पावस पर्व

 
हरि शयनी एकादशी से(श्रावण कृष्ण पक्ष) देवोत्थानी एकादशी तक चातुर्मास का समय होता है ,इस दौरान भगवान विष्णु का शयन काल होता है, उनके शयन काल के समय उनका प्रभार भगवान शिव के पास  होने के कारण शिव जी महत्त्व बढ़ जाता है। चातुर्मास के दौरान पूजा भी भगवान शिव की ही की जाती है उनके ही माध्यम से हमारी-आपकी पूजा प्रार्थना भगवान विष्णु तक पहुंच जाती है। इसीलिए यह काल खण्ड भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दौरान पावस पर्व की व्रत त्योहार श्रृंखला चलती है जो कि नाग पंचमी से शुरू होकर ऋषि पंचमी तक पहुंच कर सम्पन्न होती है। इस दौरान गुड़िया यानी नागपंचमी, श्रावण पूर्णिमा या रक्षाबंधन,  गणेश चतुर्थी या बहुला, हलछठ या ल़लही छठ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, कजरी तीज या हरतालिका तीज और ऋषि पंचमी का व्रत आता है। श्रृषि पंचमी के बाद बड़ा इतवार और उसके बाद अनन्त चतुर्दशी या अनन्ता का पर्व आता है । सावन का महीना भगवान शिव को ही समर्पित होता है।इसी महीने जगह-जगह से कांवड़ यात्रा भी निकाली जाती है जो कि विभिन्न शिवालयों में जाकर सम्पन्न होती है।तत्पश्चात् पितरों को समर्पित पितृपक्ष आता है । तत्पश्चात् देव पक्ष शुरू होता है जो कि मां दुर्गा और भगवान राम को समर्पित है। और उसके बाद दीपोत्सव की पर्व श्रृंखला धनतेरस, दीपावली,जमघटया गोवर्धन पूजा और यमद्वितीया आती है और उसके बाद देवोत्थानी एकादशी आती है। चतुर्मासके दौरान भगवान विष्णु के शयन के कारण विवाहादि मांगलिक कार्य निषेधित होते हैं। पावस पर्व लोकपर्व और प्रकृति पर्व भी होता है। इसी दौरान वर्षाजल  के माध्यम से धरती और गगन का मिलन भी होता है। हरियाली और लहलहाती फसलें देख कर लोक मन प्रसन्न होकर कजरी और वर्षा गीत गा उठता है। डालों पर पड़े झूले और‌ झूलों  से उठती कोरस में सावन गीतों की स्वर लहरियों से मानव मन झूम झूम उठता है। मगर लोकजीवन की यह जीवंतता अब यादों में ही सिमट कर तिरोहित होती जा रही है। 

इसी दौरान,सावां , कोदौ,काकुन ,टांगुन मडुंवा और धान की झूमती बालियां किसानों के मानस पर स्वत: स्फूर्त संगीत लिख जीती है।


  डा० शिव राम पाण्डेय