धान की पराली जलाने से होता है पर्यावरण प्रदूषित-उप कृषि निदेशक उन्नाव

25 अक्टूबर को विकास खण्ड वीघापुर के विकास खण्ड सभागार  में  राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन तिलहन योजना के तहत दो दिवसीय कृषक प्रशिक्षण का आयोजन किया गया. प्रशिक्षण के दौरान ही किसानों को गिरिराज प्रजाति की दो -दो किलोग्राम सरसों बीज मिनीकिट का वितरण किया गया. इस आयोजन में उप कृषि निदेशक उन्नाव डा. मुकुल तिवारी, उप सम्भागीय  कृषि प्रसार अधिकारी सदर विकास किशोर, मिशन सलाहकार  गुलाब चन्द्र गुप्ता, मिशन तकनीकी सहायक शरद प्रकाश पाण्डेय, कमलेश कुमार, राजकीय कृषि बीज भण्डार प्रभारी अमित कटियार एवं कृषि विभाग के प्रसार कर्मी उपस्थित थे. प्रशिक्षण में उप कृषि निदेशक ने किसानों को बताया एक टन धान की पराली जलाने से हवा में 3 किलो ग्राम, कार्बन कण, 513 किलो ग्राम, कार्बनडाई-ऑक्साइड, 92 किलो ग्राम, कार्बनमोनो- ऑक्साइड, 3.83 किलोग्राम, नाइट्रस-ऑक्साइड, 2 से 7 किलो ग्राम, मीथेन, 250 किलो ग्राम राख घुल जाती है| धान की पराली जलाने से पर्यावरण प्रदूषित होता है, मुख्यतः वायु अधिक प्रदूषित होती है| वायु में उपस्थित धुएँ से आंखों में जलन एवं सांस लेने में दिक्कत होती है| प्रदूषित कणों के कारण खांसी, अस्थमा जैसी बीमारियों को बढ़ावा मिलता है| प्रदूषित वायु के कारण फेफड़ों में सूजन, संक्रमण, निमोनिया एवं दिल की बिमारियों सहित अन्य कई बिमारियों का खतरा बढ़ जाता है| किसानों के पराली जलाने से भूमि की उपजाऊ क्षमता लगातार घट रही है| इस कारण भूमि में 80 प्रतिशत तक नाईट्रोजन, सल्फर तथा 20 प्रतिशत तक अन्य पोषक तत्वों में कमी आई है| मित्र कीट नष्ट होने से शत्रु कीटों का प्रकोप बढ़ा है, जिससे फसलों में विभिन्न प्रकार की नई बिमारियां उत्पन्न हो रही हैं| मिट्टी की ऊपरी परत कड़ी होने से जल धारण क्षमता में कमी आ रही है| एक टन धान की पराली जलाने से 5.5 किलो ग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलो ग्राम फॉस्फोरस और 1.2 किलो ग्राम सल्फर जैसे मिट्टी के पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं|