भूत से लड़ाई

     लेखक - शिव राम पाण्डेय
जिस जगह मेरी भूत से मुलाकात हुई थी ,वह स्थान अब सड़वलिया/सिकटा चौराहे के नाम से जाना जाता है। और अब वहां पर जगमग करती रंग-बिरंगी लाइटें जलती हैं। रात 8 -9  बजे तक दुकानें खुली रहती हैं और रात नौ तक तो मैं स्वयं भोजन के बाद वहां तक टहल कर आता हूं। रात में तमाम लोग वहीं पर सोते भी हैं।
पहले उस जगह पर झरबेरा की झाड़ियों मकैचा , बघनखा और भटकटैया के पौधे और कहीं- कहीं पर आम और महुआ के पेड़ लगे थे। कौन सा भूत और कौन सी चुड़ैल कहां पर रहती है ,सभी को मालूम था। यह बात और है  कि इन भूत चुड़ैलों  को देखा भले किसी  ने नहीं था मगर उनके बारे में सुन सबने रखा था। 
खैर मेरी मुलाकात भूत से हुई , लड़ाई भी होने ही वाली थी मगर मैंने बचा लिया।
बात  1969 की है। तब मैं झिनकू लाल इंटर कालेज कलवारी बस्ती में कक्षा सात में पढ़ रहा था। यही कोई बारह वर्ष की आयु रही होगी मेरी।स्कूल घर से लगभग 18  किलोमीटर दूर था। पैदल आना-जाना पड़ता था। सितम्बर का महीना था भयंकर बाढ आई थी बैलाछ ताल जो कि दर्जनों गांवों का जलभरण क्षेत्र है ,वर्षा के कारण भयावह रूप धारण किये हुए था। चौड़ाई लगभग एक किलोमीटर हो गयी थी । स्कूल जाने के लिए नाव से बैलाछ ताल पार करना पड़ता था। दो‌ डोगिंयों  को जोड़ कर नाव बनी हुई  थी। एक दिन बात है ,बाजार में कुछ काम की वजह से मैं अपनी स्कूल वाली गोल  (समूह )से बिछड़ गया था। इसलिए मेरा पांच बजे वाला खेवा  (नाव छूटने का निर्धारित समय) छूट गया था। इसलिए मुझे छह बजे वाले खेवा में ताल पार करना पड़ा। नाव के इस पार से उस जाने में 20 -30  मिनट लग जाते थे। अतः बैलाछ पार करते करते मुझे सात बज गए। वहां से भी मेरा घर लगभग आठ किलोमीटर दूर था। धीरे- धीरे अंधेरा घिरने लगा था। सारे विद्यार्थी मुझसे पहले वाले खेवा में जा चुके थे , इसलिए मैं निपट अकेला था। अंधेरा तो था ही। ग्रामीण क्षेत्रों में तब विद्युतीकरण हुआ नहीं था ,चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था। डर के मारे हाल बुरा था। गायत्री मंत्र और हनुमान चालीसा के अलावा कोई और सहारा था नहीं। जैसे- जैसे अंधेरा बढ़ रहा था हनुमान चालीसा पढ़ने और गायत्री मंत्र के जाप की गति और ध्वनि बढ़ती जा रही थी।
    चलते -चलते मैं अपने घर के नजदीक पहुंच गया था लेकिन अभी तक न तो कोई सहचर या मानव मिला था और न ही रास्ते में कहीं रोशनी दिखी थी। यद्यपि तब गांवों में लालटेन या ढिबरी जलाने की अनिवार्य परम्परा तो थी मगर मेरा रास्ता गांवों से बाहर-बाहर था इसलिए मैं रोशनी देखने को तरस गया था। गांव से अभी लगभग एक किलोमीटर  था, अंधेरे का भय भूत बन चुका था। अपनी ही परछाई डरा रही थी, लगता था कि कोई मेरे पीछे-पीछे आ रहा है। यदि कहीं कोई पत्ता भी खड़कता तो जी धक्क सा कर जाता।  अभी भी घर पहुंचने के लिए तालाब के पानी में डूबी दो सौ मीटर कच्ची सड़क पानी में घुस कर पार करना था। जी धुकुर धुकुर कर रहा था। हनुमान चालीसा पाठ का स्वर और तेज हो गया था । मैं पानी में घुसने के लिए कच्छा बटोर ही था कि तब तक एक निहायत ही काला  सा आदमी लाठी फटकारते हुए एकाएक मेरे सामने आ गया। वह भी अकेला था और मैं भी।वह विपरीत दिशा से आ रहा था, मनोरमा नदी और सड़वलिया  गांव पार करने के बाद वह भी निपट अकेला था, बरसात की संख्या, सांय-सांय करता अंधेरा। भय का भूत उसे भी डरा रहा था और मुझे भी। हां यह बात जरूर थी मैं निहत्था था और उसके साथ उसकी तेल पी हुई  लाठी थी। जिसकी वजह से उसमें थोड़ी बहुत हिम्मत शेष थी इसीलिए वह तनग कर मेरे सामने आ गया था। मैंने समझा कि निश्चय ही मेरा सामाना भूत से हो गया है क्योंकि मैंने सुन रखा था कि भूत एकदम काले होते हैं पानी या पीपल के पास रहते हैं।  मैं घबरा तो गया मगर घबराहट में मेरे मुंह से अचानक निकल गया "कौन सहाय " ? इतना सुनते लाठी वाला भूत ठिठक गया और हांफते डांफते बोला -"अरे भइया तूं ,अब्बै तौ गजब होइ  जात, हम तौ जानेन भुतवा होय, गावत आवत बाय, तबै तो हम सोचेन कि जब मरही के हय तौ लड़िकै मरी" । अब भूत का भय  टल चुका था, दोनों के जान में जान आई।
       दरअसल हम दोनों आपस में परिचित थे। मैं एक साधारण जमीनदार परिवार से था और राम सहाय मेरा पारिवारिक मोची। हम दोनों की मुलाकात निर्जन स्थान पर पानी के पास हुई थी और यह माना जाता था भूत पीपल और बेर के पेड़ पर झाड़ झंखाड़ और नदी तालाब के ही पास रहते हैं। हर गांव में दो चार भुतहा स्थान होते थे । हम और राम सहाय जिस स्थान पर मिले थे वह भी भुतही जगह के नाम से प्रसिद्ध था।
   थोड़ा दम लेने के बाद राम सहाय बोला- "भइया एतनी देर कांहे  भई,इसकुलवा तौ चारै बजे बन्द भवा होई?" मैंने  बिस्तर से उसे विलम्ब का कारण समझाया। फिर उसने दूसरा सवाल दागा- "भइया ऊ तौ ठीक, मुला भुतवन खान भुनभुनात काव रह्यो?" फिर मैंने उसे समझाया कि अकेला होने के कारण भूत पिसाच का डर लग रहा था इसलिए हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे।
 अब उसने बताया "भइया डरि तौ हमहूं गयन, मुला मरता क्या न करता" ? याही ते हम स्वाचेन मरि भले जाब लेकिन भूत सारे से लड़िकै तब मरबै। फिर दोनों हंस पड़े। भय का भूत अब गायब हो चुका था। घर पहुंचते-पहुंचते रात हो गयी थी। घर वाले बेहद परेशान धे, मां तो मुझे अपने सीने से चिपका कर रो ही पड़ीं। मगर करते क्या? आज जैसी संचार सुविधा तब तो थी नहीं । खैर उसके बाद से मेरे मन से  भय का भूत भाग गया। लेकिन अगर अब भी उस दिन जैसी स्थिति में पड़ जाऊं तो क्या होगा यह तो समय ही बताएगा।

विशेष :- गोल गोल मोटे ताड़ के सूखे पेड़ को काट कर उसे एक तरफ से फाड़ करके खोल का गूदा निकाल कर खोखला कर लेते हैं फिर एक तरफ खोल को एक डेढ़ फुट की चौड़ाई में काट कर जगह-जगह लकड़ी डाल कर बैठने की व्यवस्था बना लेते हैं उसे डोंगी कहते हैं मगर डोंगी हिलती डुलती बहुत है बैलेंस बनाना मुश्किल होता है इसलिए दो डोंगी को एक में जोड़ लेते हैं तब डगमगाती नहीं। डोंगी सिंगल पीस में बनी होती है। वैसे अब सामान्य लकड़ी की भी डोंगी बनने लगी है मगर इसके लिए भी कटहल की लड़की को प्राथमिकता दी जाती है।