मनुष्य एक भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्राणी है!


                डॉ जगदीश गाँधी


संस्थापक -प्रबंधक सिटी मोन्टेसरी  स्कूल, लखनऊ



(1) मनुष्य एक भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्राणी है:-
जब से परमात्मा ने यह सृष्टि और मानव प्राणी बनाये तब से परमात्मा ने उसे उसकी तीन वास्तविकताओं (1) भौतिक (2) सामाजिक तथा (3) आध्यात्मिक के साथ एक संतुलित प्राणी के रूप में निर्मित किया है। परिवार, समाज तथा स्कूल तीनों मिलकर बालक को निपट भौतिक व सांसारिक ज्ञान करा रहे हैं। जबकि परिवार, समाज तथा स्कूल तीनों को मिलकर बालक की तीनों वास्तविकताओं अर्थात भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक का संतुलित विकास करना चाहिये तथा उसमें पवित्रता का गुण, दयालुता का गुण तथा ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित होकर समाज में अच्छा आचरण करने के गुण विकसित करने चाहिये।
(2) विद्यालय रूपी तीरथ-धाम के मंदिर रूपी कक्षाओं में ही मानव जाति का भाग्य गढ़ा जाता है:-
वैसे तो तीनों स्कूलों परिवार, समाज तथा विद्यालय के अच्छे-बुरे वातावरण का प्रभाव बालक के कोमल मन पर पड़ता है। लेकिन बालक के जीवन निर्माण में इन तीनों में से सबसे ज्यादा प्रभाव विद्यालय रूपी तीरथ-धाम का पड़ता है क्योंकि स्कूल चार दीवारों वाला वह तीरथ-धाम है जिसमें कल का भविष्य छिपा है। साथ ही सम्पूर्ण मानव जाति का भाग्य इसी तीरथ-धाम के मंदिर रूपी क्लास रूम में गढ़ा जाता है। अतः यदि किसी तीरथ-धाम रूपी विद्यालय में भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक तीनों गुणों से ओतप्रोत शिक्षक हों तो वह स्कूल के वातावरण को बदल कर प्रत्येक बालक के जीवन में प्रकाश भर सकता है। वह टीचर बच्चों को इतना पवित्र, महान तथा चरित्रवान बना सकता है कि ये बच्चे अपने मां-बाप को भी बदल कर समाज की बुराईयों से उन्हें बचा सकते हंै।
(3) बालक परमपिता परमात्मा की सर्वोच्च कृति है:-
विद्यालय रूपी तीरथ धाम के मंदिर रूपी क्लास रूमों में आज (अ) शुद्ध (ब) दयालु तथा (स) ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय वाला नन्हा बालक 2-3 वर्ष की नन्ही सी अवस्था में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आता है। इस समय तक बालक के मन-मस्तिष्क में किसी भी प्रकार के विकार का जन्म नहीं हुआ होता है। अतः शिक्षकों का यह प्रथम दायित्व बनता है कि वे विद्यालय रूपी तीरथ-धाम की पवित्रता को बनाये रखते हुए ईश्वर की सर्वोच्च कृति के रूप में पृथ्वी पर भेजे गये प्रत्येक बालक में व्याप्त ईश्वरीय गुणों का पूर्ण विकास क्लास रूम रूपी मंदिर में करके उसे एक सच्चा ईश्वर भक्त इंसान बनायें।
(4) प्रत्येक बालक को विश्व नागरिक बनायें:-
स्कूल ही समाज के प्रकाश का केन्द्र है। आधुनिक स्कूल की सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक बालक को वर्तमान सामाजिक आवश्यकता के अनुरूप (1) भौतिक, (2) सामाजिक तथा (3) आध्यात्मिक तीनों प्रकार की संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण शिक्षा देकर उसे इस युग के अनुरूप एक नई दिशा देने के लिए संतुलित विश्व नागरिक बनायें।
(4) मनुष्य को संतुलित, सुखी और समृद्ध बनाने में उद्देश्यपूर्ण शिक्षा सहायक होती है:-
श्री गोपाल कृष्ण गोखले, पं0 मदन मोहन मालवीय, गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डा0 अम्बेडकर, अब्राहम लिंकन, मदर टेरेसा आदि ने अकेले ही सारे समाज को बदलने की मिसालें प्रस्तुत की हैं। एक अच्छा शिक्षक पहले प्रत्येक बालक के अन्तरिक गुणों को विकसित करके उन्हें नेक बनाता है फिर उसके बाह्य गुणों को विकसित करके उन्हें चुस्त भी बना देता है। प्रत्येक तीरथ-धाम रूपी विद्यालय के प्रत्येक शिक्षक को बालक को इस धरती का प्रकाश तथा मानव जाति का गौरव बनाना चाहिए। ऐसे ही शिक्षकों के श्रेष्ठ मार्गदर्शन द्वारा धरती पर स्वर्ग अर्थात ईश्वरीय सभ्यता की स्थापना होगी। मानव सभ्यता के इस परम उद्देश्य को पाने के लिए हमारा एक ही संकल्प होना चाहिए - प्रभु काज किये बिना मुझे कहाँ विश्राम।