प्रदेश के गन्ना किसानों को मिली गन्ने की दो नई किस्में


 आयुक्त, गन्ना एवं चीनी, उ.प्र. लखनऊ के कार्यालय सभाकक्ष में श्री संजय आर. भूसरेड्डी, आयुक्त, गन्ना एवं चीनी, उ.प्र., की अध्यक्षता में ’’बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृत उप समिति’’ की बैठक आयोजित की गयी, जिसमें गन्ना शोध परिषद, शाहजहाॅपुर, शोध संस्थान/केन्द्र सेवरही व मुजफफरनगर तथा भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ, के वैज्ञानिकों, चीनी मिलों यथा-दौराला, अजबापुर, पलिया, बिसवाॅं एवं रोजागाॅव के अधिकारियों एवं कृषक प्रतिनिधियों द्वारा प्रतिभाग किया गया। उक्त बैठक में सम्बन्धित वैज्ञानिकों द्वारा गन्ने की विभिन्न होनहार जीनोटाइप के उपज एवं चीनी परता के आॅकड़े प्रस्तुत किये गये एवं उन पर विचार-विमर्श किया गया।
विभिन्न जीनोटाइप के प्रस्तुत आॅकड़ों के आधार पर अगेती किस्मों में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित को.लख. 14201 तथा मध्य देर से पकने वाली किस्मों में उ.प्र. गन्ना शोध परिषद, शाहजहाॅपुर द्वारा विकसित को.शा. 14233 को तुलनात्मक रूप से बेहतर पाया गया, जिसे ’’बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृत उप समिति’’ द्वारा सर्वसम्मति से प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए सामान्य खेती हेतु अनुमोदित किया गया। उपसमिति द्वारा की गई संस्तुतियों के क्रम में अध्यक्ष श्री भूसरेड्डी द्वारा बताया गया कि वर्तमान में गन्ना किस्म को. 0238 में लालसड़न रोग के बढ़ते आपतन को देखते हुए गन्ना किसानों को दूसरी गन्ना किस्मों को अपनाया जाना आवश्यक है और उपज के आंकड़ों के अनुसार इस कड़ी में ये दोनों नव विकसित किस्में सामान्य खेती हेतु सर्वथा उपयुक्त होंगी।  
उ. प्र. गन्ना शोध परिषद के निदेशक डा. जे. सिंह ने बताया कि को.लख.14201 (शीघ्र) की औसत उपज 84.34-91.58 टन प्रति हैक्टर तथा इसका पोल इन केन प्रतिशत माह नवम्बर, जनवरी एवं मार्च में क्रमशः 11.71, 12.96, तथा 13.81 पाया गया है। इसी तरह किस्म को.शा.14233 की औसत उपज 87.90-93.65 टन प्रति हेक्टेयर पायी गयी है तथा इसका पोल इन केन प्रतिशत माह नवम्बर, जनवरी एवं मार्च में क्रमशः 11.75, 12.81 तथा 13.63 पाया गया है। डा. सिंह ने यह भी बताया कि को.लख. 14201 का गन्ना सीधा खड़ा रहता है जिससे बंधाई की कम आवश्यकता पड़ती है तथा इसका गुड़ सुनहरे रंग का, देखने में आकर्षक एवं उच्च गुणवत्तायुक्त होता है। यह किस्म लालसड़न रोग के प्रति मध्यम रोगरोधी है तथा इस पर बेधक कीटों का भी प्रकोप कम होता है। इसी प्रकार मध्य देर से पकने वाली किस्म को.शा.14233 का उल्लेख करते हुए बताया गया कि इस किस्म का गन्ना सीधा, मध्यम मोटा, मध्यम कड़ा एवं ठोस होता है तथा पेड़ी उपज भी बेहतर है।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि को. 0118 एवं को 0239 एक ही गन्ना किस्म है। अतः स्वीकृत किस्मों की सूची में से को. 0239 का नाम विलोपित कर दिया जायेगा और को. 0239 का जो भी क्षेत्र सर्वेक्षित किया गया है उसे को. 0118 मान लिया जायेगा। समिति द्वारा यह भी निर्णय लिया गया कि एकल गन्ना किस्मों की बुवाई के कारण प्रदेश में रोगों का प्रकोप बढ रहा है, अतः प्रजातीय संतुलन बनाये रखने हेतु अगेती एवं मध्य देर की किस्मो का एक निश्चित संतुलन रखा जाना आवश्यक है। चीनी मिलें इस हेतु आगे आये और अपने मिल क्षेत्र में प्रजातीय संतुलन को बढ़ावा देने का प्रयास करें।
उ.प्र. गन्ना शोध परिषद के आंकड़ों के अनुसार यह भी अवगत कराया गया कि गन्ना किस्म को.पी.के. 05191 में चीनी परता कम है तथा लाल सड़न रोग का भी प्रकोप बढ रहा है। तदनुसार उपसमिति द्वारा इस किस्म को प्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिए मध्य एवं देर श्रेणी की किस्म के रूप में शामिल करने एवं आगामी वर्षो में इसे फेजआउट करने का निर्णय लिया गया।
उपसमिति की बैठक में चर्चा में यह भी आया कि कुछ किसान दूसरे प्रदेशों या विदेशों से गन्ने के टुकड़े लाकर उसका मल्टीप्लीकेशन कर गन्ना उगा लेते है जो प्रदेश के लिए उपयुक्त नहीं है और इन गन्नों के माध्यम से रोग-कीटों के नये रेस भी आ जाते है। कतिपय चीनी मिलें भी अधिक चीनी परता के प्रारम्भिक आंकड़ों के आधार पर लालच में पड़कर ऐसी किस्मों को अपनाने का प्रयास करते है। जिसके क्रम में आयुक्त, गन्ना एवं चीनी उद्योग उ.प्र. श्री संजय आर. भूसरेड्डी ने गन्ना किसानों एवं चीनी मिल प्रतिनिधियों को सख्त निर्देश दिये कि बिना क्वारन्टाइन के नियमों का पालन किये कोई भी गन्ने की किस्म की बुवाई प्रदेश में न की जाय। प्रदेश में नये रोग एवं कीटों का प्रकोप रोकने हेतु यह आवश्यक है कि प्रदेश हेतु स्वीकृत गन्ने की किस्मों की ही बुवाई की जाये।


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