मेड इन इंडिया’ खिलौने


आरुषि अग्रवाल द्वाराइन्वेस्ट इंडिया में शोधकर्ता

बचपन के खेलमूर्त या अविष्कृतएक बच्चे के ज्ञान संबंधी विकास और प्रारंभिक समाजीकरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। वे बच्चों को बॉक्स के बाहर सोचने की अनुमति देते हैंउनकी सृजनात्मकता और कल्पनाशील क्षमताओं को आग में झोंक दिया जाता है इसलिएकोई आश्चर्य नहीं है (और यह वास्तव में एक स्वागत योग्य कदम है) कि नई शिक्षा नीति, 2019 में बच्चों के लिए खिलौनों पर मुख्‍य रूप से जोर दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने मन की बात रेडियो शो में घरेलू स्तर पर खिलौनों का अधिक निर्माण करने की दिशा में अग्रणी भूमिका निभाते हुए खिलौनों के महत्व पर जोर दिया है  ।

खिलौनों पर नए सिरे से ध्यान केन्‍द्रित

भारत का लगभग हर राज्य और क्षेत्र अपने यहां के खिलौनों पर गर्व कर सकता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ते रहे हैं। वे आम तौर पर अपने क्षेत्र की अनुकूल स्थिति का लाभ उठाते हैं: चाहे वह समृद्ध वस्त्र हों, लकड़ी का कठिन काम हो या मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों को परिश्रम से बनाना हो। आधुनिक खिलौनों के लिए नई जानकारी प्राप्‍त करने के अलावाभारत की विभिन्न स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं की इस अंतर्निहित क्षमता का राष्ट्रव्यापी पैमाने पर विस्तार करने की संभावना है जो भारत को एक प्रमुख वैश्विक निर्माता और खिलौनों के निर्यातक के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। इस क्षमता को पहचानते हुएकेन्‍द्र सरकार ने 14 केन्‍द्रीय मंत्रालयों की सलाह से खिलौनों के लिए एक 17-सूत्रीय राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की है जिसमें 13 निर्धारित हस्तशिल्प खिलौना समूहों में खिलौना क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यकता आधारित बेहतर कार्य योजना शामिल होगी।


कार्य योजना में स्वदेशी खिलौनों की सार्वजनिक खरीद, 'मेक इन इंडियाऔर स्वदेशी खिलौना समूहों को बढ़ावा देनाउपभोक्ता जागरूकता अभियान चलानागुणवत्ता नियंत्रण लागू करना और उद्योग में निवेश को बढ़ावा देना भी शामिल है। इस कार्य योजना के तहतकपड़ा मंत्रालय ने 27 फरवरी से 2 मार्च 2021 के बीच राष्ट्रीय खिलौना मेले का भी प्रस्ताव रखा है।

भारत को फायदा

भारतीय खिलौना उद्योग लगभग बिलियन अमरीकी डालर का है। यह स्थानीय और वैश्विक दोनों क्षेत्रों में विनिर्माण के जबरदस्त अवसर प्रस्तुत करता है। प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध कच्चे माल (प्लास्टिकपेपरबोर्ड और टेक्सटाइलभारत पॉलिएस्टर और संबंधित फाइबर का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है) की व्यापक उपलब्धता आयात की आवश्यकता को अमान्‍य घोषित करके उद्योग के फायदेमंद है और इससेविनिर्माण लागत कम होती है। यह क्षेत्र के 4,000 निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण हैजिनमें से 75 प्रतिशत माइक्रो यूनिट हैं और 22 प्रतिशत छोटे और मध्यम उद्यम हैं।

दूसराभारत में बड़ी संख्या में निर्माताओं का होना इस बात की गवाही देता है कि यहां बड़े पैमाने पर खिलौनों का निर्माण करने के तकनीकी ज्ञान का बड़ा जाल है। क्षेत्र में अंतर्निहित विविधता वैश्विक खिलौना मांग के लिए एक व्यवहार्य वैकल्पिक स्रोत बनने की भारत की क्षमता को रेखांकित करती है।

अंत मेंविभिन्न बाजार मूल्‍य और परिवर्तन विनिर्माण लक्ष्‍यों के रूप में भारत की बढ़ी हुई बाजार अनुकूलता का संकेत देते हैं। भारत इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी निर्माता देशों की तुलना में सस्ती दर पर एक विशाल कुशल श्रम शक्ति प्रदान करता है। 2025 तक 1.4 बिलियन अनुमानित जनसंख्या के साथभारत राष्ट्रीय सीमाओं के एक सेट के भीतर जल्द ही सबसे बड़ा इकलौता एकीकृत बाजार बन जाएगाऐसे निर्माताओं के लिए एक बेहद महत्‍वपूर्ण तथ्‍य जो आसानी से उत्‍पादन बढ़ाने और आय अर्जित करने पर दृष्टि गड़ाए हुए हैं।

भारत की घरेलू विनिर्माण क्षमता

घरेलू निर्माताओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिएसंबद्ध क्षेत्रों ने भी आवश्यक कच्चे माल और स्वचालन उपकरण तेजी से प्रदान करने शुरू कर दिए थे। इस प्रकारइस क्षेत्र में मौजूदा और नए उद्यमियों का समर्थन करने के लिएराज्य सरकारों ने सॉफ्टवेयर या अन्‍य उपकरणों से जुड़ी सुविधाओं के साथ खिलौना क्लस्टरआसान कच्चे माल और बंदरगाह तक पहुंच और आवश्यक जांच प्रयोगशालाएं स्थापित की हैंया स्थापित कर रही हैं 

निर्यात के मामले मेंभारत के खिलौना निर्यात में महाराष्ट्र 32.6 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश और कर्नाटक क्रमशः 19.3 और 13.6 प्रतिशत के साथ सबसे आगे हैं। इस क्षेत्र के अन्य उभरते राज्यों में तमिलनाडुगुजराततेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। ये क्लस्टर संसाधनों और निधियों के समान वितरण के साथ परम्‍परागत और आधुनिक दोनों तरह के खिलौनों की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखेंगे। मुख्‍य रूप सेये राज्य सरकारें पूंजीगत निवेश सब्सिडी में 30 प्रतिशत तक की पेशकश कर रही हैंजो सभी उत्पादकों के लिए एक आकर्षक प्रोत्साहन है।

भारत को डिजिटल बनाने पर बढ़ता ध्‍यान खिलौने उद्योग के लिए सम्‍भावनाएं प्रकट करता है। एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म कई स्वदेशी खिलौना समूहों के लिए ज्ञान और पहुंच बढ़ा सकता है। मांग में यह वृद्धि उन हजारों पारंपरिक हस्तकला कारीगरों की सहायता करेगी जिन पर पारंपरिक खिलौना उद्योग टिका हुआ है। बहुत से खिलौने बचपन के शुरुआती विकास में साथ देते हैंखिलौना उद्योग देश के कई आर्थिक पहलुओं का समर्थन करता है। उद्योग के स्थानीयकरण के लिए यह एकीकृत दृष्टिकोण सही मायने में भारत की आत्‍मनिर्भरता को प्रकट कर सकता है।