उत्तराखंड में दिग्गजों की राह भी नहीं आसान

सभी दल  होने वाले मतदान से पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है, लेकिन उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) और आम आदमी पार्टी (आप) भी कई सीटों पर मुकाबले में हैं। इतना ही नहीं, राज्य की 70 में से करीब दो दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां पर निर्दलीय उम्मीदवार भी राजनीतिक दलों को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।

चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में राज्य में किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की बात कही जा रही है, ऐसे में परिणाम के बाद निर्दलियों की भूमिका अहम होने जा रही है और वे सरकार गठन में 'किंगमेकर' साबित हो सकते हैं।

यदि पूर्वानुमान के मुताबिक ही परिणाम रहे तो उत्तराखंड में हरियाणा जैसी ही स्थिति बनेगी, जिसमें भाजपा को उक्रांद या आप में से किसी एक का साथ लेना पड़ सकता है। इसके उलट, अगर ये दल कांग्रेस के साथ गए तो बाजी उसके हाथ लग सकती है। अगर राज्य की हॉट सीटों की बात करें तो खटीमा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को किसी तरह की दिक्कत नहीं दिख रही है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लालकुआं में फंसे हुए दिख रहे हैं।

निर्दलीय बिगाड़ रहे हैं भाजपा व कांग्रेस के समीकरण

उत्तराखंड में सभी पर्वतीय सीटें क्षेत्रफल के हिसाब से तो काफी बड़ी हैं, लेकिन मतदाताओं की संख्या के हिसाब से बेहद छोटी हैं। इसलिए इन सीटों पर हार-जीत बहुत ही कम अंतर से होती है। बड़ा क्षेत्रफल होने की वजह से हर प्रत्याशी का पूरी सीट पर समान प्रभाव भी नहीं होता है और स्थानीय स्तर के अनेक नेता क्षेत्र विशेष में प्रभाव रखते हैं। यही वजह है कि हर चुनाव में निर्दलीय 10 फीसदी से अधिक वोट पाते हैं। कई सीटों पर तो यह 20 फीसदी से भी अधिक है।

इस तरह से देखा जाए तो करीब दो दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां पर निर्दलीय स्थापित दलों के प्रत्याशियों को टक्कर देते दिख रहे हैं। नामांकन से कुछ घंटे पहले तक जिस तरह से अनेक सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों की अदलाबदली हुई है, उससे मतदाता खासे नाराज हैं और वे विकल्प की तलाश में दिख रहे हैं।

22 सीटों पर दोनों ही दलों के बागी भी अधिकृत प्रत्याशियों को चुनौती दे रहे हैं और इनका ठीकठाक जनाधार भी है। इन हालात में इस बार विधानसभा में निर्दलियों की संख्या ठीक ठाक हो सकती है। यही नहीं, अनेक सीटों पर निर्दलीय भले ही जीतने की स्थिति में न हों, लेकिन वे भाजपा-कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में जरूर सक्षम हैं।

दिग्गजों की राह भी आसान नहीं

नामांकन से पहले भाजपा और कांग्रेस में जमकर उठापटक हुई है। इससे भी अनेक सीटों पर नए समीकरण उभर गए हैं। सबसे चर्चित मामला कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का रहा, जिनको पहले रामनगर से टिकट दिया गया और विरोध के बाद लालकुआं भेज दिया गया। लालकुआं में पिछली बार भाजपा बड़े अंतर से जीती थी। पिछला चुनाव हार चुके हरीश रावत प्रतिष्ठा बचाने के लिए यहां संघर्ष करते दिख रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने डोईवाला सीट से चुनाव लड़ने से इनकार कर एक तरह से पहले ही हार मान ली थी, लेकिन आखिरी समय में उन्होंने अपने खास बृजभूषण गैरोला को टिकट दिलाकर परोक्ष तौर पर चुनाव में वापसी की है। यहां पर गैरोला की हार-जीत को त्रिवेंद्र की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, गैरोला के लिए भी राह आसान नहीं मानी जा रही है

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जरूर कुछ निश्चिंत लग रहे हैं और खटीमा से उनकी जीत तय मानी जा रही है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल इस बार श्रीनगर सीट पर भाजपा प्रत्याशी और मंत्री धन सिंह रावत पर भारी दिख रहे हैं। वहीं, भाजपा अध्यक्ष मदन कौशिक भी अपनी हरिद्वार सीट पर मजबूत स्थिति में हैं। विधानसभा में कांग्रेस के नेता प्रीतम सिंह अपनी परंपरागत सीट चकराता में मजबूत स्थिति में हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खंडूरी की पुत्री इस बार अपनी यमकेश्वर सीट के बजाय कोटद्वार से मैदान में हैं। यहां पर उनको पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ही जगहों से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

हरक मैदान में नहीं, लेकिन उन पर भी रहेगी नजर

उत्तराखंड के सबसे चर्चित और विवादित नेता हरक सिंह रावत इस बार खुद मैदान में नहीं हैं। उनकी पुत्रवधू अनुकृति गुसांई रावत लैंसडाउन से उम्मीदवार है। चुनाव से ठीक पहले भाजपा से निकाले गए हरक को इस बार काफी जलालत का सामना करना पड़ा है। भाजपा से निष्कासन के बाद कांग्रेस ने भी उन्हें जिस तरह से जगह दी, वह उनके लिए काफी अपमानजनक रहा है। किसी भी सीट से जीत का दम भरने वाले हरक को कांग्रेस ने भी टिकट न देकर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत तो उनके खिलाफ ही रहे हैं। ऐसे में हरक को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि वह भाजपा के लिए तो मुश्किलें खड़ी करेंगे ही, कांग्रेस को भी चैन से नहीं रहने देंगे और कम से कम आधा दर्जन सीटों पर हरक पक्ष व विपक्ष, दोनों ही भूमिकाओं में होंगे। खासकर हरीश रावत के समथर्कों के लिए वह गढ़वाल क्षेत्र में मुश्किलें पैदा करेंगे।

सरकार किसकी बनेगी स्पष्ट नहीं

कुल मिलाकर उत्तराखंड में अगली सरकार किसकी बनेगी यह स्पष्ट नहीं हैं। साफ-सुधरी छवि वाले पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार्य चेहरा हैं, लेकिन पिछले छह महीनों में वह ऐसा कुछ नहीं कर पाए हैं, जिनसे यह माना जाए कि उनके नाम पर भाजपा को सभी जगहों पर वोट मिल पाएंगे। यही वजह है कि पार्टी वोट के लिए धामी से अधिक प्रधानमंत्री मोदी के नाम के भरोसे है और पार्टी ने नारा दिया है कि ‘उत्तराखंड की पुकार, मोदी-धामी ’ सरकार. कांग्रेस 'चारधाम चार काम' के नारे के साथ मैदान में है।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की सख्त भू-कानून की मांग को भाजपा व कांग्रेस दोनों ने ही हाशिए पर डाल दिया है, जबकि क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल ने इस मुद्दे को लपका हुआ है। आम आदमी पार्टी की नजर मैदानी इलाकों की मुस्लिम बहुल सीटों पर है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम कांग्रेस की बजाय आम आदमी पार्टी को तरजीह देंगे

कुल मिलाकर इस बार उत्तराखंड में कई चर्चित चेहरे चुनाव के बाद धूमिल पड़ सकते हैं और अनेक नए चेहरे चर्चा में आ सकते हैं। कांग्रेस में हरीश रावत के हाथ में चुनाव की कमान जरूर है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और नेता विपक्ष प्रीतम सिंह भी जीत की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार हैं

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