हमारी परंपरा का हिस्सा है क्वारंटीन !

कोरोना वायरस के प्रकोप के साथ क्वारंटीन पद्धति आज चर्चा में है। वायरस से बचने के लिए इसका प्रयोग किया जा रहा है। लोग घरों में बंद हैं। तमाम तरह की सामाजिक आवाजाही ठप है। नई पीढ़ी के लिए यह चौंकाने वाली बात है, पर दुनिया में इसका इस्तेमाल अरसे से होता रहा है। भारतीय परंपरा में तो यह सदियों से प्रचलित रहा है। क्वारंटीन या ‘संगरोध’ भारतीय जीवन शैली के लिए कोई नई बात नहीं है। हमारी परंपरा में संक्रामक रोगों से बचने का सही और कारगर उपाय स्वयं को दूसरों के शारीरिक संपर्क से अलग-थलग रखना ही रहा है। यह रोगी और निरोगी, दोनों के रोगों से बचाव और उनके स्वास्थ्य संबंधी हितों की दृष्टि से एक उपाय के रूप में मान्य रहा है।

बचाव के तरीके

विज्ञान की यह मान्यता कि रोकथाम या बचाव इलाज से बेहतर है (प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर), भारतीय जीवन शैली में हजारों सालों से शिशु के जन्म से व्यक्ति की मृत्यु तक मानव व्यवहार का अंग रही है। सच कहें तो भारतीय संस्कृति में मान्य जीवनशैली के अंग के रूप में जन्म से मृत्यु तक प्रचलित ‘सूतक’ ही वर्तमान ‘संगरोध’ या क्वारंटीन है। क्वारंटीन मूलत: लैटिन भाषा का शब्द है। शब्दकोशों और ज्ञानकोशों के अनुसार इसका शाब्दिक अर्थ वैसे तो ‘चालीस’ है पर इसका व्यावहारिक अर्थ संक्रामक रोगों से ग्रसित या ऐसे रोगियों के संपर्क में आए लोगों के घूमने–फिरने, औरों से संपर्क में आने या घुलने-मिलने को सीमित या प्रतिबंधित करने से लिया जाता है। याद कीजिए आज भी किसी को चेचक निकलती है, तो उसे घर में ही अलग कमरे में रखा जाता है। हफ्ता-10 दिन में चेचक का वायरस अपने आप ठीक हो जाता है।

क्वारंटीन की शुरुआत ब्रिटेन में फैले प्लेग के संक्रमण के दौरान हुई और अब इसे अंतरराष्ट्रीय वैधानिक मान्यता प्राप्त है। 20वीं सदी के प्रारंभ में महात्मा गांधी पत्नी कस्तूरबा और दोनों बच्चों के साथ 44 दिन के समुद्री तूफान को झेलते हुए डरबन, दक्षिण अफ्रीका पहुंचे, तो उन्हें क्वारंटीन कानून के तहत जहाज से नहीं उतरने दिया गया। अंग्रेज शासकों ने भारत में प्लेग फैलने के बाद अफ्रीका पहुंचे गांधी को संक्रमण के बहाने क्वारंटीन में डाल दिया। गांधी ने संक्रमण के प्रतिबंध को पूरी तरह स्वीकार किया और धैर्यपूर्वक एकांतवास में रहे। इस तरह दूसरी बार गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका में प्रवेश न देने की अंग्रेजों की चाल असफल हो गई।

भारतीय जीवन शैली में बच्चे के जन्म के समय ऐसा ही सूतक लागू करके जच्चा-बच्चा को अलग कक्ष में रख कर पूरे एक मास तक नवजात और माता को किसी भी संक्रमण से बचाने की पूरी प्रक्रिया आज भी गांवों में मान्य और प्रचलित है। इस दौरान कई तरह के औषधियुक्त जल से जच्चा-बच्चा का स्नान और शुद्धीकरण किया जाता है। पूरे महीने के क्वारंटीन में मां और शिशु, दोनों का खान-पान सब कुछ अलग होता है।

इसी तरह मृत्यु के बाद 10-13 दिनों के सूतक की हमारी परंपरा रही है। शव में रोगाणु हो सकते हैं। अत: अंतिम क्रिया करने वाले व्यक्ति का 10-12 दिनों तक बिल्कुल अलग कक्ष में रहना, जिस परिवार में किसी की मृत्यु हुई उस परिवार से कम से कम 10 दिनों तक केवल जरूरी संपर्क रखना, सामाजिक आवाजाही रोक देना अर्थात् सूतक बरतना आवश्यक माना जाता है। इन दिनों में घर-परिवार में कोई धार्मिक पूजा या अनुष्ठान नहीं होते। परिवार के लोगों का मंदिरों में जाना या पूजा-पाठ करना भी वर्जित होता है। जिस घर में मृत्यु सूतक होता है, वहां अन्य लोग अन्न-जल नहीं ग्रहण करते।

गंभीर बीमारी की दशा में भी बीमार व्यक्ति को अलग-थलग रखने और उसके उपचार में लगे व्यक्ति को भी अन्य लोगों से दूर रखने की हिदायत का पालन आज भी भारतीय जीवनशैली में अनिवार्य है। बीमारी के दौरान और पूजा-पाठ के लिए सदा धुले हुए और साफ कपड़े पहनना जरूरी है। बीमार या संक्रमित व्यक्ति के वस्त्रों और बिछावन को बदलते रहना जरूरी है।

दिनचर्या का अंग

आज की दिनचर्या में हाथ मिला कर अभिवादन और स्वागत करने की पश्चिमी परंपरा के स्थान पर दोनों हाथ जोड़ कर अभिवादन-स्वागत की भारतीय जीवनशैली अपनाने को पूरा विश्व मजबूर हुआ है, क्योंकि यह वैज्ञानिक और उपयोगी है। पैर-हाथ धोकर और शुद्धीकरण के बाद ही धार्मिक अनुष्ठान करने तथा शौचालय से निकल कर स्नान करने की भी परंपरा रही है। हाथ-पैर धोकर ही भोजन करना और बाद में भी उसी तरह हाथ-पैर धोकर दूसरे काम करने की प्रक्रिया दैनिक जीवन में मान्य है। कोरोना के संकट से भारतीय जीवन-पद्धति की महत्ता भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में नए सिरे से स्थापित हुई है।