणा देता है। बहाई धर्म का मानना है कि मानव जाति एक है, धर्म एक है तथा ईश्वर एक है।
बहाई बनने का अर्थ है ईश्वर की एकता, धर्मों की एकता तथा मनुष्य मात्र की एकता में विश्वास करना, यह अनुभव करना कि धर्म प्रगतिशील तथा शाश्वत् है तथा धर्म फूट के लिये नहीं अपितु एकता के लिये है। इसके अतिरिक्त हर बहाई को इस बात का विश्वास होता है कि सभी धर्म मूलतः दिव्य और एक समान है। बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह (शाब्दिक भावार्थ - परमात्मा का प्रताप) इस युग के लिए ईश्वर के अवतार हैं और संसार में पहले अवतारित हुए ईश्वरावतारों की भाँति बहाउल्लाह भी इस युग में हमारे लिये प्रसन्नता तथा एकता का एक नया युग लेकर आये हैं। बहाइयों का उद्देश्य लोगों की सेवा तथा संसार में एकता एवं प्रसन्नता लाना है। बहाई लोगों के हृदयों में परिवर्तन लाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हृदय परिवर्तन परमात्मा की पवित्र वाणी की शक्ति के अतिरिक्त और किसी प्रकार सम्भव नहीं है। एक कर दें हृदय अपने सेवकों के हे प्रभु, कर निज महान उद्देश्य उन पर कर प्रगट मेरे विभु।


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