मृदा अनुसंधान के लिए समर्पित और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व

                                                                     डा0 ब्रह्म स्वरूप द्विवेदी

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट) नई दिल्ली में मृदा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष देश के जाने-माने एवं सुप्रतिष्ठत कृषि वैज्ञानिक डा0 ब्रह्म स्वरूप द्विवेदी का जन्म कन्नौज जनपद के ग्राम तहसीपुर में हुआ। उनके पिता पं0 सन्तराम द्विवेदी एक सामान्य किसान हैं। डाॅ0 द्विवेदी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव एवं स्थानीय एस0एन0इण्टर कालेज कन्नौज में हुई। वह प्रारम्भ से ही एक मेघावी छात्र रहे, तथा उन्होेंने उ0प्र0 माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की इण्टरमीडिएट (कृषि) परीक्षा में प्रदेश में प्रथम स्थान अर्जित किया। तत्पश्चात उन्होंने चन्द्र शेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय कानपुर से स्नातक एवं पी0एच0डी0 डिग्री प्राप्त की। प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डाॅ0 के0एन0 तिवारी के कुशल मार्गदर्शन में डाॅ0 द्विवेदी ने पी0एच0डी0 के दौरान उ0प्र0 की मिट्टियों में सूक्षम तत्वों की कमी का आॅकलन तथा प्रमुख फसलों की सूक्ष्मतत्वीय आवश्यकता एवं प्रबन्धन पर गहन शोध किया। 

डाॅ0 ब्रह्म स्वरूप द्विवेदी माता भूमिः पुत्रौऽहम पृथिव्याः के भाव से सदैव लवरेज रहे।  ग्रामीण परिवेश में जन्मंे पले डाॅ0 द्विवेदी को सोंधी माटी की महक हमेशा बरगलाए रही। स्नात्कोत्तर शिक्षा भी उन्होनंे मृदा विज्ञान में ही पूरी की और उन्होनें मिट्टी को ही शोध का विषय बनाया।। मृदा उर्वरता और उसके अनुरूप उर्वरकों के प्रयोग को लेकर शुरू की गयी अपनी शोध में उन्होने मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति, उसके महत्व, फसलों में पोषक तत्वों की कमी होने की स्थिति के लक्षण और फिर उसकी भरपाई को प्रमुख रूप से सामने रखा। यह वह दौर था जब भारतीय मिट्टियों में सघन कृषि के फलस्वरूप प्रमुख पोषक तत्वों के साथ ही गौण और सूक्षम पोषक तत्वों की व्यापक कमी के संकेत मिलने लगे थे। इस दृष्टि से डा0 द्विवेदी का शोध कार्य  बेहद महत्वपूर्ण था। 

अस्सी के दशक में जब भारतीय मिट्टियों में बहु पोषक तत्वों की बढ़ती कमी की समस्या मुखर हुई तो डा0 द्विवेदी की शोध की महत्ता जन जन के सामने आयी और उनके इस शोध कार्य ने देश भर के मृदा वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया। मृदा अनुसंधान की इस हस्ती में सिद्धहस्त लेखन का कौशल माँ सरस्वती ने कूट कूट कर भरा है जिससे उन्होने माटी की महक जन-जन तक पहुँचाई। मिट्टी जैसे गूढ़ और सहज समझ न आ पाने वाले विषय पर डा0 द्विवेदी ने अपनी लेखनी चलाई और वह भी जन जन की भाषा हिन्दी में। अंग्रेजी भाषा में सिद्ध लेखन की कला से कृषि ज्ञान को देश के अन्य क्षेत्रों के जन-मानस तक पहुँचाने में अभूतपूर्व सफलता मिली।

डा0 द्विवेदी ने देश के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों की मिट्टी की उर्वरता एवं उसके अनुरूप पोषक तत्वों की मांग, उर्वरकों के कारगर उपयोग, मिट्टी परीक्षण, विभिन्न फसलों  एवं फसल प्रणालियों की मांग के अनुसार पोषक तत्वों की न्याय संगत समेकित पूर्ति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दो को अपनी शोध में शामिल किया। उन्होनें मिट्टी-परीक्षण, प्रक्षेत्र-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबन्धन, संरक्षण कृषि तथा फसल विविधीकरण के माध्यम से मिट्टी की सेहत सुधारने तथा उर्वरकों की दक्षता बढ़ाने हेतु मौलिक शोध किए। 

डाॅ0 द्विवेदी ने अखिल भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा वर्ष 1986 में उत्तीर्ण की तथा आई0सी0ए0आर0 के विभिन्न संस्थानों में तीन दशक से अधिक अनुसंधान एवं शिक्षण कार्य किया। पूसा संस्थान में मृदा विज्ञान के अध्यक्ष के रूप में डाॅ0 द्विवेदी ने कई बड़ी शोध परियोजनाओं का नेतृत्व किया व मृदा-वैज्ञानिकों की सशक्त टीमों का सृजन किया, जिनके द्वारा मिट्टी परीक्षण तकनीक, नवोन्मेषी उर्वरक उत्पादों का विकास, भारी धातुओं के प्रदूषण का आॅकलन व निराकरण आदि विषयों पर उच्च कोटि का शोध कार्य किया। डाॅ0 द्विवेदी के मार्गदर्शन में भारत में पहली बार एक ‘‘पोर्टेबल डिजिटल मिट्टी परीक्षण किट’’ (पूसा स्वायल टेस्टिंग एण्ड फर्टिलाइजर रिकमेंडेशन मीटर (पूसा एस0टी0एफ0आर0मीटर) का विकास किया गया जिससे किसानों को अपने गाँव में ही मिट्टी परीक्षण की सेवा सुलभ हो सकी। यह यंत्र मिट्टी के कुल चैदह (14) गुणों का परीक्षण करता है तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता के आधार पर उर्वरक संस्तुति भी दर्शाता है। तीन-चार दिन का सामान्य प्रशिक्षण लेकर शिक्षित ग्रामीण युवा इस यंत्र से मिट्टी परीक्षण का स्वरोजगार प्रारम्भ कर सकते हैं। 

डाॅ0 द्विवेदी के शोध केवल संस्थानों के शोध प्रक्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहे, अपितु वह पूर्वोत्तर राज्यों, मध्य व पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा आदि राज्यों के किसानों के साथ उनके खेतों पर पोषक तत्वों के संतुलित प्रबन्धन विषयक शोध फैले रहे हैं। पूसा संस्थान की फैकल्टी के तौर पर डाॅ0 द्विवेदी सतत अध्यापन  कार्य से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं तथा उनके मार्गदर्शन में कई छात्रों ने एम0एससी0 व पीएच0डी0 की उपाधियाँ अर्जित की है और उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए पुरस्कृत भी हो चुके हैं। 

डाॅ0 द्विवेदी ने 200 से अधिक शोध पत्र व किसानोपयोगी लेख प्रकाशित किए हैं। कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं व्यावहारिक अनुसंधान के लिए डाॅ0 द्विवेदी कोे कई मानक पुरस्कारों से नवाजा गया है जिनमें सुप्रतिष्ठित रफी अहमद किदवई अवार्ड, हरि कृष्ण शास्त्री मैमोरियल अवार्ड, रानाडे अवार्ड, आई0एस0एस0एस0 प्लैटिनम जुबली अवार्ड, एफ0ए0आई0 गोल्डन जुबली अवार्ड, आई0पी0एन0 आई0-एफ0ए0आई0 अवार्ड इत्यादि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त डाॅ0 द्विवेदी को सर्वश्रेष्ठ लेखन के लिए अनेकों बार धीरू मोरारजी मेमोरियल अवार्ड एवं श्री राम अवार्ड से सम्मानित किया गया है। डाॅ0 द्विवेदी नेशनल एकेडेमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेस, नेशनल एकेडेमी ऑफ  बायलाॅजिकल साइंसेस तथा इण्डियन सोसायटी ऑफ  स्वायल साइंस के फेलो भी हैं। इसके अलावा वह कई राष्ट्रीय संस्थानों, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय तथा उर्वरक उद्योग की विभिन्न सलाहकार समितियों से भी जुड़े हुए हैं। 

डाॅ0 ब्रह्म स्वरूप द्विवेदी का नागपुर स्थित राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एन0बी0एस0बी0 एण्ड एल0 यू0पी0) के निदेशक पद पर चयनोपरान्त नियुक्ति हुई है। आई0सी0ए0आर0 का यह राष्ट्रीय संस्थान अपने पाँच क्षेत्रीय केन्द्रों के माध्यम से सम्पूर्ण भारत की मृदाओं के सर्वेक्षण तथा अन्य कारकों के अध्ययन पर आधारित समुचित भूमि उपयोग की केन्द्र व राज्य सरकरों को जानकारी उपलब्ध कराता है। निदेशक के रूप में डाॅ0 द्विवेदी की प्राथमिकता देश के विभिन्न क्षेत्रों हेतु मृदा एवं जलवायु के अनुरूप टिकाऊ भूमि नियोजन प्रणाली निर्धारित करना रहेगी।  


इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मिर्च की फसल में पत्ती मरोड़ रोग व निदान

सरकार ने जारी किया रबी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य