करोना और लाकडाउन कै दौर में अपराधों में कमी!

     महेश चन्द्र द्विवेदी
     पूर्व महा निदेशक
     उत्तर प्रदेश पुलिस

 

वर्ष 2007 में हुए प्रादेशिक चुनाव के बात एक दशक पहले की है ,तत्कालीन मुख्य मंत्री ने पुलिस को आदेश निर्गत कर दिया था कि छः माह में अपराधों में 70 प्रतिशत की कमी हो जानी चाहिये।  फिर समीक्षा बैठक में वे पुलिस अधिकारी नाप  दिये  गये थे जिनके यहां अपराधों में कमी कम पाई गई थी। फिर क्या था थाने पर आने वाले शिकायतकर्ताओं को सिपाहियों-दरोगाओं ने दौड़ाना शुरू कर दिया और शीघ्र ही मुख्य-मंत्री चौराहे पर शासन की उपलब्धि के रूप में छः महीने में 70 प्रतिशत अपराध कम कर दिये जाने के होर्डिंग लग गये थे। यद्यपि तथ्य यह था कि वादियों को गाली-गलौज और ठुकाई से भगाने के पूरे प्रयत्न के बावजूद लिखे गये अपराधों में 35-40 प्रतिशत से ज़्यादा कमी नहीं आ पाई थी, क्योंकि पूर्ववर्ती शासन में भी  अपराधों के आंकड़े यथासम्भव नियंत्रण में रखे जाने की नीति अपनाई जा रही थी।

 

लाकडाउन के दौर में मैंने अखबार में पढ़ा कि कोरोना के कारण अपराधों में 65 प्रतिशत कमी  आई है। इन अंंकों मेंंअविश्वास का कोई आधार नहीं है क्योंकि एक तो आंकड़े कम करने का शासकीय निर्देश नहीं है और दूसरे थाने के सिपाहियों-दरोगाओं को आजकल फुरसत ही नहीं है कि वे वादियों को थाने से भगा सकें। स्थिति के विश्लेषण से मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि आजकल सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी चोरों में उत्पन्न हो गई है- लोग घरों से बाहर नहीं निकलते हैं, तो बिचारे चोर घरों में कब घुसें, कार-बाइक-स्कूटर भी घरों में बंद हैं, बिचारे चोर कहां से उठायें, सड‌‌‌‌‌कों पर दिन-रात पुलिस मौजूद रहती है, बिचारे चोर दुकानों का ताला कब तोड़ें? पुलिस की इतनी मुस्तैदी के कारण डकैतों के यहां भी फाके पड़ रहे हैं। अतः कोरोना भगाने के लिये सबसे अधिक पूजा-पाठ करके चोर-डकैत सरकारी प्रयास में बड़े मनोयोग से योगदान कर रहे हैंं।

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