ICAR-CISH, लखनऊ ने विश्व खाद्य दिवस मनाया

 ICAR-CISH, लखनऊ ने 'खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए बागवानी फसलों की संरक्षित खेती' पर वेबिनार आयोजित करके विश्व खाद्य दिवस मनाया , आईसीएआर-सीआईएसएच, लखनऊ ने विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर  'खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए बागवानी फसलों की संरक्षित खेती' पर एक वेबिनार का आयोजन किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. ब्रह्मा सिंह ने मुख्य भाषण दिया। उन्होंने कहा कि उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की संरक्षित खेती ने भारतीय बागवानी उद्योग के सामने आने वाले कुछ प्रमुख मुद्दों को संबोधित करने के लिए काफी ध्यान आकर्षित किया है। नवोन्मेष संचालित इस क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने और गुणवत्ता का उत्पादन करने, फसल के मौसम का विस्तार करने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, खेती के तहत मामूली उत्पादक भूमि लाने और महिलाओं, युवाओं और भूमिहीन मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करके बागवानी उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव की अपार संभावनाएं हैं।

संरक्षित खेती के तहत टमाटर और शिमला मिर्च जैसी फसलों की औसत पैदावार अक्सर खेत में खेती की तुलना में 10 गुना अधिक होती है। उन्होंने विशिष्ट उदाहरण देते हुए बताया कि संरक्षित खेती ने लद्दाख जैसे पर्यावरण की दृष्टि से कठोर क्षेत्रों में बागवानी उत्पादन में क्रांति ला दी है। इन लाभों को देखते हुएनिजी उद्यमी संरक्षित बागवानी में तेजी से निवेश कर रहे हैं। प्रौद्योगिकी में निरंतर सुधार को देखते हुएसंरक्षित खेती धीरे-धीरे भारतीय बागवानी उद्योग के स्वचालन का मार्ग प्रशस्त कर रही हैजिसमें शिक्षित और नवीन युवाओं को बागवानी की दुनिया की ओर आकर्षित करने की विशाल क्षमता है। उन्होंने प्रतिभागियों को इस क्षेत्र में जलवायु-नियंत्रित हाई-टेक बागवानीजैव-फिल्म (बायोडिग्रेडेबल) मल्चिंगसस्ती हाइड्रोपोनिक्स उत्पादन तकनीकएरोपोनिक्समछली की खेती के लिए एक्वापोनिक्ससूक्ष्म सागतैरती खेतीऊर्ध्वाधर खेती और रसोई सहित इस क्षेत्र में उभरते अवसरों के बारे में बताया। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बागवानी फसलों की रक्षा करते हुए संरक्षित खेती कम से अधिक उत्पादन करने का सबसे अच्छा साधन हैऔर इस प्रकार बागवानी उत्पादन के स्थायी गहनता में अत्यधिक योगदान दे सकती है।

जैसे-जैसे हम धीरे-धीरे स्वचालित संरक्षित खेती प्रौद्योगिकियों की ओर बढ़ते हैंबागवानी की यह ज्ञान-गहन शाखा निश्चित रूप से पेशे के लिए बहुत आवश्यक गौरव लाएगी तथा खेती को एक आनंदमय और पुरस्कृत गतिविधि बनाना संभव है। नीति निर्माताओं से संरक्षित खेती पर एक राष्ट्रीय संस्थान स्थापित करने का आह्वान करने की आवश्यकता है तथा संरक्षित खेती को विश्वविद्यालयों में कोर्स का हिस्सा बनाकर अधिक संख्या में विशेषज्ञों का विकास किया जा सकता है। डॉ. शैलेन्द्र राजननिदेशकभाकृअनुप-सीआईएसएचलखनऊ ने बताया कि संरक्षित खेती द्वारा कम लागत से अधिक उत्पादन संभव है तथा वर्ष भर उत्पादन भी सफलतापूर्वक किया जा सकता हैसंरक्षित खेती को वातावरण के अनुकूल बना कर सिंचाई योग्य जल एवं अन्य संसाधनों का भरपूर उपयोग किया जा सकता है क्योंकि इसमें सामान्य खेती के तुलना में केवल 10 से 20% जल की  आवश्यक जल की आवश्यकता पड़ती हैसंरक्षित बागवानी ही बागवानी का भविष्य है और संभवत आने वाले समय में उत्पादकों को प्रौद्योगिकी में निपुण होने की आवश्यकता पड़ेगीछोटे से स्थान में बागवानी फसलों का गुणवत्तापूर्ण अधिक उत्पादन प्रौद्योगिकी के कारण संभव हो सकेगा|